Saturday, November 8, 2014

दरिया है तू














दरिया है तू , मैं नदी का किनारा ,
तू मौजों की धारा , मैं तेरा सहारा।

बाहों में मेरी सिमट कर बहो तुम ,
अतल,दिल की गहराइयों में बसो तुम।

 
धवल चाँदनी भी तुम्हे दुलराये ,
अँधेरे तुम्हें थपकियाँ दे सुलाये।

लहरों के सपने तुम्हें गुदगुदाए ,
हवायें तुझे प्यारी लोरी सुनायें।

हुई जो सुबह ,जागी सूरज की किरणें ,
बड़े भाव से तुम लगी फिर से बहने।

पतवार ने छू लिया गोरे तन को ,
बल खा के , हँस कर लगी तुम मचलने  ।

दरिया है तू ,मैं नदी का किनारा ,
तू मौजों की धारा ,मैं तेरा सहारा।

Friday, October 31, 2014

एक ग़ज़ल


ज़िन्दगी  कितनी आज सस्ती है ,
क़ातिलों की  जहाँ पे बस्ती है ,
ख़ौफ़ भी इनसे हैं डरा करते ,
मौत की रूह काँप जाती है।

ऱोज बनते हैं ,तोड़े जाते हैं ,
घऱ अमीरों के ऐसे होते हैं ,
न पूछ हाल मुफ़लिसों का,
खुले आसमां में सोते हैं।

घऱ चिराग़ों  रौशनी पाते ,
घऱ के आँगन इन्हीं से हैं छाजते ,
रखना महफूज़ बद्हवाओं से ,
घर चिराग़ों से भी जला करते।

गो कि वे अपने ही पड़ोसी हैं ,
बंद अपने दरों में रहते हैं ,
यूँ भी ख़ामोश ना रहा कीजै ,
वक़्त की ये बड़ी ज़रूरत है।


 

Tuesday, October 28, 2014

इस धरा पर एक नई गंगा निकालनी चाहिए।



हो गई शापित धरा , परित्राण होना चाहिए  ,
इस धरा पर एक नई गंगा निकालनी चाहिए। 

रुष्ट शिव की ही कृपा फिर इस धरा पर चाहिए।
हर त्रषित जन -जन का अब कल्याण होना चाहिए। 

पाप क्या है ,पुण्य क्या है ,मैं नहीं कुछ जानता ,
वक्त के  हाथों रहा हूँ, जिन्दगी भर नाचता।

जो सदा से ही रहा है , प्यार सबको बाँटता ,
आज फिर इस भोले शिव का, प्यार सबको चाहिए। 

इस धरा पर एक नई गंगा निकालनी चाहिए। 

हो गईं नदियाँ अपावन , भक्ष कर अभक्ष्य का ,
पतित-पावनी एक सलिला, हम को फिर से चाहिए।

अवतरित कर ला सके ,शिव की जटा से गंग जो ,
ऐसे भागीरथ का ,फिर ,अवतार  होना चाहिए।

त्राण सबका कर सके जो ,त्रास सबका हर सके ,
मोक्ष सबको दे सके जो , गंगा जल वो चाहिए।

कर सकूँ जो वक्त को ,वश में, वो शक्ति चाहिए ,
हे जटाधर मुझको तो, वरदान ऐसा चाहिए।

इस धरा पर एक नई गंगा निकालनी चाहिए। 
 


            --- ( प्रकाशित )

Sunday, October 19, 2014

मुझको गुब्बारे दिलवा दो

माँ ! आया गुब्बारे वाला ,
मुझको गुब्बारे दिलवा दो ,
लाल , हरे कुछ नीले ,पीले ,
उनमें से बस एक दिला दो ,
मुझको गुब्बारे दिलवा दो।

मेले में हैं बहुत सी चीजें ,
पर सब कुछ तो नहीं चाहिए ,
बेच रहा वह हवा मिठाई ,
सस्ती है वह मुझे दिला दो ,
मुझको गुब्बारे दिलवा दो।

