Sunday, August 9, 2015

आइसक्रीमवाला

देखो, आइसक्रीमवाला आया ,
लाल - पीले ठेलियों में ,
रंग  - बिरंगे आइसक्रीम लाया ,
देखो आइसक्रीमवाला आया।

मैले - कुचैले कपड़ों में भी ,
यह लगता है सबको प्यारा ,
क्योंकि इसके आ जाने से ,
गर्मी से  मिलता छुटकारा।

जहाँ कहीं ये रुक जाता है ,
वहीँ पे मेला लग जाता है ,
बच्चे ,बूढ़े ,दादी ,नानी ,
सभी के मन को यह भाता है।

खुद गर्मी में घूम - घूम कर ,
औरों को राहत पहुँचाता ,
अपने अंदर की बेचैनी ,
कभी नहीं है , वह बतलाता।

सभी के तन -मन की गर्मी को ,
आइसक्रीम से दूर भगाता ,
पर खुद गर्मी से बचने को ,
कभी नहीं वह आइसक्रीम खाता।
                
क्योंकि , उसके तन - मन से ज्यादा ,
धधक रही है पेट की ज्वाला ,
इस ज्वाला की जलन मिटाने ,
वह , दिन भर फिरता मारा - मारा।
                   
                            ------  मंजु  सिन्हा  ।



Monday, July 20, 2015

पावस ने छंद रचे

पावस ने छंद रचे , तरुवर के पात- पात ,
जल धारा बूँदों की , लिपटी है गात- गात।

अंबर को चूम रहा , कजरारा बदरा है ,
मतवारे मौसम में , किसका दिल ठहरा है !
बैठे शुक शाखों पर ,करते हैं राग  - बात ,
पावस ने छंद रचे , तरुवर के पात - पात।

मखमल सी दूब बिछी , मन मयूर नाच रहा ,
सतरंगी इन्द्रधनुष , सबके मन मोह रहा ,
प्रेम गीत लिख डारे  , सावन ने आज रात ,
पावस ने छंद रचे , तरुवर के पात - पात।

बदरा भी  लहरा कर , घन, घन , घन घहरा कर ,     
अंबर जल बरसा कर , धरती को विहसाँ कर ,           
चीड़ औ चिनार संग , करते हैं रसिक  बात ,
 पावस ने छन्द रचे तरुवर के पात -पात। 

Thursday, July 9, 2015

तब और अब

तब आते थे मेहमान ,
मनता था त्योहार ,
बनते थे पकवान,
मिलती थी खुशियाँ ,
लगाते थे ठहाके ,
होते थे धमाके।

अब , देखते हैं कॉमेडी नाईट ,
ढूंढते है उसमें खुशियाँ ,
ठहाके लगाते हैं वो ,
मुस्कुराने की कोशिश करते हैं हम।

पहले घर आती थीं खुशियाँ ,
अब खुशियाँ ढूंढते हैं हम ,
फिर भी मिटा न सके गम ,
क्योंकि बदल गए हैं हम।

तब जो लोग होते थे पैसे वाले ,
बनबाते थे कुंआँ और तालाब ,
राहगीरों और प्यासों के लिए ,
अब , जो लोग होते हैं धनवान ,
लगाते हैं " वाटर - प्लांट ",
छीनते हैं गरीबों का पानी ,
भरते हैं बोतलों में ,
और कमाते हैं पैसे।

तब , गुरुओं को मानते थे भगवान ,
झुकाते थे सिर , देते थे सम्मान ,
अब , जिनको माना गुरु ,
वही चरित्रहीन निकले ,
शिक्षा - दीक्षा क्या देंगे वो ,
वो तो खुद ही गरीब निकले।

तब , ड्योढ़ी पर बँधती थी गाय ,
देती थी दूध ,
पीते थे बच्चे ,
होते थे मजबूत।
अब , गेट पर बँधता है कुत्ता ,
तोड़ता है मुफ्त की रोटी ,
हिलाता है दुम , और
करता है चापलूसी थोथी।

तब , घर के आस - पास लगाते थे -
फूल , फल व सब्जी की बेल ,
अब , गमलों में लगाते हैं कैक्टस ,
पेड़ों पर चढ़ाते हैं अमरबेल।

(  मंजु सिन्हा द्वारा रचित  )
 प्रकाशित -  अगस्त 2015



Monday, June 8, 2015

जब हमने कहा सूरज से ( बाल-गीत )

