Monday, March 12, 2018

अपनों से मिलने को

अपनों से मिलने को जब इस दिल को होता है  ,
कितना आकुल , कितना व्याकुल दिल यह होता है।

सर - सर चलती हवा पहुँचती , कभी फूल के पास ,
कभी चूमती है पर्वत को और कभी आकाश।

चीड़ - चिनार  व देवदार भी उसे बुलाता है ,
अपनों से मिलने को जब इस दिल को होता है।

नहीं समय की पाबंदी है , ना कोई बंधन ,
जब मन  करता , उड़ चलता , फिरता नंदन - कानन।

आज मनुज की बातों में अपनापन खोता है ,
अपनों से मिलने को जब इस दिल को होता है।

हम भी हवा सा बन जायें  और चूमे नित आकाश ,
हो ऐसा दिल सबका , जिसमें प्यार बरसता है।



तुम याद बहुत आती हो

अंतस की पीड़ा जब घुलने लगती मन में ,
तुम याद बहुत आती हो।
जब वसंत की थापों पर सरसों लहराता ,
तुम याद बहुत आती हो।
जब - जब बादल घिरने लगता नीले नभ में ,
तुम याद बहुत आती हो।
जब घेर लेता तनहाई मुझको साँझ ढले ,
तुम याद बहुत आती हो।
जब - जब बजती दूर कहीं भी शहनाई है ,
तुम याद बहुत आती हो।
जब - जब मेरी आँखों में तिरते हैं सपने ,
तुम याद बहुत आती हो

Tuesday, February 13, 2018

पहाड़ की लड़की

पहाड़ की लड़की ,
होती है
एक सम्पूर्ण कविता ,
इसमें निहित है ,
छंद - ताल ,
लय और सुर ,
गीत और संगीत  ......

जब कभी ,
किसी पहाड़ी सोते से ,
भर कर पानी
ताँबे की गगरी में ,
और फिर
रख कर कमर पर ,
चलती है लड़की
पहाड की ऊँची - नीची ,
चढ़ती - उतरती
पगडंडियों पर ,
मन्दाकिनी की
धार सी पवित्र ,
चंचल  - छल - छल करती ,
अपनी धुन में चलती ,
सारा वातावरण
झंकृत हो उठता है ,
बज उठता है संगीत ,
फूट पड़ते हैं झरने ,
खिल उठता है बुरांस ,
बुरांस का फूल है लड़की ,
अनुपम , अद्भुत ,अद्वीतीय ,
अप्रतिम सौंदर्य लिए
प्रकृति का वरदान ,
ईश की सृष्टि
होती है लड़की ,
रचती है पूरा संसार ,
धरा और आकाश ,
पर्वत , सागर और नदियाँ ,
करती है जीवन का विकास,
चाहती है सम्मान ,
अन्यथा  ,
विनाश ही विनाश   .........

( नोट  : - प्रकाशित  )

आओ आज गले हम मिल लें

आओ आज गले हम मिल लें ,
कुछ तुम रो लो , कुछ हम रो लें ,
आँखों से आँसू छलका लें  ,
दिल के जख्मों को सहला लें ।

मौसम का है आना जाना ,
जीवन का भी आना जाना ,
भूली बिसरी यादों को हम ,
मिल बैठ कर फिर महका  लें।

कभी पतझड़ है , कभी वसंत है ,
जीवन भी तो इक वसंत है ,
इस वसंत को जी भर जी लें ,
तुम्हे हँसा लें , खुद भी हँस लें।

मानो तो मदिरा है जीवन ,
न मानो तो एक गरल है ,
मदिरा और गरल हम पी लें ,
आओ इस क्षण को हम जी लें।
आओ आज गले हम   .........

Monday, February 12, 2018

गीत ( गव्य )

आ जा खुली हैं कब से ये बाहें ,
दिल मेरा तुझको पुकारे।    

कितना हँसी आज का है ये मौसम ,
मौसम करे क्या इशारे ,
हर ओर कलियों की है मुस्कराहट ,
हँसती हुई ये बहारें।
आ जा   .........