नहीं और कुछ मुझे चाहिए ,
गुड्डा- गुड़िया नहीं चाहिए ,
चाहे मुझसे कसम ही ले लो ,
बस दोनों चीजें दिलवा दो ,
मुझको गुब्बारे दिलवा दो।

घर भी पैदल चला जाऊँगा ,
गोद  में तेरी नहीं चढूँगा ,
नहीं तंग मैं तुझे करूँगा ,
बस मेरी विनती तुम सुन लो ,
मुझको गुब्बारे दिलवा दो।

(   मासिक पत्रिका  " युगवाणी  " , देहरादून  माह दिसम्बर  के अंक में प्रकाशित हुई है   )

Friday, October 17, 2014

दूर देश हम कहाँ जायेंगे


















एक चिड़ी ने कहा चिड़े से ,
दूर देश हम कहाँ जायेंगे   ,
इस जीवन की भाग- दौड़ से ,
अच्छा है हम  मिट जायेंगे।

सारे जंगल काट दिये हैं ,
नीड़-बसेरे कहाँ बनेंगे ,
कंकड़ - पत्थर के महल खड़े हैं ,
बोलो  बच्चे कहाँ जनेंगे ।

शीत -ताप , आँधी -झक्खर से ,
हम सब कैसे यहाँ बचेंगे ,
मँहगाई में लोग पिस रहे ,
दाने हमको कहाँ मिलेंगे।

ताल-तलैये सूख जायेंगे ,
नदियों में जल नहीं रहेँगे ,
ख़ुश्क हलक की प्यास बुझाने ,
नीर कहाँ से हमें मिलेंगे ।

यहाँ तो गिद्धों की बस्ती है ,
निर्बल का कुछ काम नहीं है ,
नोच-नोच कर जो खायेंगे ,
वही यहाँ के सिद्ध बनेंगे।

         ----- ( प्रकाशित )

Saturday, October 11, 2014

मेरे आँगन पेड़ आम का
















अहो ! आज फिर दिख गई ,
गोरैया मेरी मुँडेर पर ,
कुछ कोमल पत्ते दिखे ,
कटे आम के पेड़ पर।

मेरे आँगन पेड़ आम का ,
भारी और गरबीला था ,
फल भी उसमें बहुत थे लगते ,
हर फल बहुत रसीला था।

तोता , मैना और गिलहरी ,
सबका यहीं बसेरा था ,
नए-नये नन्हे पंछी का ,
इसमें स्थायी डेरा था।

रोज सबेरे सब मिलते थे ,
मिलकर खुशी मनाते थे ,
अपने मीठे कलरव से ,
आँगन में खुशियाँ भरते थे।

नित दिन ही , पत्नि भी मेरी ,
उनको दाने देती थीं  ,
दाने चुगते देख उन्हें , वह ,
मन  ही मन खुश होती थीं।

एक दिवस ऐसा भी आया ,
पड़े काटने आम के पेड़ ,
चुपके-चुपके मैं भी रोया ,
देख गिरे अण्डों के ढेर।

हुई गिलहरी गुमसुम-गुमसुम ,
पंछी सब भी हुए हताश   ,
देख उजड़ते उनके घर को ,
मैं भी संग-संग हुआ उदास।

नहीं दिखी फिर कोई गिलहरी ,
न पंछी ही कोई दिखे ,
सूरज ने अपनी गरमी के ,
आँगन में इतिहास लिखे।

घर के छत ,छप्पर और छाजन ,
सब के सब ही लाल हुए ,
राहत थी जब पेड़ यहाँ थे ,
गर्मी से बेहाल हुए।

यही सोचते रहे थे हम सब ,
कोपल इसमें नये खिलें ,
फिर से इसमें फल लग जायें ,
पंछी फिर से आन बसें।

आज दिखे जब कोमल पत्ते ,
मन में मेरे हुआ हुलास  ,
फिर आयेंगे तोता, मैना ,
संग गिलहरी की है आश ।