जब हमने कहा सूरज से
ज़रा अपना रूप दिखाओ ,
वह हँस कर बोला मुझसे -
तुम मेरे पास तो आओ।

मैंने तब बोला उससे -
मैं कैसे पास में आऊँ ,
तुम इतने दूर हो रहते
मैं पैदल न चल पाऊँ।

तब हँस कर बोला सूरज -
नित पास तेरे आता  हूँ ,
मैं कई रूपों का नटवर
नित संग तेरे रहता हूँ ।

शीत ,घाम वर्षा में ,
वह मैं ही तो रहता हूँ ,
ये तीनों ही ऋतुएँ हैं ,
जिसमें विचरण करता हूँ।

जाड़े में तुम मेरी
बाँहों में समा जाते हो ,
पर गर्मी जब है आती ,
तुम घर में छिप जाते हो।

बारिस के मौसम में
बादल बन कर हूँ आता ,
घनघोर घटा गर्जन कर ,
धरती पर जल बरसाता।

मैं  भी हूँ ख़ुशी मनाता ,
तुम भी हो ख़ुशी मनाते ,
पानी में छप - छप करते ,
कागज की  नाव चलाते।


एक थी अरुणा

एक थी अरुणा ,
उम्र भर झेलती रही ,
एक गुनहगार के गुनाह का  दंश।
न वो मर सकी ,
न वो जी सकी ;
जीवन भर का संताप दे ,
गुनहगार मौज करता रहा
शाशन की अकर्मण्यता पर।
उसने मौत माँगी ,
मौत न मिली ,
सजा मिली ,
उम्र भर दंश झेलने का  .... 
कौन देगा हिसाब
उसके टूटे सपनों का ?
उसके मन और तन पर
रेंगते , बिलबिलाते
असंख्य कीड़ों का ?
क़ानून के हाथ बँधे हैं ,
न्याय की तराजू में पासंग है।
उठो स्वयं खड़े हो ,
स्वयं ही लड़ना होगा ,
करना होगा हिसाब बराबर
इन आततायियों से  .......
                     
( श्रद्धांजलि कविता -  A tribute to Aruna shanbaug )
                                               

अभी बहुत है शेष

अरे ! रुको ,
मत बिको चंद डॉलर की खातिर ,
अभी देश की गरिमा पर
मत दॉँव लगाओ ,
अभी बहुत है शेष
तरुण की तरुणाई में ,
ढलने को है तिमिर निशा ,
आने में है नहीं देर ,
अब अरुणाई में  …....

अरे ! रुको ,
मत घुटने टेको किसी के आगे ,
अभी देश की महता पर
मत प्रश्न लगाओ ,
अभी बहुत है शेष
हमारी अँगड़ाई में ,
होने को है प्रात - पुञ्ज ,
कूक रही कोयलिया ,
है अमराई में  ……

             ------  ( प्रकाशित )

Sunday, May 10, 2015

हाँ ,माँ ऐसी ही होती है

मैंने जब इस जग से पूछा ,
बतला , माँ कैसी होती है ?
वह बोला -सम्पूर्ण जगत को ,
वह तो , आलोकित करती है।
गंगा-जल सी वह  निर्मल है ,
बहुत मधुर वह ,बहुत सरल है;
पर, पर्वत सा दृढ़ होती है,
हाँ, माँ ऐसी ही होती है।

रोम-रोम से ममता जिसके ,
फूट रही झरना सी  बन कर ,
करती है वह प्यार ह्रदय से ,
अपनी सुख-सुविधा को ताज कर।

खुद काँटो पर सो जाती है ,
पर,संतति को सुख देती है।
वह त्याग की सच्ची मूरत है ,
हाँ ,माँ ऐसी ही होती है।

चाहे आगे हो काल खड़ा ,
सम्मुख उसके आ जाती है ,
कहती - वह तो है माँ सबकी ,
सीने पर गोली सह खाती है।
जीवन न्यौछावर कर जाती ,
वह,पीछे कभी नहीं हटती।
माँ वीर, साहसी होती है ,
हाँ ,माँ ऐसी ही होती है।




