Tuesday, April 1, 2014

किरणें बोलीं सुन मेरी बात।

















सूरज निकला हुआ प्रभात ,
किरणें बोलीं सुन मेरी बात ,
पहले मातु -पिता की पूजा ,
दूजे गुरु के चरण प्रणाण ,
तीजे नमन ईश को करना ,
करना फिर दिन की शुरुआत ,
किरणें बोलीं सुन मेरी बात।

संत जनों का आदर करना ,
सच का साथ कभी ना तजना ,
रखना सदा ही सब का मान ,
करना नहीं मिथ्या अभिमान ,
दीन -दुखी की सेवा करना ,
सदा याद रखना यह तात ,
किरणें बोलीं सुन मेरी बात। 

मिल कर रहना तुम हे प्यारे ,
बंद मुट्ठी से सब  हैं हारे ,
बाधाओं से मत घबराना ,
धीरज - धैर्य कभी न खोना ,
साहस के बल पर ही नाविक ,
लहरों को देते हैं मात ,
किरणें बोलीं सुन मेरी बात।

Friday, February 7, 2014

सच्ची -सच्ची कहता हूँ

नहीं जँचेगी बात तुम्हें ,पर सच्ची -सच्ची कहता हूँ ,
मैं झूठ नहीं कुछ कहता हूँ ,मैं आँखों देखी कहता हूँ ।

बातों की खेती होती है ,लाशों की खेती होती है ,
जिसे  काटते - बोते हैं कुछ खाश किस्म के लोग यहाँ ,
हैं लोग बड़े ही भले यहाँ।

देख खेत में लाशों को ,गिद्धोँ के बिचरण बढ़ जाते ,
हैं इनमें से कुछ बड़े -बड़े , कुछ छोटे और मँझोले हैं ,
पर पर सब के सब ही भोले हैं।

सुन कर अटपटा लगा होगा , मुझ पर विश्वास घटा होगा ,
पर बात सुनाता खरी - खरी , है सोलह आने बात  सही।

मनुज यहाँ बिक जाता है , कफ़न यहाँ बिक जाता है ,
खड़े - खड़े ही लोगों का ईमान यहाँ बिक जाता है।

गोदामों में पड़े - पड़े ही ,अन्न यहाँ सड़ जाता है ,
किन्तु ,बचपन रोता - रोता ,भूखा ही मर जाता है।

मनरेगा में मजदूरों का , श्रम यहाँ बिक जाता है   ,
मिड -डे मील का खाना भी भी , प्रबंधक ही खा जाता है।

 कहने को तो स्कूलों में खाना पोषक ही मिलता ,
उनसे भी जाकर पूछो , जिनका सड़ांध से नाता है।

वो अक्षर ज्ञान को क्या बांचे , है जिनका पेट नहीं भरता ,
पर नेताओं के दावत में , मुर्गा हलाल हो जाता है। 

( 13- 7 - 2013 की रचना  )




Monday, February 3, 2014

आयल बसंत बहार













 आयल बसंत बहार
सखी री , मोरा पिया  नहीं आयल  ।
सावन मास वाणिज को गयल पिया ,
नहीं लीनी सुधि भी हमार
सखी री,मोरा पिया नहीं आयल ।
कही के गयल पिया अबहुँ लौं आवति ,
बीत गयल दिन-मास
सखी री मोरा पिया नहीं आयल ।
नहीं कोउ पतिया , न कोउ खबरिया ,
कासे पठावउँ सन्देश
सखी री मोरा पिया नहीं आयल  ।
डारि-डारि बिहुँसहिं कलियाँ निगोरी ,
भँवरा करत गुँजार
सखी री  मोरा पिया नहीं आयल ।
महकै जो बौरना तो हिया बौराबै ,
महुआ पकहिं वन माहिं
सखी री मोरा पिया नहीं आयल  ।
चहुँ ओर कूजत कोयलिया कारी ,
उठत करेजवा में पीड़
सखी री मोरा पिया नहीं आयल  ।
साँझ भये जोहूँ बाट - डगरिया ,
जोबना भयल मोर उदास
सखी री मोरा पिया  नहीं आयल  ।
आयल बसंत बहार ,
सखी री मोरा पिया नहीं आयल  ।