आज दिखी जब मुझे गिलहरी ,
मन में यह विश्वास जगा ,
पेड़ हमें देते हैं जीवन ,
हर आँगन इक पेड़ लगा।


              -------    ( प्रकाशित )

Saturday, September 27, 2014

मैं हूँ मृदुल नदी की धारा

मैं हूँ मृदुल नदी की धारा ,
तू पर्वत का पत्थर ठहरा ,
सदा उमग में चूर रहे तुम ,
संवेदन से दूर रहे तुम।

पर जब छोड़ चले जाओगे ,
मुझको याद बहुत आओगे ,
नहीं सामने पाकर मुझको ,
तुम भी मुझ को याद करोगे।

जाने कितनी बेर लड़े हैं ,
फिर भी  हम में मेल रहे हैं ,
जीवन के ऊबट से पथ पर,
हम तुम दोनों साथ रहे हैं।

हम थे ईंट , कहाँ के रोड़ा ,
तुम थे पत्थर निपट ही पोढ़ा ,
पत्थर से भी क्या टकराना ,
यही सोच कर हार था माना।

रही शिकायत अगर कोई तो ,
मन में ही सब गोय लिया ।
मिलन की खुशियाँ कम न होवे ,
मन के मैल को धोय लिया ।

जीवन पथ पर कितने काँटे ,
आओ मिल कर इन्हें हटायें ,
फूल ख़ुशी के मिल कर बाँटे ,
इन खुशियों से मन महकायें।

बड़े-बड़े दुःख को भूलो तुम ,
छोटी-छोटी ख़ुशी संजो लो ,
जीवन कितना मधुर सरस है ,
जीवन को जी भर कर जी लो।




Friday, September 26, 2014

कोयल क्यों काली हुई ?

पाकर इतनी मीठी बोली ,
कोयल क्यों काली हुई  ?
कुहू-कुहू का रट क्यों करती ,
किसकी मतवाली हुई  ?
कूज , कूज कर शोर हो करती ,
क्यों कर तुम वातुल हुई  ?
आम्र-कुञ्ज में छिपती फिरती ,
क्यों लाजो वाली हुई 

Thursday, September 25, 2014

चिड़ियाँ प्यासी















भरी दुपहरी ,
 लू में तपती
चिड़ियाँ प्यासी ,
बहुत उदासी ,
सूरत रोनी ,
ढूंढ़ रही है पानी।

पानी कहाँ शहर में मिलता ,
यहाँ पानी पैसों से मिलता ,
बोलो चिड़ियाँ ,
कुछ तो बोलो ,
पास तुम्हारे ,
कितने पैसे ?

पिता ब्रह्म ,पिता ही पर्वत

माता धरणि सम हुई , पिता गगन से ऊँचे ,
दृढ़ और संतुलित सीख दे , सुत व सुता को सींचे।

पिता ब्रह्म ,पिता ही पर्वत , माँ शक्ति का स्रोत ,
अटल सत्य है सर्व लोक में , पिता गति के स्रोत।

पिता ने अपनी पौरुषता से , साहस का संचार किया ,
साम-दाम और दंड भेद का ,संतति को है ज्ञान दिया।

कवच, धैर्य व शौर्य - शील का , पिता ने ही है पहनाया ,
विषम काल में शांत भाव से , जीवन जीना सिखलाया।
 
माता ने ममता सिखलाया , पिता से सीखा दृढ़ता ,
उद्दम से ही भाग्य बदलता , कर्म ही भाग्य विधाता।
 
इस सुंदर सृष्टि में हमने , जीवन को साकार किया ,
नमन पिता को हम सब का है , जिसने यह उपकार किया।

Wednesday, September 17, 2014

माँ सा न कोई मिला

आँख खुली तो माँ को देखा , मुझको ईश मिला ,
ढूंढ़ा जग के कोने-कोने , माँ सा न कोई मिला।

माँ पर्वत है ,माँ ही धरनी , क्षीर का सागर माँ ,
जग यह तपता मरुस्थल है ,शीतल जल है माँ।