Thursday, May 7, 2015

गरमी आई

गरमी आई , गरमी आई ,
कितनी सारी चीजें लाई।
आम और लीची है लाई ,
तरबूज व खरबूजे लाई ।
शरबत लाई , रसना लाई ,
हम सब मिल कर पीते भाई।

गरमी आई , गरमी  आई ,
ठंढी - ठंढी  चीजें   लाई।
आइसक्रीम  व कुल्फी लाई ,
बर्फ का गोला भी है भाई।
ठंढा - ठंढा दूध , मलाई ,
मन को बहुत ही भाता भाई।

गरमी आई , गरमी  आई ,
साथ में छुट्टियाँ भी है लाई।
दिन भर घर में मौज मनाते ,
माँ के काम में हाथ बँटाते।
रंग - बिरंगे  चित्र  बनाते ,
घर को भी हैं खूब सजाते।

गरमी  आई , गरमी  आई ,
बहुत सुहानी शाम है  लाई ।
सुबह-शाम हम सैर को जाते ,
दोनों टाइम खूब नहाते।
अब पानी से डर नहीं लगता ,
पानी हमको अच्छा लगता।

( मंजु  सिन्हा द्वारा रचित  )






Sunday, May 3, 2015

आज तुम गाओ मंगल गान

हुआ प्रकृति में नया विहान ,
आज तुम गाओ मंगल गान।
सरसों फूली , बौर है महका ,
महुआ से है वन मदमाया।
हवा वसंती चली , कि, ऐसी ,
सुध-बुध भी मन का विसराया।
गीत भृंग , गाये  फूलों पर ,
लहरें मदमाती कूलों पर।
प्रकृति विहँसी , आया विहान ,
आज तुम गाओ मंगल गान।

Wednesday, April 8, 2015

साथी तुम देना सब साथ रे ….. ( बाल- गीत )

सूरज जो ढल जायेगा ,
अँधियारा घिर आयेगा ,
तारों की आयेगी बारात रे ,
हो,चँदा से होगी मुलाक़ात रे. .....

आँखों में निंदिया आये ,
निंदियों में सपने आये ,
सपनों में परियों की बारात रे ,
हो ,ख़ुशियों की बाँटे सौगात रे........

रेशम के रथ पर सज कर ,
सूरज पूरब से आये,
भागेगा अब तो काली रात रे ,
हो ,उतरेगा नभ से सुप्रभात रे  ........

कलियाँ खुशबू बिखराये ,
चिड़ियाँ चह - चह कर गाये ,
मन की बतलाये अपनी बात रे ,
हो , जीवन खुशियों की सौगात रे  ……

आओ हम मिल कर गायें ,
मेहनतकश हम बन जाएँ ,
आलस को देंगे हम सब मात रे ,
हो, साथी तुम देना सब साथ रे   ….... ( बाल- गीत  )

Sunday, April 5, 2015

नहीं हताश कभी भी होना

गम क्या करना उन सपनों का ,
छूट गये तो छूट गये ,
शोक आसमां नहीं मनाता ,
कितने तारे टूट गये।

हेमंत ,शिशिर, पतझड़  ,वसंत ,
चले गये  तो चले  गये ,
सावन में सरसिज खिल जाते ,
सरवर सब जीवंत भये।

पाना खोना ,फिर पा जाना ,
जीवन के सरगम हैं ये ,
मझधारों ने हार मान ली ,
जो सागर के पार गये।

नहीं हताश कभी भी होना ,
जीवन में जो छूट गये ,
नई डगर पर बढ़ जाना तुम ,
रच कर मन के गीत नये।


Friday, April 3, 2015

राही थक कर बैठ न जाना

राही थक कर बैठ न जाना ,
बहुत दूर है तुमको जाना।
अस्ताचल को जाए सूरज ,
खोना नहीं कभी भी धीरज।
गहरे में  जो भी है पैठा ,
उसके हाथ लगे हैं नीरज।

राही थक कर बैठ न जाना ,
बहुत दूर है तुमको जाना।

है अंधकार चतुर्दिक फैला ,
घोर सघन नीरवता फैला।
तेजोमय के सम्मुख यारा  ,
नहीं कभी ठहरा अँधियारा।
पल भर का , है ये अंधेरा ,
आने  को है जल्द सबेरा।

राही थक कर बैठ न जाना ,
बहुत दूर है तुमको जाना।


Wednesday, March 18, 2015

बाल - गीत













          
             ( १ )