Thursday, January 23, 2014

कोरा - कोरा दिल है मेरा


कोरा - कोरा दिल है मेरा ,कोरा-कोरा गीत ,
ढूंढ रहा है यह दिल मेरा ,मन का कोई मीत।
किसे बताऊँ, किसे सुनाऊँ, दिल की  अपनी बात ,
दिन ढल जाता, शाम है आती, आ जाती फिर रात।
जब सागर के खुले वक्ष, छू लेता पूनो चाँद ,
मचल-मचल सागर की लहरें, चलीं चूमने चाँद ।

Wednesday, January 22, 2014

पहाड़ की नारी की व्यथा



बहुत दिनों पर चिट्ठी तेरी आन मिली है ,
पूछ रहे हो हाल हमारा क्या बतलाऊँ ,
जैसे  - तैसे कट जता है जीवन  मेरा ,
अपनी पीड़ा इस ख़त में कैसे जतलाऊँ।

जीवन कितना कठिन हो रहा है पहाड़ पर ,
पीने के पानी को मीलों चलना पड़ता ,
नहीं सड़क है यहाँ कोई कच्ची या पक्की ,
ऊबड -खाबड़ पथरीले पथ चढ़ना पड़ता  ।

मिलती नहीं है बाज़ारों में हरी सब्जियाँ ,
सब ही सब चट कर गईं सुना है बड़ी इल्लियाँ ,
नमक,दाल ,चावल,आटा का हाल बुरा है ,
इससे तो सस्ती बोतल की बन्द सुरा है।

सुना,कि पिट्रोल -डीजल का कुछ दाम बढ़ा है ,
फिर भी नहीं मँहगाई का बोझ बढ़ा है ,
बढ़ा- चढ़ा  है,तो केवल बस प्याज चढ़ा  है
संग टमाटर भी थोड़ा सा साथ बढ़ा है।

हैं बिजली के तार सजे खम्भों पर लेकिन ,
नहीं बल्ब है इन खम्भों पर कभी लटकता ,
नहीं सूझता यहाँ हाथ को हाथ रात में  ,
रह-रह कर अम्मा-बाबू का दिल घबड़ाता।

नहीं डाक्टर यहाँ कभी कोई मिलते हैं ,
ना ही मिलती दवा यहाँ की दूकानों पर ,
यदि तम्हें फुर्सत मिल जाए अपने काम से ,
कुछ दवाईयाँ भी तुम अपने साथ  ले आना।

जलती नहीं है गीली लकड़ी भी चूल्हे में ,
खाँस -खाँस कर मेरा दम घुटने लगता है,
नहीं मदद सरकारी कोई मिलती है ,
मौसम का भी कोप हमें सहना पड़ता है।
एक काम है और तम्हें कैसे बतलाऊँ ,
संभव हो तो तेल मिट्टी का भी ले आना 
चाँद तोड़ कर लाना ,चाहे न लाना ,
एक सिलेंडर साथअपने तू ले आना।

         ----  (  अभ्यर्थना शीर्षक से प्रकाशित )

