आपका यह भावपूर्ण लेख पढ़ कर मुझे सुमित्रनंद पंत की कविता की ये पंक्तियाँ याद आ गईं -
" वियोगी होगा पहला कवि,
आह से उपजा होगा गान,
निकल कर आँखों से चुपचाप ,
बही होगी कविता अनजान ! "
आपने राह चलते दृश्य का अवलोकन कर और महसूस कर, जो इन पंक्तियों को लिखा , इससे स्पष्ट है इस छोटी सी समझे जाने वाली दृश्य भी , साहित्यकार और कवि ह्रदय को बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर देता है -
रास्ते में ये दो दृश्य बहुत महत्वपूर्ण संदेश दे गये। यह सज्जन सड़क के किनारे एक छोटी सी चाय की दुकान चलाते हैं और वहीं रहते हैं । सामने छोटी सी जगह में पेड़ पौधे लगाते रहते हैं, कभी हाथ में खुरपी , कभी पानी की बाल्टी
कमर झुकी हुई है, सीधे खड़े होना भी कठिन है । छोटे से कोमल पौधे को रक्षा कवच पहना रहे हैं,वह भी बांस की खप्पचियों का बना हुआ eco friendly 
नमन है आपकी लेखनी को।