गोद में जिसके स्वर्ग बसा है , वह मूरत है माँ ,
चरणों में जिसके तीरथ है ,वह सूरत है माँ।

आँचल में आकाश समाया , है देवी सी माँ ,
सब गुरुओं में जो गुरुतर है ,वह है केवल माँ। 

कविता कहना ,ग़ज़ल सुनाना
















कविता कहना ,ग़ज़ल सुनाना ,
ये तो एक बहाना है ,
सच्ची-सच्ची बात है यारों ,
मिलना और मिलाना  है।

जीवन नीरस हो जाए न ,
हँसना और हँसाना है ,
दो दिन की इस बस्ती में ,
सब का एक फ़साना है।

नहीं महत्तर , नहीं लघुतर ,
भेद यहाँ नहीं माना है ,
मस्ती सब की एक यहाँ है ,
सब का एक तराना है।

चिड़ियों सा है मिल कर रहना ,
चिड़ियों सा ही गाना है ,
हमने तो बस गीत-ग़ज़ल में ,
ईश्वर को पहचाना है।


Wednesday, September 10, 2014

पर्यावरण बचाना होगा।


















ईश ने जब यह सृष्टि रची ,
जीने के साधन रच डाले ,
पर्वत-नदियाँ झरनों के संग ,
मनभावन प्रकृति रच डाले।
शुद्ध हवा में सांस ले सकें ,
हरे-भरे कानन रच डाले,
सभी स्वस्थ्य हों ,सभी सुखी हों,
नदियों में मीठे जल डाले।
उसकी इस सुन्दर सृष्टि को ,
प्रदूषित हमने कर डाले  ,
अपने-अपने स्वार्थ की खातिर ,
धरती तहस-नहस कर डाले।
तोड़ पहाड़ों की छाती को ,
द्वार मौत के हमने खोले ,
नदियों के मुख बांध-बांध कर ,
विभीषिका के पथ हैं खोले।
किया विकास  बहुत ही हमने ,
कल और कारखाने खोले ,
धुआँ भरा संसार रचा  कर
दरवाजे विनाश के खोले।
हरे-भरे पेड़ों को काट कर ,
कंकड़-महल खड़े कर डाले ,
लगी सूखने नदियाँ  हैं अब ,
सोये हैं  हो कर मतवाले।
पर्वत-राज हिमालय ने तब ,
कहर स्वर्ग पर बरपा डाले  ,
रूप बदल कर नदियों ने भी ,
जल-प्लावित जन्नत कर डाले।
हाहाकार मचा  है जग में ,
त्राहि-त्राहि हर ओर मची है ,
चीख-पुकार, रुदन-क्रंदन से ,
कोई नहीं बचाने वाले।
भीषण औ विकराल लहर ने ,
होटल-महल सभी धो डाले ,
आज प्रकृति ने छेड़-छाड़ के  ,
इसके सबक हमें दे डाले।
अब भी अगर नहीं संभले तो ,
अपनी मन की करने वाले ,
नदियाँ - धरती सूख जायेंगी ,
सूरज कुपित हैं होने वाले।

खाली न हो जाए धरती ,
हमको इसे बचाना होगा ,
जीवित रहे संतान हमारी ,
हमको पेड़ लगाना होगा।
इससे पहले , हम कुछ खोयें ,
हम को अलख जगाना होगा ,
बची रहे ये धरा हमारी ,
पर्यावरण बचाना होगा।

   -----    ( प्रकाशित )

सुगना बोलै …



सुगना बोलै दिन-रात हो रामा
सुगना बोलै  …
सोनमा के पिंजरा न सुगना के भावै ,
टक - टक, निहारै आकाश हो रामा ,
सुगना बोलै। ……
कहै महतारी , मोहे मन नहीं भावै ,
बाँधौ न सुगना के पिंजरे में रामा ,
सुगना बोलै.......
मचिया बइठल दादी कहै पूत सोनमा ,
केहू के न बंधन में बांधउ  हो रामा ,
सुगना बोलै ……।
हँसि - हँसि  कहै बहिना सुकुमारी ,
सुगना के करि देहु आजाद हो रामा ,
सुगना बोलै ………