Tuesday, January 21, 2014

उठाओ , मेरी जलती चिता से मशाल

मैं जीना चाहती थी ,
जीने कि जिजिविषा थी मुझ में ,
जीने कि लालसा में
मैं अपनी टूटती साँसों से
लगातार संघर्ष कर रही थी  ।
मेरी आँखों में ,
अब भी भय था ,संत्रास था ,
चिंदी - चिंदी हो रही थी  मेरी अस्मिता
मेरे बदन पर मानो
सहस्त्रों बिच्छुओं ने
एक साथ डंक चुभो दिये हों ,
मैं दर्द और पीड़ा से
चीखती रही , छटपटाती रही........
मेरा सम्पूर्ण शरीर ,जैसे सड़ गया,और
असंख्य कीड़े बिल - बिला रहे हैं ,
रेंग रहे हैं ,
मैं बेसुध हो गई,
जैसे ही होश आया
मैं पुन: संघर्षरत हो गई ।
मैं  नहीं हारी ,
हार कर   पिशाचों ने
मुझे खिड़की से बाहर फेंक दिया ,
फिर , मैं एक तमाशा बन गई............
सदियों से
यही होता चला आ रहा है ,
नारियाँ ,
जो संसार को चलातीं हैं ,
वही रौंदी जातीं हैं ,कुचली जातीं हैं ,
सताई जातीं हैं ,
काटी जातीं हैं ,
जलाई जातीं हैं।
नारियाँ ,
जो , कभी माँ , कभी बहन ,
कहीं पत्नी ,
कहीं नानी , दादी ,बुआ ,मौसी और
न जाने कितने रिश्तों को जोड़ कर
ममता और स्नेह से
पुरुष  को सींचतीं हैं,
वही पुरुष , कापुरुष,
नरपिशाच बन जाता है ,
कैसा अधम है यह पुरुष जो  ,
सम्पूर्ण नारी जाती को
अपमानित , कलंकित और
तिरस्कृत करता है ?
नारियों ,उठाओ ,
मेरी जलती चिता से मशाल
और
जला दो इस विश्व को ,
ऐसे विश्व का क्या करना
जो विषकुंभ बन गया हो ...........



 

Sunday, January 19, 2014

कुछ गीत लिखे अपने मन की




निज करतल में मैं प्रकृति का श्रृंगार लिए चलता हूँ  ,
मैं अपने उर में जीवन  का उद्गार लिए चलता हूँ    ।

मैं पथिक अकेला अपनी राह का, मस्ती में चलता हूँ ,
मैं अरमानों और भावों का उपहार लिए चलता हूँ    ।

तूफ़ानों - झंझावातों को मुट्ठी बाँध  लिए चलता हूँ     ,
सुख - दुःख के दोनों तीरों को अपने साथ लिए चलता हूँ  ।

निविड़ अंधकार  में भी , पथ , आलोकित कर के चलता हूँ ,
साहस के बल, हर मुश्किल ,हँस कर पार किये चलता हूँ    ।

नहीं संग कोई संगी साथी ,मन को साथ लिए चलता हूँ  ,
मैं मौजों में भी हिम्मत का पतवार लिए चलता हूँ   ।

मिले राह में काँटे भी ,  मैं , उनको प्यार किये  चलता हूँ   ,
कुछ गीत लिखे अपने मन की , वह गीत गाये चलता हूँ   ।





Saturday, January 18, 2014

ज़िंदगी के यारों ऐसे मजे कहाँ हैं


है आ गया बुढ़ापा यह हम भी जानते हैं
पर बोझ है बुढ़ापा यह हम न मानते हैं। 

हर रोज हर सुबह में  हम साथ बैठते हैं
पीते  हैं चाय मिलकर और टी वी देखते हैं।

तैयार होते - होते हो जाता दोपहर है
हो जाता जल्दी यारों , खाने का भी प्रहर है।

खाना बनाती मैडम , फिर साथ बैठ खाते ,
बस इस तरह ही दोनों हर दिन गुजारते हैं।

न शिक़वा कोई है मुझको, न उनको है शिकायत
हर रोज घूमने की  हमने लगाई आदत।

होती अगर इनायत कुछ दोस्त आ के मिलते
हम भी कभी-कभी ही , हैं उनके घर पहुँचते  ।

कुछ खाश हो खबर तो अखबार भी हैं पढ़ते
टी वी और रेडियो पर गाना - ग़ज़ल हैं सुनते।

तकलीफ है बुढ़ापा कहते सभी यहाँ हैं
पर ज़िंदगी के यारों ऐसे मजे कहाँ  हैं। 
रचना तिथि - मई , 2012 

लौट आओ















लौट आओ  तुम , (कि ) अब ये
दिल मेरा  लगता नहीं ,

नेह के इस पंथ को , न जाओ ,
तुम यूँ छोड़ कर  ,
जन्मों के बंधन हैं ये , न जाओ ,
तुम यूँ तोड़ कर ,
चुप न बैठो ,कुछ सुनाओ
दिल मेरा लगता नहीं..........