भालू बोला यम - यम - यम  ,
बारिश बरसा झम -झम -झम ,
नदियाँ अब भर जायेंगी ,
साथ मछलियाँ लायेंगी ,
ढेर मछलियाँ लायेंगे ,
दावत खूब उड़ायेंगे।

           














               (२ )
घोड़ा बोला हिन् -हिन् -हिन् ,
बारिश बरसा झिम-झिम-झिम ,
हरियाली छा जायेगी ,
हरी घास उग आयेगी ,
छक कर घास चबायेंगे  ,
हम तो मौज मनायेंगे ।
















            (३) 
बंदर बोला खें -खें -खें ,
पोंछ रहा अपनी आँखें ,
बारिश बरसा झर -झर -झर ,
काँप रहे हैं हम थर-थर-थर ,
आ जायेगा  मुझे बुखार ,
दौड़ के लाओ कंबल चार।
















       
               (४)
बोली गिलहरी टिक-टिक -टिक ,
बारिश बरसा टिप-टिप -टिप ,
टपक रहा घर मेरा यार ,
सह न सका बूँदों की मार ,
जल्दी से मिस्त्री बुलाओ ,
मेरे घर को तुरंत बनाओ।














             (५)
चिड़िया बोली चीं -चीं -चीं ,
बारिश का मौसम है जी ,
वर्षा होने से पहले ,
दाने कुछ चुन लायें जी ,
शाम ढ़लने से पहले ही ,
लौट हमें है आना जी।














            ( ६ )
मेंढक बोला टर -टर -टर ,
बरसा पानी टिपर-टिपर ,
बोली मेंढकी ढम्मक -ढम ,
बड़ा सुहाना है मौसम ,
कोई गाना गाओ जी ,
मेरा दिल बहलाओ जी ,
मेंढक बोला आता हूँ ,
टर -टर -टर टर्राता हूँ।
   

Wednesday, March 11, 2015

फागुनी- गीत


















फागुन में ज्यों पात-पात पर ,यौवन है छा जाता ,
बच्चे ,बूढ़े , युवा का दिल भी ,हुलसित है हो जाता।

पाकर फागुन की आहट ,है महुआ भी गदराता  ,
तन गोरी का खिल-खिल जाता ,जब वसंत है आता।

भौंरा चूमे फूल-फूल को ,प्यार बाँटता जाता ,
पाकर गंध - सुगंध बौर के ,मधुकर है बौराता।

पवन बाबरा होकर फिरता ,मलयानिल सा बहता ,
झूम-झूम खेतों में सरसों ,गीत वसंती गाता।

 है पलाश भी खिल-खिल जाता ,जंगल खूब दहकता ,
प्रकृति के हर अंग-रंग में ,मदन केलि है करता।

हर रंग का मेल है फागुन ,सबरस है बरसाता ,
सब के तन-मन रँग देने को ,यह फागुन है आता।

Friday, February 13, 2015

रात-रात भर सो न सका मैं

रात-रात भर सो न सका मैं ,
जागा सारी रात ,
रही सताती मुझको तो बस ,
तेरी भोली बात।

इन हथेलियों में थामे था ,
तेरे कोमल गात ,
देख रहा था ,चाँद सामने ,
आँखें थी मदमात। 


मौन शब्द था ,अधर  बंद थे ,
नयनों की थी बात ,
भले होंठ ,ये खुले नहीं ,पर ,
मौन मिली सौगात।

नहीं स्वप्न था ,सब कुछ सच था ,
स्वासें करतीं बात ,
धीरे-धीरे भींग रही थी ,
चुपके-चुपके रात।

शुभ्र निशा के मधुर  क्षणों में ,
हुई सरस बरसात ,
टूट गये तटबन्ध सहज ,जब ,
मिले गात से गात।

मन के अन्दर ,कोलाहल था ,
प्रश्नों की बरसात ,
पर , निश्छल सौंदर्य ,सो रहा ,
रख काँधों पर गात।

रात -रात भर ,सो न सका मैं ,
जागा सारी रात।

लो , वसंत आ गया

 

चितवन से, जब कामदेव के , प्रीति - वाण चल जाता ,
दिग-दिगंत के रोम-रोम में ,मद वसंत छा जाता।

वन-उपवन ,उपवन-वन ,कानन ,पवन बाबरा फिरता ,
डार -डार पर फूल बिहँसते ,अलि गुंजन है करता।

