Sunday, July 26, 2026

जिन्दगी के लिए

जिन्दगी के लिए ,
मुस्कुराना जरूरी है ,
रोनी सूरत देखना ,
कौन पसन्द करता है ,
यहाँ , सबको ,
तितलियों को , उड़ते - नाचते ,
फूलों को हँसते - गाते ,
बुलबुलों को चहकते ,
कोयल को कूजते ही देखना ,
अच्छा लगता है ,
कौओं की कांव - कांव ,
मैनों की चीख - चीं ,
और , दादुर का टरटराना ,
किसे अच्छा लगता है !
इसलिए ,
जिन्दगी में , मुस्कुराना जरूरी है  .........

20 - 07 - 2026 


कुछ हट कर

 कुछ हट कर 

1 लाख दुश्मनी रखो , नफरत रखो ,
   पर दिल के एक कोने  में ,
  थोड़ी सी जगह रखो , कि
  जब कभी वक़्त पड़े ,
  दुश्मन तुम्हारे घर आये ,
  और ,
  तुम दुश्मन के घर जाओ ,
  एक दूजे के फ़रिश्ते बन कर। 

2. अपनों ने दर्द दिए इतने , कि
    अब दर्द नहीं होता
    अब किसी से नुहब्बत का ,
     इज़हार नहीं होता ,
     औरों को हंसाने में ,
     मैं इतना रोया , कि
     अब , आँखों में ,
     अश्क का कोई कतरा नहीं होता। 

3. लाख दर्द हो दिल में ,
     लब पर , नहीं आता ,
      मुस्कुराने की आदत है मेरी ,
      इसलिए मुस्कुराता हूँ ,
      जानता हूँ -
      कुछ देर ही सही ,
      दिवस का अवसान होने वाला है ,
      शाम होने वाली है ,
      स्याह रात भी आएगी ,
       गुज़र जायेगी ,
       सवेरा रोज आता है   .........













































Saturday, July 25, 2026

आषाढ़ माह का सुन्दर वर्णन। 

आप की यह बगिया तो सच ही प्रकृति का गुणगान करती है। फूल - पौधे से लेकर आम लीची के पेड़ों का संगम है और भिन्न - भिन्न पक्षियों का आश्रय भी। यह पक्षी देहरादून में बहुतायत मिलते हैं। इसे घुघुती, फख्ता , पंडुक , चित्रोखा आदि  कई अन्य नामों से जाना जाता है। अंग्रेजी में इसे हम Spotted Dove कहते हैं। नीचे एक- दो फोटो है। 

 पौधों     नामों 

आपका यह भावपूर्ण लेख पढ़ कर मुझे सुमित्रनंद पंत की कविता की ये पंक्तियाँ याद आ गईं -

" वियोगी होगा पहला कवि, 

   आह से उपजा होगा गान,

   निकल कर आँखों से चुपचाप ,

    बही होगी कविता अनजान  ! "

आपने राह चलते दृश्य का अवलोकन कर  और महसूस कर, जो इन पंक्तियों को लिखा , इससे स्पष्ट है इस छोटी सी समझे जाने वाली दृश्य भी , साहित्यकार और कवि ह्रदय  को बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर देता है -

रास्ते में ये दो दृश्य बहुत महत्वपूर्ण संदेश दे गये। यह सज्जन सड़क के किनारे एक छोटी सी चाय की दुकान चलाते हैं और वहीं रहते हैं । सामने छोटी सी जगह में पेड़ पौधे लगाते रहते हैं, कभी हाथ में खुरपी , कभी पानी की बाल्टी 🌹कमर झुकी हुई है, सीधे खड़े होना भी कठिन है ‌। छोटे से कोमल पौधे को रक्षा कवच पहना रहे हैं,वह भी बांस की खप्पचियों का बना हुआ eco friendly 🌹

नमन है आपकी लेखनी को।