हवाओं की बाहों पर बादल घनेरे ,
बरसाए रिमझिम फुहारें ,
कलियों की अधरों पर भँवरों की नजरें ,
मस्ती भरे ये नज़ारे।
आ जा  .......

सतरंगी किरणों ने धनुषी छटाएँ
अँगना गगन के पसारे ,
तुम हो कहाँ आ भी जाओ ओ साजन ,
पलकों ने पथ हैं बुहारें।
आ जा  ......

Sunday, February 4, 2018

" आग "

रोटी पकाने के लिए ,
आग की जरूरत होती है ,
रोटी ,  वह चाहे पेट के लिए हो
या , राजनीतिक लिप्सा के लिए ,
या फिर ,
कुर्सी के लिए ही।

आग जलाने के लिए ,
समिधा की जरूरत होती है ,
समिधा चाहे  " धर्म " की हो
अथवा , " जाति  " की हो ,
या फिर ,
" आरक्षण " की ही
आग तो आग है ,
वह कभी फर्क नहीं करती ,
" अमीर " और " गरीब " की ,
" बच्चे " और " बूढ़े " की ,
" मर्द " और " औरत " की ,
" अभिजात " और  " अनअभिजात " की ,
कोई भी जले ,
" युवा " जलें तो जलें ,
" प्रतिभा " जलती है तो जले ,
" देश " जलता है तो जले ,
रोटी अपनी सिंकनी चाहिए  ।

कब छुटकारा पायेंगे हम
इस ओछी मानसिकता से  ?
यह देश हमारा है ,
ये युवा हमारे हैं ,
ये  " बच्चे " ये  " बूढ़े "
ये हमारी  " बहनें " और  " माएं "
हमारी ताकत  हैं  ,
हमारी धरोहर हैं।
क्या हम इतने कमजोर हैं
कि ,
अपनी अमानत की ,
स्वयं , रक्षा  नहीं कर सकते  ?
या फिर , हम अविवेकी हैं  ?
हमारी कमजोरियों और अविवेकीपन को
भाँप कर ही ,
शत्रु बलवान होते हैं  ।
तो , आओ ,
हम अपने सीने में आग  जलायें  ,
और ,
अपने अन्दर और बाहर के
शत्रुओं का नाश करें ,
अपने मन की  " सरहदों "को
अपने  देश की "  सरहदों  "  को
सुरक्षित करें ,
और ,
गर्व से  कहें  -
हम महान हैं ,
यह हमारा देश महान है ,
यह  " भारत " है , 
यह हमारा भारत है। 
 
ब्लॉग तिथि - 04 - 02 - 2018


( नोट : - प्रकाशित )


Tuesday, January 16, 2018

इसीलिये वह जली

जाने कितनी पीड़ा
रही होगी उसके मन में  ,
जब ही मन के साथ
स्वयं अपने ही तन में
उसने आग लगाई होगी  ,
हाँ , अवश्य ही
तपन आग से भी ज्यादा
उसके अपने मन की होगी ,
इसीलिए वह जली
नहीं चीखी  - चिल्लाई  ......

अन्तर्मन  की पीड़ा  में  जब
पल -पल वह  घुलती  होगी ,
अति  विवश  हो  कर  ही  उसने
जग  से  कूच  किया  होगा ,
जाने  कितने  दर्द  रहे  होंगे
उसके  हृतस्थल  में  ,
जब  कण्ठहार  रस्सी  का , वह
ग्रीवा  में  डाल  रही  होगी ,
नहीं  चीख -चिल्लाहट  थी ,
पीड़ा  थी  इतनी  दुःखदायी।
इसीलिये  वह  जली
नहीं  चीखी  चिल्लाई  .......

स्तब्ध  दिशायें  हुईं
हुई  तार -तार  जब अस्मत ,
तुला  न्याय  की  भी  टूटी
जब  हुआ  न्याय  असंगत ,
पीड़ित  को  ही  दोषी  मान ,
दण्डित  वह  करता  है ,
और  ,
भेड़िए  लेते  हैं  जग  में
खुले  आम  अंगड़ाई ,
इसीलिए  वह  जली
नहीं  चीखी  चिल्लाई   .....