फूल संग काँटे रहें , या
संग काँटे फूल  के
संग ही हम तो खिले हैं
जग के इस दुकूल पे ,
रूठ कर तुम यूँ न जाओ
दिल मेरा लगता नहीं  ........

साथ ही जीवन मिला है
साथ ही हम  जाँयेंगे   ,
इस धरा पर प्यार का
संदेश दे कर जाँयेंगे  ,
तुम जरा सा मुस्कुराओ 
दिल मेरा लगता नहीं ..........

प्यार के जो क्षण मिले
आओ सजाएँ  प्यार से
बिन तुम्हारे प्यार के ,कोई
छंद बन पाता  नहीं  ,
गीत कोई गुन - गुनाओ
दिल मेरा लगता नहीं ........

अभिनन्दन नव वर्ष



नये वर्ष में मिलकर हम सब
नये - नये सपने बुन लें  ,
किस्म - किस्म के फूल यहाँ हैं  ,
उनमें से कुछ हम चुन लें  ।

आशाओं के नये पंख ले
जीवन- नभ में हम  उड़  लें  ,
नहीं करेंगे वैर किसी से
मन में यह निश्चय कर लें  ।

भ्रष्टाचार और कदाचार  का
साथ न देंगे जीवन में ,
अपने से छोटों की झोली
सदा प्यार से हम भर दें   ।

मातु - पिता गुरुजन की सेवा , का
व्रत हम धारण कर लें ,
हत्या कन्या - भ्रूण का ना हो
ठान के इसका प्रण कर लें  ।

ना जाने कि कौन सी कन्या
जग को तारने वाली हो ,
ऐसा ना हो अपने हाथों
नाश न अपना हम  कर लें  ।

नहीं गये गर मंदिर - मस्जिद
काज नये कुछ हम कर लें ,
किसी गरीब की कन्या को ही
हम थोड़ा शिक्षित कर लें  ।

हम मानव हैं मानव बन कर
जग में कुछ ऐसा कर लें
जिससे हो कल्याण विश्व का
इतिहास ऐसा रच लें  ।

अभिनन्दन नव वर्ष तुम्हारा
अमन चैन खुशहाली हो ,
विश्व के कोने - कोने में नित
ईद , होली ,दीवाली हो  ।
   
      -----  ( प्रकाशित )

Monday, December 16, 2013

ओ पहरुए देश के


ओ पहरुए देश के तू जाग ,
तुझको दूर जाना है ,
 छोड़ दे आलस्य ,गर ,
मंजिल को पाना है।

उठाओ जाम अपने जोश का ,
हुँकार भरना है ,
वतन के दुश्मनों का तुम्हें  ,
संहार करना है ।

लगे न जंग हाथों को ,
उठा तलवार , चलना है ,
हम मरेंगे या जियेंगे ,
सोच कर विचलित न होना है।

छिपे गद्दार जो घर में ,
कलम सिर उनका करना है ,
वतन के दुश्मनों से
सदा हुशियार रहना है।

छिड़ा संग्राम सरहद पर ,
वतन के पाशवां जागो ,
उठी है आँख दुश्मन की ,
वतन के नौजवाँ जागो ,
जागो किसानों और
जन -जन देश के जागो  .............. 

ओ पहरुए देश के ............