झूल आम्र की डार , बौर भी , सौरभ खूब लुटाता ,
चैत मास, फूले महुआ ,जब , वन सुरभित हो जाता।

अमलतास,सेमल,पलास भी  , लहक- लहक सा जाता ,
मानो ,नवयौवना धरा के  , स्वागत में बिछ जाता।

पिक पुकार  में कोयलिया का , स्वर ,पंचम हो जाता ,
प्रत्युत्तर में ,छिप कर पिक भी ,उसको खूब रिझाता।

फूले सरसों ,खेत-खेत में , जब वसंत है आता ,
पनघट पर निहुरे गोरी का , यौवन है मदमाता।

होलिहार के गीतों पर है , ढोलक खूब ढमकता ,
अल्हड़ गोरी के पैरों में , पायल खूब झनकता।

शुक ,पिक ,खंजन का कलरव भी , मन को है भा जाता ,
" लो , वसंत आ गया ,पथिक रे ," संदेशा दे जाता।                                                                                            
   (   नोट  : -  लखनऊ से प्रकाशित मासिक पत्रिका  " प्राची प्रतिभा "  मार्च 2016 में प्रकाशित  )




Monday, January 26, 2015

लड़की

बहुत भोली है वह लड़की ,
मैं जिसको प्यार करता हूँ ,
नज़र लग जाये ना उसको ,
ज़माने से मैं डरता हूँ।

फ़लक में उड़ने की चाहत ,
उसे भी होती तो होगी ,
मगर ज़हरीले मौसम से ,
उसे भी डर तो लगता है।

अगर जीना है दुनियाँ में ,
तो , फिर संघर्ष भी होगा ,
ये सच है , हौसलों से ही ,
फ़लक तक पहुँचा जाता है  

उसे हिम्मत दिलाता हूँ ,
यही बातें बताता हूँ ,
बेटी है वह सब की ही ,
उसे जीना सिखाता हूँ।