         --- ( प्रकाशित )

Friday, December 29, 2017

गंगा मैली हो गई है ....

भोर की आहट भर थी ,
भोर नहीं हुई थी ,
मैंने माँ गंगे से पूछा  -
हे ! पतित पावनि ,
पापहारिणी ,
माँ गंगे !
शीतल , निर्मल
स्वच्छ धाराओं संग ,
छल - छल, कल - कल  कर
बहती रहती हो अनवरत , अबाध ,
कभी भगीरथ की प्रार्थना से
द्रवित हो ,
तुम धरती का उद्धार करने
अवतरित हो  ,
मौज में बहने लगीं ,
पर , अब सभी कहते हैं  , कि
गंगा मैली हो गई है  ......
और ,
इस मैली गंगा के आँचल की सफाई
वर्षों से हो रही है ,
करोड़ों खर्च हुए ,
करोड़ों खर्च हो रहे हैं ,
करोड़ों खर्च होंगे
पर , तुम्हारा आँचल
मैला का मैला ही रहा  ,
ऐसा क्यूँ  ?
माँ की अधरों पर
एक निश्छल मुस्कान उभरी ,
कहने लगीं  -
वत्स ! माँ का आँचल तो
कब से मैला ही है ,
मैं बार - बार धोती हूँ ,
बार - बार साफ करती हूँ
और तुम हो कि
इसे बार - बार मैला कर देते हो  ,
फिर पूछते भी हो !

अरे !
करोड़ों खर्च करो या अरबों  ,
रुपयों से भला माँ का आँचल
कैसे साफ होगा
जब, हमारे पुत्रों का
मन ही मैला हो   ?
यह आँचल धन से नहीं ,
मन और तन के श्रम से
साफ हो सकेगा  .......
मेरे जीर्ण - शीर्ण जीवन पर
कौन ध्यान देता है ,
सभी अपने नाम की
डुगडुगी पिटवाते हैं  ,
और ,
हमारे ही तट पर बैठ कर
सन्यासी बन जाते.हैं  ।

जब व्यवस्था में ही दोष हो
और , मन में भी खोट  हो  ,
तो ,
एक मेरा ही दामन क्या
सभी का दमन मैला ही रहेगा ,
चाहे जितनी चन्दन घिसो ,
चाहे जितना तिलक लगाओ ।
अब कोई भगीरथ नहीं ,
जिसने जनकल्याण के लिए
वर्षों तपस्या कर
मुझे इस धरा पर लाया।
अब तो
सभी शाशक
और
सभी शोषक बने हैं ,
जनकल्याण की भावना
विलुप्त हो गई है
और लक्ष्य
स्वकल्याण और स्वसत्ता पर
केंद्रित हो गई है
और मैं !
मैली की मैली
रह गई हूँ   ........
 
       ---- ( प्रकाशित )

Monday, December 18, 2017

अभिनन्दन

नूतन नवल बरस अभिनन्दन ,
तुमसे नई - नई आशायें ,
निष्कंटक हो पंथ हमारा ,
जीवन पथ पर बढ़ते जायें ।

फूलों सा जीवन यह महके ,
जग को भी महकाते जायें  ,
मन में हो सद्भाव सभी के ,
बैर भाव मन में ना आयें ।

अभ्युदय हो सकल विश्व का ,
मधुर सरस रस को बरसायें ,
प्यार के फूल खिले हर दिल ,
जग को अपना मीत बनायें ।

नित - नित नव सोपान चढ़ें हम ,
नित - नित , नव , नव संरचना हो ,
मानवता हो ध्येय हमारा ,
चहुँ विकास का लक्ष्य बनायें ।

चन्दन सम धरती की माटी ,
माथे इसका तिलक लगायें  ,
इस नव वर्ष करें कुछ ऐसा ,
जीवन कुसुमित सा मह्कायें ।