Thursday, October 31, 2013

मैं हवा का एक झोंका

मैं हवा का एक झोंका
मुँह न मुझ से फेरो तुम ।

पल दो पल की  जिंदगी ,
पल दो पल का है मिलन ,
एक पल ठहरूं न ठहरूं
आ भी जा मेरे सनम  ।

चाँदनी कितनी सुहानी
आज पूनम रात की ,
एक पल बैठो मेरे संग
तुम ह्रदय की रागिनि ।

आज दिल की बात कह लो
आज दिल कि बात सुन लो ,
फिर न जाने आज का पल
लौट कर आये न कल  ।

है नहीं मनुहार का पल
बस यही एक प्यार का पल ,
आ गले मिल जाएँ हम - तुम
भूल कर सब द्वंद्व हम ।

Sunday, August 18, 2013

बाट ताकते दिन है बीता .........

बाट ताकते दिन है बीता  ,
करवट  लेते , बीती  रात  ,
तेरे आने की चाहत   में   ,
मैं तो जागी  सारी  रात   ।
सोचा था,तुम आ जाते , तो ,
तुमसे करती  ढ़ेरों बात ,
सूरज को मैं , बाँध गाँठ में ,
नहीं  बीतने  देती  रात ।
सूरज निकला , हुआ प्रभात ,
बीत  गई  यह  काली  रात   ,
ढल कर ओस-कणों में आँसू ,
ढलक रहे , छू नीरज - गात  ,

बाट ताकते दिन है बीता ,
करवट लेते बीती  रात  ।

Saturday, August 17, 2013

ये देहरादून का शहर ...........


ये देहरादून का  शहर ,
ये देहरादून का शहर ………

हरी- भरी  हैं वादियाँ ,
शांत इसकी घाटियाँ ,
सब को है यहाँ खबर ,
ये देहरादून का शहर  .........

है द्रोण की तपस्थली ,
है  देवभूमि  देव  की ,
है मातृ  शक्ति का नगर ,
ये देहरादून का शहर ...........

पेड़  देवदार के, खड़े हैं आन -बान से ,
ये तो बात करते है, सीधे आसमान से ,
दे रहे हैं सीख ये - न शीश तू कभी झुका ,
अपनी सरहदों पे तुझको रखनी है कड़ी नज़र ,
ये देहरादून का शहर …………

अगर हो शत्रु  सामने ,
तू शत्रुओं पे वार कर   ,
दुश्मनों पे टूट पड़ तू   ,
बन के काल  का कहर ,
ये देहरादून का शहर ………

यहाँ के वीर नौजवाँ ,
हैं करते प्यार देश से ,
शान तिरंगे की ये तो ,
रखते  अपनी जान पर ,
ये देहरादून का शहर ……।

यहाँ पर बढ़ के एक से एक स्कूल है ,
यहीं तो देश का प्रसिद्ध दून स्कूल है ,
यहीं पे सैन्य-संस्था है सैनिकों के वास्ते  ,
पढ़े -लिखों  का है शहर ,
ये देहरादून का शहर ………

हैं मन्दिरें और मस्जिदें  ,
गुरुद्वारा और चर्च हैं  ,
आवाम के लिये तो है  ,
प्यार का ही इक डगर
ये देहरादून का शहर ……….

गली - गली , डगर - डगर ,
बुजुर्गों का है आश्रय  ,
जिनकी सीख का यहाँ पे ,
हो रहा बड़ा असर ,
ये देहरादून का शहर ………. 

Wednesday, July 31, 2013

हमें ये गाँव बुलाते हैं



















ये गुनगुनाती सी हवा,
ये लहलहाते खेत,
ये गाँव  की पगडंडियाँ ,
ये टेढ़े - मेढ़े  मेड़ ,
हैं ,मेरे मन को हुलसाते ,
हमें , ये गाँव बुलाते हैं   ।
ये मीठी , धान की खुशबू,
लरजते , गेहूँ की बाली ,
वो नीले फूल तीसी के ,
वो पीले फूल सरसों के ,
इशारे  मुझको करते हैं ,
हमें ये गाँव बुलाते हैं   ।