Tuesday, December 9, 2014

एक कविता - अनाम सी


जाड़े के मौसम की विदाई हो रही थी ,
वसंत चुपके-चुपके पाँव पसार रहा था ,
सुबह के वसंती बयार में ,
एक दिन ,
मैंने भी घूमने का मन बनाया ,
निकल पड़ा तड़के ,
खूब सवेरे।
सूरज नहीं निकला था ,
पर ,
रोज सवेरे घूमने के शौक़ीन
सड़क पर निकल पड़े थे ,
इक्का -दुक्का ही सही ,
कोई जॉगिंग कर रहा था ,
कोई दौड़ लगा रहा था ,तो ,
कोई आराम से
टहल रहा था.…
मैंने देखा-
अलग-अलग बच्चों की टोलियाँ ,
जिनमें कुछ लड़के थे ,
कुछ लड़कियां भी ,
सभी के हाथ में मैला सा ,
एक,एक थैला था ,
सभी ,अलग-अलग दल में ,
कूड़े के ढ़ेर में धँसे पड़े थे ,
मानो ,उस में से हीरा ढूंढ रहे हों।
आगे बढ़ा ,
देखा-कुछ बूढ़ी औरतें
सड़क किनारे बोरी बिछा कर बैठ गईं हैं ,
आते-जाते राही से
भीख में कुछ पा जाने की जुगत में ,
जो कोई भी सामने से गुजरता है ,
दुआ देती है ,ढेरों ,
पर ,शायद ही कोई
उसकी झुर्री पड़े चेहरे को देखता हो ,
शायद ही कोई
उसकी काँपती कमजोर हथेलियों  पर
"एक" का सिक्का रख जाता हो।
कुछ और आगे बढ़ा
एक औरत ,
अपने तीन-चार बच्चों के साथ
जिनमें से एक उसकी गोद में है ,
एक उसके कंधे पर ,
एक-एक उसके बाएँ और दाएँ
हाथ की ऊँगलियाँ थामे
आवाज लगाती
बढ़ रही है -" कोई तो दया करो ",
उसका चेहरा देख कर लगता है ,
उसे "पीलीया" है
"अनीमिया "तो होगा ही ,
न उसके तन पर पूरे कपड़े थे ,
न उसके बच्चों के तन पर ,
और जो थे ,मैले-कुचैले थे ,
सिर के बाल उलझे और अस्त-व्यस्त ,
फटे कुर्ती से झांकता
उसका जोबन ,मानो
इन्सानियत का मुँह चिढ़ाता हुआ।
मैं कुछ और आगे बढ़ा ,
अब कुछ-कुछ सुबह होने लगी थी ,
सड़क किनारे
एक-दो चाय की दुकान खुल गई थी ,
बहार बेंच लगा था ,
कुछ लोग बेंच पर बैठे थे ,
चूल्हे पर चाय उबाल रही थी ,
जिसकी खुशबू हवा में तैर रही थी ,
आठ-नौ साल का एक लड़का ,
जिसकी आँखों में
नींद अब भी मचल रही थी  ,
बेंच पर बैठे लोगों को,
चाय का ग्लास थमा रहा था ,तो ,
किसी को बिस्कुट का प्लेट।
लड़का बिस्कुट के प्लेट को ,
ललचाई नजर से देख रहा था ,
चाय की जूठी ग्लास और प्लेट उठा कर ,
वह दुकान के बाहर किनारे बैठ कर
धोने लगता है ,देखता है -
किसी ने प्लेट में बिस्कुट छोड़ दिया है ,
लड़का ,मालिक की आँख बचा कर
बिस्कुट मुँह में गड़प कर जाता है।
मेरा मन कहीं दूर उड़ चलता है ,
मैं और आगे बढ़ता हूँ।
अब यह रास्ता,
सीधे सरकारी अस्पताल की ओर जाता है
इसके आगे घंटा घर की ओर ,
फिर आगे,,,,,,,,
तभी देखता हूँ
अस्पताल के बाहर गेट पर
लोगों की भीड़ लगी है ,
कुतूहलबस ,
मैं भी भीड़ के पास खड़ा होता हूँ ,
ज्ञात हुआ -एक औरत ,
आधी रात को अस्पताल आई थी ,
उसके पेट में बहुत दर्द था ,
बच्चा होने वाला था ,
डॉक्टर ने उसे
अस्पताल में भर्ती नहीं किया ,
औरत अस्पताल के बहार गेट पर
तड़पती रही ,रात भर ,
और अंत में ,
उसने सड़क पर ही
बच्चे को जन्म दे दिया है।
मेरा ध्यान कुछ दिन पहले
अखबार में छपे ,
एक समाचार पर जाता है ,
पहाड़ के गाँव से एक गर्भवती औरत
एक अस्पताल गई ,
वहाँ से उसे दूसरे ,फिर वहाँ से तीसरे  ……
आवागमन का साधन
केवल चारपाई की खटोली ,जो
चार लोग ढ़ो रहे थे ,
औरत ने रास्ते में ही
बच्चे को जन्म दे दिया ,
आस-पास के गाँव की औरतों ने
उसे संभाला ..... …
तभी सायरन की आवाज से
मेरा ध्यान भंग हो जाता है,
पुलिस आ गई थी ,शायद,
किसी ने पुलिस को फोन किया हो ,
मैं वहाँ से घर की ओर चल पड़ा
सोचता हुआ -
कहाँ है शिक्षा का अधिकार ,
कहाँ है भोजन का अधिकार ,
कहाँ है स्वास्थ्य का फ़लसफ़ा ,
कहाँ है बाल-श्रम क़ानून ,
कहाँ है जननी-सुरक्षा योजना ,
कहाँ है ,कहाँ है ,कहाँ है......

            -----   ( प्रकाशित )

आज भी

कौन कहता है -
युग बदल गया है ?
नाम बदल जाने से
न युग बदलता , न युग का धर्म ,
इतिहास के पन्नों का सच
आज भी जीवित है।
साँप फुफकारना नहीं छोड़ता ,
नीच, नीचता नहीं छोड़ता ,
हिंस्र पशु ,हिंसा नहीं छोड़ता ,
साधु ,साधुता नहीं छोड़ता ,
वही आसमां ,वही  सूरज ,
वही चाँद ,वही सितारे ,
सब कुछ तो है
वैसे ही।

आज भी  ' यशोधरा ' सोती है
' सिद्धार्थ ' को बाहों में भींच कर ।
आज भी  ' सिद्धार्थ '
' यशोधरा ' की बाँहों  से फिसल जाता है ,
किन्तु,वह न तो  ' बुद्ध ' बन पाया है ,
न ही मनुष्य।
आज का आदमी ,
बस , भटकता हुआ घूम रहा है ,
इधर-उधर ,
शान्ति की तलाश में  …… ।