Sunday, December 17, 2017

राम राज्य

राम राज्य  ?
कौन राम  ?
कैसा राज्य  ?
त्रेता से लेकर
कलयुग तक
राम भटकते ही रहे हैं 
जीवन भर  ........
कभी कर्तव्य  ,  कभी धर्म  ,
कभी राजनीति के
चक्र्व्यूह में फँस कर
सन्यासी जीवन ही
जीते रहे हैं ,
कभी मर्यादाओं में बाँधा ,
कभी सीमाओं में ,
न उनको राज्य ही मिला ,
ना ही ,  अपना धाम ही ।
कभी म्यूजियम में आश्रय मिला ,
कभी टेंट में रखा ,
तो ,
कभी   " सरयू " के तट पर
बहलाने को
हजारों प्रज्वलित दीपों से
स्वागत किया  ,
' अतिथि देवो भव ' !
वस्तुत: , हम राम को
छलते ही तो रहे हैं  ,
और ,
राम ! भोले राम
छले जाते रहे ,
छले जाने पर भी
मुस्कुराते ही रहे  ....... .
वह नियति के नियंता ,
मानव के इस कौतिक क्रीड़ा को
देखते हैं , समझते हैं
और ,
मुस्कुरा भर देते हैं ,
वह जानते हैं  -
यह विश्व - यह जगत
विष - कुंभ है ,
सभी इस विष - कुंभ के विष को
पी रहे हैं ,
कुछ कम , कुछ ज्यादा ,
सभी आनंदमग्न हैं
अपने आपको  छलते हुए   !
सत्य से
सभी को डर लगता है
इसलिए , अपने मन के अन्दर
वे नहीं झांकते हैं ,
कहीं वहाँ से गिर न पड़ें  ........
हा राम !
तुमने ताड़का को मारा ,
मारीच को मारा ,
बाहू - सुबाहू ,मेघनाद को मारा ,
रावण को भी मार गिराया ,
पर अपने ही निर्मित मानव के
मन के अन्दर छिपे बैठे
स्वार्थ और दुर्भावनाओं के दानव को
नहीं मार सके ,
भले तुम्हे अपने सिंहासन पर
विराजित नहीं  किया जा सका है
परन्तु , आदि से अनादि तक
सत्ता पूजित और पोषित
होती रही है , होती रहेगी ,
और , तुम यूँ ही
कभी यहाँ  , कभी वहाँ
भटकते ही रहोगे ,
आखिर एक माँ का श्राप भी तो तुम्हे  है  ,
" श्रवण कुमार " की आत्मा
अब भी भटक रही है ,
भटक रही है , भटक रही है  .........
(  यह कविता मैंने 9 दिसम्बर 2017 को लिखी  )
        ---- ( प्रकाशित )

Sunday, September 3, 2017

चाहत हमारी है

खिलेंगे फूल  खुशियों के , मगर तब हम नहीं होंगे ,
ज़माना मुस्कुराएगा  , मगर तब हम नहीं होंगे ,
मिले जन्नत , रहो आबाद , दुआ है तुमको ये मेरी ,
भले आँखों में है आँसू , जुवां पर है दुआ मेरी।

रहो जिस ठौर भी तुम सब , रहे सूरज की किरणें भी,
उजाले ही उजाले हों सदा , चाहत हमारी है  ,
नहीं गम हो कभी कोई , भरा खुशियों से दामन हो ,
तुम्हारे हिस्से के काँटे , ख़ुदा से माँग  मैं  लूँगा।

Friday, August 4, 2017

कोयल बोल रहा है

बादल ने तंबू गाड़े ,
आये  बरखा के दिन  ,
बारिस की बूंदों ने गया ,
रिम -झिम ता -ता धिन। 
पपीहा बोल रहा है ,
 पपीहा  बोल रहा है।

भींगी हवा हुई मस्तानी ,
मन है डाँबा - डोल ,
गोरी के नैना हैं देखो ,
खोल रहे हैं पोल।
 पपीहा बोल रहा है ,
 पपीहा बोल रहा है।