Tuesday, August 26, 2014

फुर्सत के क्षण में


           





















                 ( 1  )
हम याद नहीं करते उनको ,              
ऐसा तो नहीं है ,                                                                                   
जाने ,क्यों ये भ्रम पाल रक्खा है ,
ऐसा तो नहीं है ,
हम दिल में उनकी याद लिए
रहते तो हैं हरदम ,
कुछ मजबूरियाँ रही होंगी ,
भूले नहीं हैं हम।
                 (  2   )
खत उनका , बड़े प्यार से
पढ़ते रहे हैं हम ,
लिखने की थी मजबूरियाँ ,
कुछ लिख सके न हम ,
शायद यही बात,
उनको दे गया हो दर्द ,
लब से छलक कर
लेखनी में ,
उतरा मन का गर्द।
              (  3   )
 रास्ते जाने कहाँ-कहाँ पे मुड़ गये ,
हर मोड़ मेरी जिन्दगी में शूल बो गए ,
पर प्रीत के ही फूल बिछाता चला गया ,
काँटों से जिन्दगी को सजाता चला गया।
                (   4    )
छोड़ो गिले औ शिकवे ,
नया कुछ आज कर जायें ,
भूली हुई कुछ मीठी बातें ,
याद कर जायें ,
वो शरारतें ,वो चुहलवाजियाँ ,
सब कुछ तो याद है ,
कुछ देर के ही लिए ,
हम अजनबी बन जायें।
                  

Friday, July 25, 2014

नव क्रान्ति चाहिए





कैसी हवा चली यहाँ इस देश में हे राम ,                                                       
हर आदमी है हो रहा कामुकता का गुलाम  ।                                          
अपनी ही माँ -बहनों के अस्मत को लूटता
कर कलंकित देश को यह कर रहा बदनाम।

हर तरफ है  चीख बस मासूम कलियों  का ,                                                           
हर तरफ आक्रोश है इस नीच कृत्य का।
हैवानियत भी शर्मसार है ये देख कर ,
आँखों से बह रहा लहू पतन यह देख कर।

है नहीं रोना तुम्हें , संकल्प तुम करो ,
आँख में आँसू नहीं अंगार को भरो ,
हाथों में चूड़ियाँ नहीं तलवार को धरो ,
अस्मत के लुटेरों पर प्रहार तुम करो।

जब तक न तेरी चूड़ियाँ कटार बनेंगी  ,
जब तक न अश्रुधार ये अंगार बनेगी ,
जब तक न तेरी आहें ज्वालायें बनेंगी ,
तब तक नहीं इस  जुल्म की दीवार ढहेगी।

समाज को नई दिशा , नव क्रान्ति चाहिए ,
उन्नत समाज के लिए जन क्रान्ति चाहिए ,
अकलुष और स्वच्छ एक समाज चाहिए ,
दृढ़ शक्ति के संकल्प का समाज चाहिए।

पंगु नहीं , न मूक ,जाग्रत राष्ट्र चाहिए,
नव राष्ट्र के निर्माण को नव क्रान्ति चाहिए ,
फौलादी से विचार और आचार चाहिए ,
क्रान्ति , क्रान्ति , क्रान्ति , क्रान्ति , क्रान्ति चाहिए।


फ़रिश्तों तुम जरा ठहरो


फ़रिश्तों तुम जरा ठहरो ,
मेरा कुछ काम बांकी है.…
जरा उनसे तो कर लूँ प्यार ,
मेरा कुछ काम बांकी है.....

होंगी हूर औ परियाँ ,
मुझे मालूम ज़न्नत में ,
यहाँ है सामने मेरे वो
जीनत  प्यार तो कर लूँ  ....

है जाना छोड़ कर दुनियाँ
मुकम्मल है पता मुझको ,
मगर यह दुनियाँ भी मेरी ,
किसी ज़न्नत से कम न है ,
जरा  मैं अपनी ज़न्नत को ,
नजर भर प्यार तो कर लूँ  .....