जहाँ , रख कांधो पर , विश्वास का
हल , कृषक  चलते हैं ,
बुआई धान की करते जहाँ ,
गाती कृषक बाला ,
झमक  कर घन बरसते हैं ,
हमें ये गाँव बुलाते हैं  ।

यह बस्ती है किसानों की ,
यह सच्चों का बसेरा है ,
निकल सूरज लगाता है ,
जहाँ, नित रोज फेरा है ,
जहां , मिल प्यार बोते हैं ,
हमें ये गाँव बुलाते हैं  ।

( 21-3-2012 )



Wednesday, July 17, 2013

चित साजन बिन सून




धनि - धनि - धनि  हैं  नारि   वै  ,
जिनके    साजन      संग  ,
बिन       साजो   -  श्रृगार    के  ,
दमकत      उनके     अंग    ।

गली  -  गली   झूलन    पड़ी  ,
हरी  -  हरी   डारी    कदम्ब  ,
राधा  -  मोहन    झूलिहैं  ,
बरसहीं    नभ    से     अंभ  ।

सावन    कारी   रात     को  ,
जियरा     मोर     डराहिं  ,
चंचल , दुष्ट ,  बिजुरी   चमक  ,
गरजत   हैं   नभ   माहिं   ।

बरसत  घन , घर फूस का  ,
टपकत    है   चहुँ   ओर   ,
नैनन    सावन    देखि    कै   ,
अंग   लागि    चितचोर     ।

सुख  जो   प्रिय  के   बांह   में  ,
कतहुं    न    मिलियै    और    ,
चित  साजन  बिन  सून   है    ,            
जइयौ     कोऊ        ठौर      ।
     

( 16 - 7 -  2013    की   रचना   )

   

Monday, July 15, 2013

देव भूमि की त्रासदी और पहाड़ की आवाज



                                
                                                                                  





















देव  भूमि पर आपदा आ गई थी ,
शिव ने अपनी जटा खोल  दिया   था ,
शिव का तीसरा  नेत्र  खुल  गया  था ,
पहाड़  हिल  गया  ,
पत्थरें  दरकने  लगीं  ,                     
गंगा  ने  विकराल  रूप
धारण  कर  लिया    ।                                                            
गाँव  के  गाँव  ,
भागीरथी  के  कुपित  शैलाब  में
तिनके  की  तरह  बह  गए ;
चारों  ओर  चीख  -  पुकार   ,
हर  और  तबाही  का  मंजर  ,
बड़े - बड़े  आलीशान   भवन  ,
होटल  धराशायी  हो  ,
जलविलीन  हो  रहे  थे  ,
त्राहि - त्राहि  का  शोर  ,
प्राण  बचाने  के  लिए  ,
जिसको जिधर रास्ता मिला ,
उधर  ही भागा   ।
प्रलय  ही  प्रलय   था  ,
क्या  आदमी ,  क्या  जानवर
 सभी  बह  रहे  थे
गंगा  की  लहरें  ,
अट्टहास  कर  रही  थीं  ,
पहाड़  टूट  कर
अपना  क्रोध  जता  रहे  थे
मानो  कह  रहे  हों -
तुमने  विकास  के  नाम पर  ,
मेरा  विनाश  ही किया  है ,
तुम्हारे  विकास   से
मेरा  दम  घुटने  लगा  है ,
डायानमाइट  की  चोट  से  ;
मेरे  सीने  में  दर्द  उठने  लगा   ।
तुमने  मुझे  कहाँ  से  नहीं  काटा  ?
हरे - भरे  पेड़ों   को  काट  कर  ,
मेरे  सीने  पर   हथौड़े  चला  कर ,
मेरा  सीना  छलनी   कर  दिया  है ,
पावन  गंगा  को  बाँध   कर   ,
इसकी अविरल  धारा  को  ,
गँदला  कर  दिया  है  ,
उसकी  पावनता  को  ,
नष्ट  कर  दिया  है ।
देव  और  देवर्षि  की  भूमि  को  ,
अपने  जूठन  और कचरे   से
अपावन  कर  दिया  है  ,
तुमने  अर्थोपार्जन  के  लिए  ,
मेरा  सर्वनाश  कर  दिया  है   ।
मैं  तिलमिला  उठा  ,
पहाड़  तिलमिला  उठा  ,
तब  ,
नदियों  ने  करबट  बदल  लिया  ......
अभी  तो  हमने  आधी  ही
करबट  लिया  है  ,
अब  भी  नहीं  चेत  पाए  , और  ,
मुझे  इसी  तरह  रौंदते  रहे  ,  तो  ,
मुझे  फिर  से  सबल  बनने   के  लिए  ,
 स्वयं  ही  रास्ता  बनाना  होगा ,
अपनी  मान  मर्यादा  ,प्रतिष्ठा के लिए ,
मुझे (इन ) स्वार्थी  इरादों  का ,
विनाश  करना  होगा । 