आज भी  ' कुंती ' जीवित है ,
जो अजन्मे बच्चे को
मार देती है 'कोख ' में,
या फिर ,
जन्म लेते ही ,
पोटली में लपेट कर ,
फेंक आती है
कूड़े के ढेर पर ,
या फिर
किसी कँटीली झाड़ी में ,
उसके अपने भाग्य पर  ....... ।
           
हर रोज ही ,
' महाभारत ' होता है ,
घर के अन्दर ,
घर के बाहर ,
विद्या के मंदिर में ,
खेल के मैदान में ,
कार्यालय में ,
राजनीति के गलियारों में ,
और अपने ' मन ' में भी।

आज भी ' द्रोणाचार्य '
छल से
काट ले रहे हैं
' एकलव्य ' का अँगूठा।
आज भी
' अभिमन्यु ' घेर लिया जाता है
' कौरवों ' की सेना द्वारा।
                
' दुर्योधन  ' आज भी जीवित है ,
मरा नहीं है ,
' रक्तबीज ' की तरह
वह सम्पूर्ण पृथ्वी पर
छा रहा है।
आज भी , ' द्रौपदी '
भरे बाजार ,
विवस्त्र की जाती है ,
आज भी नारियों की  'अस्मिता '
दाँव पर लगी है।
' भीष्म ' विवेकशून्य हो गए हैं ,
महाराज  ' धृतराष्ट्र 'की आँखों पर
आज भी पट्टी पड़ी है।
महारानी  ' गांधारी ' ,
पुत्र विमोह में आसक्त
' उचित '- ' अनुचित ' का भेद
करना नहीं चाहती  ....... ।

' राम '  आज भी
वन-वन भटक रहा है।
' रावण ' आज भी
अट्टहास कर रहा है ।
आज भी
' सीता ' छली जा रही है ,
आज भी
अनगिन अग्नि परीक्षाएं
उसका इम्तिहान ले रही हैं।
आज का  ' राम '  विवश है ,
' लक्ष्मण ' के तूणीर में
तीर नहीं है ,
धनुष शांत पड़े हैं।

कौन होगा
युग-परिवर्तक ?
कौन बदलेगा इतिहास ?
कौन मेटेगा
इतिहास के पन्नों पर ,
उकेरे हुए,
त्रसित चेहरों के  ' अक्षर ' ?
कौन समेटेगा
जनमानस की आँखों में उठती ,
वितृष्णा और क्रोध की लहर ?
आखिर कौन ?
कौन ? कौन ? कौन ?

  (  नोट : - कोलकाता से प्रकाशित मासिक पत्रिका  " वागर्थ " दिसम्बर 2916 में यह कविता प्रकाशित हुई है  )

जाने कब तिलस्म टूटेगा ?

 जाने कब तिलस्म टूटेगा  ?
कब सपनों का महल बनेगा ?
कब मन की पीड़ा टूटेगी ?
मौन न जाने कब बोलेगा ?

इन्तजार में बीती घड़ियाँ ,
ढर -ढर , ढरके मोती लड़ियाँ।
धूप छिपी घर के पिछवाड़े ,
दौड़ के आयेंगे अँधियारे।
मन भी दूर चला जायेगा  ,
चल कर दूर भटक जायेगा .
जाने कब तिलस्म टूटेगा ?
कब सपनों का महल बनेगा ?

मौन हुई हैं सभी दिशायें ,
धूमिल सी हैं सब आशायें।
बस केवल झींगूर  स्वर है ,
मन के अन्दर ही खंजर है।
सन्नाटा भी नहीं बोलता ,
कैसे सन्नाटा टूटेगा ?
जाने कब तिलस्म टूटेगा ?
कब सपनों का महल बनेगा ?

अरे मनुज ! क्या सोच रहा है ?
प्रात क्षितिज रवि डोल  रहा है।
अँधियारा कब तक ठहरा है ,
यह भी दूर चला जायेगा।
मन की गाँठें खोल के रखना ,
देखो सूरज आ जायेगा।
शायद , तब तिलस्म टूटेगा ,
तब सपनों का महल बनेगा।