फ़रिश्तों तुम जरा ठहरो  …

Monday, July 21, 2014

प्यार प्रकृति है ,प्यार ही ईश्वर

        

सब कहते हैं तिनका-तिनका जोड़-जोड़ घर बनता है ,
मैं कहता हूँ प्यार-प्यार को जोड़-जोड़ घर बनता है।
प्यार नहीं तो शीशमहल भी तिनके जैसा लगता है ,
जहाँ प्यार है , रूखा भोजन भी अमृत सा लगता है।
प्यार ही है जो काँटों पर भी फूल सदा मुस्काता है ,
प्यार नहीं हो जीवन में तो जीना दूभर लगता है।
प्यार प्रकृति है ,प्यार ही ईश्वर ,प्यार का ही सब नाता है ,
प्रेम सने रस पागल बादल , नभ से जल बरसाता है।



Saturday, July 19, 2014

सुहाना सावनी मौसम


https://encrypted-tbn2.gstatic.com/images?q=tbn:ANd9GcRiEk7RGYmB0tqrHesm5OInuPVWdLREyGNvSXNHMs_CKUe74VjC











है बरसात का मौसम, चलो मिल घूम आयें हम ,                              
बारिस के मौसम में ,चलो मिल भींग आयें हम।
घटा को देख कर मेरा मयूरी मन बहकता है ,
कहता भींग लें कुछ देर , मेरा मन चहकता है।
अजब बरसात का मौसम है ये,मन को सुहाता है ,
पवन भी झूम कर चलता सदा इतराता बहता है।
बरसती बूँद है जब भी , सुनाती गीत सरगम सी ,
बदन पर पड़ती बूँदों से , उठती दिल में सिहरन सी।
फिसलती बूँद जब छू कर , तुम्हारे गोरे  गालों को ,
दमक कर दामिनी भी चूमती तेरे कपोलों को।
बरसता जब भी है सावन ,धरा भी तृप्त हो जाती ,
हो कर तृप्त यह धरणी , छटा है अपनी दिखलाती।
छा जाती हरियाली यहाँ , चारों दिशाओं में ,
संदेश है बरसात का लिखा घटाओं में।
कहीं झनकार झींगुर का , कहीं पर शोर दादुर का ,
कहीं पर चातकी की चहक भी देती सुनाई  है।
कहीं पर नाचता है मोर , कहीं पर मोरनी की कूक ,
तन में आग लगती है , दिल में उठती मीठी हूक।
चलो फिर आज हम मिल कर बना लें नाव कागद के ,
गुजारे पल जो बचपन में , उन्हें फिर आज दुहरा लें।
सुहाना सावनी मौसम , है ये श्रृंगार का मौसम ,
झूलों का मौसम है , है यह मेहँदी  का भी मौसम।
आओ तुम्हारे हाथ पर , मेहँदी रचा दें हम ,
आ जाओ बाँहों में , तुम्हें झूला झुला दें हम।
जो बूढ़ी हो गईं यादें , उन्हें फिर से नया कर लें ,
बिसरी हुई गीतों को फिर से आज हम गा  लें।

Friday, July 18, 2014

पत्थर-पत्थर, भगवान।


संत उन्हें ही जानिये , पर-दुःख जिन्हें सताय ,
करै भेद इंसान में , कैसे संत कहाय। 
जीव ईश का अंश है , है गीता का ज्ञान ,
मुझ में तुझ में ईश है , पत्थर-पत्थर , भगवान।
ना मंदिर , मस्जिद गए ,न गुरुद्वारा न चर्च ,
इन्सां धर्म निभाईये , लागे ना कोई खर्च।
कोई पूजै पोथी को , कोई पूजै पहाड़ ,
जिसकी जैसी आस्था ,करें क्यों तिल का ताड़।
जित देखा तित पाईयाँ , गुरु , ईश , अल्लाह ,
एक साथ तीनों खड़े , वाह ! वाह ! वल्लाह।