             


                                       
(    1 3 - 7 - 2 0 1 3  को  रचित    )

Sunday, June 30, 2013

हे ! पिता मेरे


हे   !  
पिता      मेरे     ,
तुम     गए     कहाँ      ?
मैं      भटक     गया      हूँ
इस     जग     में     ,
तुम    वापस      लौट      के     आ   जाओ      ,
है     व्यथित    ,   आकुलित      मन     मेरा    ,
इस    मन      को     आश     दिला     जाओ     ,
मैं       शैशवपन       साकार       करूँ     ,
कुछ    बीते    पल    को     याद     करूँ     ,
कहीं    खो    न    जाऊं    मैं    इस    जग    में   ,
तुम    मुझको       राह     दिखा     जाओ       ।

नहीं      बिसर     सका  
कुछ      भी    तो    मैं      ,
न       तेरा    स्नेह    ,    न    तेरा     प्यार     ,
कभी      रूठने       पर      मनुहार     ;
तेरी       गोद    में      आकर     मैं     तो
सब     कुछ     ही    था     पा       जाता     ,
तेरी      बाहों      में      घिर      कर      ,
सारा   आकाश      था     पा    लेता       ।

ऊँगली      पकड़   -  पकड़      मेरा
वह    ,   अ    ,    आ     ,     इ     ,   ई      सिखलाना     ,
रोज     सवेरे      गोद    में       लेकर      ,
भजन     भक्ति       का        सिखलाना      ,
यह      कल्ह     की    बात      ही      लगती       है        ,
यह     कसक       ह्रदय      को      मथती      है      ,
मन        सूना   -   सूना     रहता      है      ,
दृग     अश्रुपूर्ण       हो        जाता     है      ,
मन    दूर    बहुत     खो     जाता     है      -
तब      लगते      कितने     मेले      थे      ,
बहु     सर्कस      और      तमासे     थे       ,
अपनी     काँधों    पर     बिठला    कर      ,
तुम     सर्कस     दिखला     लाते     थे      ।

मीना    बाज़ार      का    क्या      कहना
जहाँ      बिकते    ढ़ेर      खिलौने      थे      ,
वह     घंटी    वाली     सायकिल      थी      ,
जिसमें    बस    एक    ही   पहिया   था      ,
लोहे    के   डंडे      से       बंध       कर     ,
वह    चलती      और    टुनकती    थी     ।

जब    हम      थोड़े      बड़े     हुए       ,
तब       स्कूल       मुझको      भिजवाया      ,
जब      स्कूल     से     पढ़कर      निकले      ,
तब       कॉलेज       मुझको     पिठवाया       ,
देकर       प्यार   -   दुलार    ढ़ेर       सा      
अपने     पैरों       खड़ा       किया     ,
जीवन    में    खुशियाँ     भर   कर     ,  फिर   ,
जीवन      मेरा     महकाया         ।

