Saturday, July 25, 2026

आपका यह भावपूर्ण लेख पढ़ कर मुझे सुमित्रनंद पंत की कविता की ये पंक्तियाँ याद आ गईं -

" वियोगी होगा पहला कवि, 

   आह से उपजा होगा गान,

   निकल कर आँखों से चुपचाप ,

    बही होगी कविता अनजान  ! "

आपने राह चलते दृश्य का अवलोकन कर  और महसूस कर, जो इन पंक्तियों को लिखा , इससे स्पष्ट है इस छोटी सी समझे जाने वाली दृश्य भी , साहित्यकार और कवि ह्रदय  को बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर देता है -

रास्ते में ये दो दृश्य बहुत महत्वपूर्ण संदेश दे गये। यह सज्जन सड़क के किनारे एक छोटी सी चाय की दुकान चलाते हैं और वहीं रहते हैं । सामने छोटी सी जगह में पेड़ पौधे लगाते रहते हैं, कभी हाथ में खुरपी , कभी पानी की बाल्टी 🌹कमर झुकी हुई है, सीधे खड़े होना भी कठिन है ‌। छोटे से कोमल पौधे को रक्षा कवच पहना रहे हैं,वह भी बांस की खप्पचियों का बना हुआ eco friendly 🌹

नमन है आपकी लेखनी को।


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