छमक - छमक कर बुलबुल चलती ,
घायल मातादीन ,
मौसम का आनन्द ले रहे ,
चाचा नसरुद्दीन ,
 पपीहा बोल रहा है
 पपीहा बोल रहा है।
( नोट : - रचना तिथि   25 . 07 . 2017  )








































































Friday, June 16, 2017

एक और महाभारत

मैं वक़्त हूँ  ,
मैं देखरहा हूँ ,,
चारों ओर लूट -खसोट हो रहा है ,
जिसे देखो , वही लूट रहा है ,
वही लुटेरा है ,
अमीर , और , अमीर  हो रहे हैं ,
गरीब  , और , गरीब हो रहे हैं ,
विद्वत जनों का अपमान हो रहा है ,
खल  पूजे जा रहे हैं ,
स्त्रियों की अस्मिता  ,
लूटी जा रही है  ,
मनुष्यता लुप्त हो रही है ,
क्रूरता अट्टहास कर रही है ,
पशुतापन बढ़ रहा  है  ,
दानवता पैर पसार रही है ,
हर गली - मोहल्ले  , चौराहों पर ,
रोज ही ,
द्रौपदी , निर्वसन  की जा रही है  ,
लोग मौन हैं  ,
युद्धिष्ठिर , अर्जुन ,भीम ,
नकुल और सहदेव  ,
तमाशाईयों की भीड़ में खड़े है  ,
दंभित प्रण कर  ," भीष्म पितामह  " ,
कौरवों की सेना से घिरे   ,
बार -बार
अपने धनुष पर  ,
प्रत्यंचा चढ़ा कर ,
अपनी  आत्मतुष्टि के लिए ,
टंकार दे रहे हैं  ,
एक और महाभारत की ,
जमीन तैयार हो रही है   .........

                      -------    ( प्रकाशित )

        

Tuesday, May 30, 2017

बेटी का घर कौन सा होता ?

बेटी ने पापा से पूछा ,
मुझको यह बतलाओ पापा
पर धन बेटी है कहलाती  ,
छोड़ मायके पिऊ घर आती ,
मिलता प्यार बहुत है पिऊ घर ,
फिर भी, पर जाया  कहलाती ।
दोनों घर के बीच डोलती ,
जीवन है उसका खो जाता ,
ऐसे में बतलाओ पापा ,
बेटी का घर कौन सा होता  ?

बेटी का यह प्रश्न जटिल था ,
मानो जैसे यही गरल था ,
इस विष को तो पीना ही था ,
बेटी को बतलाना ही था।
हो गंभीर पिता यूँ बोले ,
थोड़ा सा मन से वे डोले ,
पापा की आँखों का तारा ,
दिल का टुकड़ा होती बेटी ,
अपनी माँ की बहुत चहेती ,
माँ के दिल में रहती बेटी।

घर ना होता कोई बेटी ,
घर तो हमें बनाना पड़ता ,
प्यार , त्याग , विश्वास , समर्पण,
सौम्य ,शील ,सौहाद्र आचरण ,
सम्मानित होते जँह गुरुजन ,
जिस घर में होता है बेटी , 
रहते देव, फ़रिश्ते जिस घर ,
वह घर मंदिर सा बन जाता ,
जो घर मंदिर सा  बन जाता ,
बस वह मंदिर  घर कहलाता।

Sunday, May 28, 2017

वो बचपन की यादें

वो बचपन की यादें , वो बचपन की बातें ,
मेरे दिल में चुभती , वो किस्सों की  रातें ।
 कभी तो लिपटना  , कभी काँधे चढ़ना ,
बहुत याद आती , शरारत की बातें ।
नहीं भूली हूँ मैं , वो , दादी की बातें  ,
वो बचपन की यादें , वो बचपन की बातें ।   
लोरी सुना कर मुझको रिझाना ,
दे कर के थपकी मुझको सुलाना ,
सपनों के परियों के किस्से सुनाना ,
कभी बादलों की , कभी पँछियों की ,
बहुत सारे किस्से उनका सुनाना। 
ऊँगली पकड़ मेरा , मुझको घुमाना ,
पल-पल मेरी बलैयां ले लेना ,
बुरी नजरों से भी , मुझको बचाना ,
जरा मेरे रोते , सीने से लगाना ,
सीने से लगा कर , मुझे प्यार करना ,
ढेरों खिलौने दे कर बहलाना ,
वो दादी का प्यारा सा सुन्दर सा मुखड़ा ,
बहुत याद आती , बहुत याद आती ,
बहुत याद आती है  दादी की बातें।