चन्दन     सम     ही पद - रज     पाकर     ,
जीवन   -  पथ      पर     चला       बढ़ा     ,
शुभ  आशीषों   के   ही  बल ,  मैं ,
उन्नति    के      सौपान      चढ़ा      ।

(   नोट  -  2 3 -  3  - 2 0 1 2   को   रचित   )

तेरी करूँ पूजा


जन्नत      से     भी     प्यारा       माँ     का     आँचल    लगता      है    ,
स्वर्ग    से    भी    ज्यादा     सुख   माँ     की   गोद   में   मिलता    है    ।   

माँ     की     ममता     के     आगे     पत्थर    भी       पिघलता      है     ,
माँ     की       छाती      से     केवल    अमृत     ही      छलकता      है      ।

माँ     की     बाहों      में    आकर      आकाश   भी       झुकता       है      ,
चाँद    और    सूरज    भी    माँ    की    आँखों     से    चमकता      है     ।

होंठों      पर      मुस्कान      सदा      मेरी   माँ     के    रहती         है       ,
उसकी     वाणी     में    तो      सदा     चन्दन      ही    महकता      है      ।

इस     दुनियाँ     में    माँ     मेरी     तुझ    सा     कोई   नहीं     दूजा       ,
भाग      हों     मेरे    ऐसे     कि     नित     दिन    तेरी    करूँ     पूजा      । 


Friday, June 28, 2013

लघु कथा - आदमी और जानवर

मालिक    की   मार     खा    कर    वह   घर    से   भाग   निकला   ।   इधर  -  उधर    घूमता    हुआ   ,  सड़क   के  अन्य    कुत्तों    से   ,  अपने   आपको   बचाता  ,   वह   एक  मैदान    में   पहुँच    गया    ।                                               
                         मैदान   के   ही    एक   सिरे   पर   ,  एक   घने   पेड़    के   नीचे      बैठ कर  वह   सुस्ताने    लगा    ।   वहाँ    बहुत    अच्छी     ठंडी     हवा    बह     रही   थी   ।  धीरे  -  धीरे   उसे   नींद   आ   गई  ।       वह वहीँ   सो   गया    ।              

                         जब   उसकी    आँख    खुली  ,   सवेरा     होने    को  ही  था  ।    उसे   रात  की   घटना    याद    आई   ।   अचानक   वह   उठा     ,   मैदान   के   चारों     ओर      दौड़ने     लगा   और   फिर    एक    ओर   दौड़   गया   ।   शायद   ,   उसे   याद   आया  ,     आज मालिक   को    अखबार    लाकर   कौन    देगा   ,  नींद   से   जागते   ही     मालिक     आवाज      लागायेगा   ,   मेरी    आवाज    नहीं    सुनकर    उनका    दिल   घबरायेगा ....................  वह    सरपट     दौड़ता     रहा    ।                                                                                                                      आखिरकार    वह   अपने   घर   पहुँच     गया   ।    पहले     उसने     घर  के   चारों     ओर   का चक्कर     लगाया    ,   फिर   दरवाजे    पर    आ   कर    रुका   ,  देखा   कि     आज    दरवाजा     खुला   ही  रह  गया     है   ,    उसका     मालिक     शांत     भाव     से    कुर्सी    पर     बैठा     है   ।

                         कुछ     क्षण     वह   भी    शांत    बैठा   रहा     ।   अचानक   वह     उठा   और    मालिक   की    गोद   में    आकर   ,  अपना    सिर     मालिक   की    छाती    से     सटा     लिया    ।     मालिक   ने   उसे  प्यार  किया    ,   उसके    सिर     पर    हाथ     फेरा    ,    उसकी    आँखे     भींगने     लगी    ,   मानो   वह   प्रायश्चित  कर   रहा   हो   और   कह   रहा  हो    -    मैं    जानवर   ही   सही   ,   अब    मैं    तुम्हे     अकेला     छोड़   कर    कभी    नहीं  जाऊँगा    ,   कहीं   नहीं    जाऊँगा .....................