Sunday, May 14, 2017

माँ

माँ ,
कैसे कह दूँ कि तुम नहीं हो !
तुम हो ,
जब तक एक मेरी साँसे हैं ,
जब तक दिल में धड़कन है ,
जब तक मेरी रगों में दौड़ता
तेरा लहू है ,
हाँ माँ , हाँ ,
तुम हो , तुम हो , तुम हो  ....... 

Friday, May 12, 2017

गर्जना

चीर रहा सन्नाटे को है ,सागर का गर्जन  ,
भेद तिमिर को रवि क्यों करता  आज रुदन - क्रन्दन   ,
हुई रश्मियाँ मंद , आज , ना हुआ कोई भी वंदन ।

हा ! कैसा अन्याय शत्रु का भारत की धरती पर ,
करके कलम शीश , लाल का , क्षत - विक्षत कर तन को ,
दे रहा चुनौती वर्षों से , वह , भारत के जन - जन को ।

जिसके लाखों सैनिक ने थे , घुटने टेक दिये  ,
वही भीरू - कायर फिर से , है आँखें दिखा रहा ,
गीदर को देखो , बिल्ली की बोली बोल रहा ।

पर  भारत के भाग्य - विधाता , अपने में खोये हैं ,
जाने किन सपनों को ले , आँख मींच  सोये हैं ,
मैं - मैं , तू - तू , तू - तू , मैं -मैं ,  इनमें ही उलझे हैं ।

आज ह्रदय में जन - जन के , जलती बदले की ज्वाला ,
मौन हुई है हवा , हुई स्तब्ध दसों  दिशाएँ ,
नेता की आँखों का पानी , सूख गए हैं लाला ।

होती गर परवा इनको , तो , काश्मीर क्यों जलता ,
क्यों कर राष्ट्र तिरंगे का , अपमान यहाँ पर होता ,
क्यूँ सड़कों पर काश्मीर के , राष्ट्र तिरंगा जलता  ?

कभी राम मन्दिर  में उलझे , कभी कृष्ण मन्दिर  में ,
गंगा की  पावन धारा में   ,  हाथ अपने धो आये ,
पर अपने मन - मन्दिर को , वे साफ़ नहीं कर पाए ।

गर ऐसा होता तो , क्यों , क्रूरता परोसी जाती  ,
गौ रक्षा  व धर्म नाम पर , हत्याएँ क्यों होती  ,
क्यों केसर की क्यारी में , बारूद उगाई जाती  ?

क्यूँ सरहद पर रोज - रोज  , सैनिक शहीद हैं होते  ,
माँ का लाल , बहन का भाई , रोज बिछड़ क्यों जाते
क्यूँ सीमा पर प्रहरी के , सिर को काटे जाते  ?

कब तक होगी पत्थरबाजी ,
कब तक होंगे नारे ,
धर्म - प्यार  की बात  न  सुनते ,मानवता के हत्यारे।

लफ़्जों को छोड़ो , करो अब बारूदों से बातें ,
उनको तो अब उनकी ही , भाषा में समझायें   ,
अरे ! करो आदेश कूच का ,कहर शत्रु पर ढायें ।

हो चाहे बलिदान हमारा , आगे बढ़ते जाएँ ,
भारत माँ की चरणों में ,शत्रु के शीश चढ़ायें  ,
आन तिरंगे की रखनी है , चाहे जान ये जाए
नभ के कोने  - कोने में , हम राष्ट्र - ध्वजा फहराएं ।


Thursday, April 13, 2017

चिड़िया तुम अच्छा गाती हो

चिड़िया तुम अच्छा  गाती हो ,
अपने मीठे मधुर स्वरों से ,
सब का मन  हर्षा जाती हो,
चिड़िया तुम अच्छा गाती हो।

कितने सुन्दर पंख तुम्हारे ,
रंग - बिरंगे प्यारे - प्यारे ,
इन पंखों के  बल पर ही तुम ,
देश - विदेश घूमा  करती  हो ,
चिड़िया तुम अच्छा गाती  हो।

मनमोहक हैं चोंच चुटीले  ,
छोटे - मोटे और नुकीले ,
कीट - पतंगा , फल खाती हो  ,
नीड़ के लिये तिनका लाती हो,
चिड़िया तुम अच्छा गाती हो।

सूरज ढलते सो जाती हो ,
पौ फटते ही जग जाती हो ,
आँधी , तूफां और  बारिस से ,
कभी नहीं  तुम घबराती हो ,
चिड़िया तुम अच्छा गाती हो।

तिनका , तिनका जोड़ - जोड़ कर,
अपना नीड़ बना लेती हो ,
समय पर सोना ,समय पर जगना ,
हम सब को तुम सिखलाती हो ,
चिड़िया तुम अच्छा गाती हो।
            ---------- रचनाकार :- मंजु  सिन्हा

( नोट : - प्रकाशित )

Wednesday, April 5, 2017

Friday, March 31, 2017

नन्हकू

हमने भी देखा एक सपना ,
किससे कहूँ सपनों की बात ,
नन्हकू किसान की मेहरिया
सोचती है ,
सोचती  है -
अबकी नन्हकू आवेगा
तो , उससे कहेगी
मेरे लिए भी ले आना
शहर से
एक ठो  ' बिन्दी '
और
एक ठो  ' सिन्दूर की डिब्बी ' ,
बच्चों के लिए
एक सस्ता जूता ,
एक स्कूल बैग ,
कुछ किताबें , कुछ कापियां
और पेन्सिल भी ,
अबके फसल
कुछ ठीक लगी है  .....

नन्हकू शहर से
लौट आया है  ,
खाली हाथ ,
हताश !
क्या हुआ  ?
नन्हकू की मेहरिया ने पूछा  ,
नन्हकू कुछ नहीं बोला ,
बैठा रहा ,  गुम - सुम , उदास  ...
नन्हकू के मन में भी
उठती रही , उसके
मन की बात  -
मंडी के ठेकेदारों  ने
औने - पौने में
आलू खरीद लिया ,
पैसे भी पूरे नहीं दिये ,
बीज के पूरे दाम भी
नहीं निकले ,
कहाँ से लाऊँ
बच्चों के लिए जूते ,
किताबें ,
और  उसके लिए
' बिन्दी ' ?
साहूकार ने बीज के पैसे
मंडी में ही रखबा लिए ,
फिर वही
साल भर का फाका - कसी ,
फिर साल भर का
इन्तजार ,
फिर उधार ,
फिर कर्ज  ,
कब आयेंगे
मेरे अच्छे दिन  ?

'  सिलिंडर की ' कौन कहे ,
खाने - पीने से लेकर
डीज़ल - पेट्रोल  ,
हर चीजों के दामों में
उन्नति हो रही है ,
बस किसान मर रहे हैं,
' वादों ' के पिटारों से
' वादों ' के फूल
अब भी झड़ रहे हैं ।
फूल तो फूल हैं ,
चाहे वे कागज के हों
या फिर ,
असल ही,
सभी एक दिन मुरझा जाते हैं  .....

नन्हकू ने देखा
रात का स्याह अँधेरा ,
पर , सुबह का उजाला
नहीं देख सका ,
भोर के पंछी
चह - चहा रहे थे
पर नन्हकू का  ' पंछी  '
अँधेरे में ही गुम हो गया  ........

( रचना तिथि - 29 - 03  - 2017  समय - सुबह  एक  1 बज कर 30 मिनट  )
                   ---- ( प्रकाशित )