Monday, July 16, 2018

विवश पाँचाली

दिल के दर्द उकेरूँ कैसे 
इस कागज़ के टुकड़े पर ,
मन की व्यथा बताऊँ कैसे
काँप रहे सुकुमार अधर ।

जिधर - जिधर दृष्टि करता हूँ ,
विवश पाँचाली दिखती है  ,
बीच सड़क पर दुर्योधन की
फ़ौज खड़ी दिखती   है ।

विज्ञापन के नारों में बस
है सु:शाशन का नारा ,
राजनीति के चक्र्व्यूह में
अभिमन्यु सदा ही हारा।

हर दिन , हर शै  ,गली - गली में ,
है चीत्कार बेटी का ,
सुनकर भी है नहीं टूटता ,
तुला यहाँ पर न्याय का।

जाने कितनी निर्भया रोज
हा ! निरपराध मरती है ,
जाने कितनी बिटियों के तन ,
नित ही विदीर्ण होती है।

है बड़े सुनहरे पट्टी पर ,
बेटी बचाव का नारा ,
कैसे पढ़ पाएगी बेटी ,
शाशन - समाज नक्कारा।

Friday, July 13, 2018

पेड़ का बलिदान

एक शाम मेरे जेहन में
एक प्रश्न उभर आया ,
भेड़ और पेड़ में क्या अंतर है  ?
भेड़ों के भाग्य में लिखा है कटना ,
भेड़  कटते हैं , रोज कटते हैं ,
पेड़ों के भाग्य में लिखा है कटना ,
पेड़ कटते हैं , रोज  काटे जाते हैं। 
क्या फर्क पड़ता है -  भेड़ छोटा है या बड़ा ,
पेड़ सूखा है या हरा - भरा  ?

जिह्वा की संतुष्टि के लिए  ,
भेड़ बलिदान हो जाते हैं ,
शहर के विकास के लिए
पेड़ बलिदान हो जाते हैं।

किसी के विकास के लिए जरूरी है
किसी का बलिदान हो जाना  ,
पेड़ बलिदान हो जाते हैं ,
मानव के विकास के लिए ,
बन जाती हैं चौड़ी - चौड़ी सड़कें ,
आलीशान इमारतें ,
मजबूत दरवाजे , खिड़कियाँ ,
टेबल - कुर्सी  , फर्नीचर ,
और न जाने क्या - क्या।
पेड़ बलिदान देकर भी
अमर हो जाते हैं ,
कट कर भी
अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं पेड़ ,
एक हम हैं - मानव  ,
उसके बलिदान को ,
उसके त्याग को , उसके दर्द को
भुला देते हैं  ,
और ,
चलाते हैं  आरियां , पेड़ों पर ,
अनवरत - लगातार    .......
(  10 - 07  - 2018  )

Tuesday, July 10, 2018

मरी खाल की साँस सों

अपनी सत्ता और पुत्रों के प्रति मोह ने
धृतराष्ट्र को अंधा बना दिया है ,
उसके चारों ओर खड़े
जान - गण - मन  की भीड़ ,
उसे दुश्मन से प्रतीत हो रहे हैं   ......

अपने अजेय किले , और
बंधु - बान्धवों की
अपार कतार को देख ,
वह कुटिल मुस्कुराहट
और विद्रूप हँसी से
सब का उपहास मना रहा है ,
फिर एक महाभारत की तैयारी
कलियुग ने कर ली है  ........

फैली हुई अव्यवस्थायें
उसे नहीं दीखती ,
उसके अपने अट्टहास में
गिरते - पड़ते - मरते जन
नहीं दीखते ,
उसकी आँखों पर
अहंकार का पर्दा पड़ गया है  ......

इतिहास अपने - आपको दुहराता है ,
वही चौकड़ी है ,
शकुनि भी है , गुरु  द्रोण भी ,
वृद्ध भीष्म पितामह भी
( जिन्हें अब एक बगल खड़ा कर दिया गया है  )   ......

अरे ! ओ धृतराष्ट्र !
काल का पहिया घूमता है ,
भूल मत , यहाँ सब नश्वर है ,
न तू रहेगा , न तेरी सत्ता ,,
न तेरे पुत्रों - बंधु - बांधवों की फ़ौज ,
जो बच जायेंगे तेरे परिजन ,
तब वही तेरा उपहास करेंगे   .......

मन की आँखें खोल ,
और देख  -
" मरी खाल की साँस सों  ,
लौह भस्म हो जाय "
मत ले आह ,
दुनिया ने पत्थरों को पूजा है
तो , ठोकरें भी लगाई है ,
दर्प की अग्नि में
जल जाता है सब कुछ ,
न तख़्त ही रहता ,
न ताज ही रहता ,
प्यार के ही न्याय का  ,
बस , राज  है रहता  ,


Monday, June 18, 2018

जब शाशन के नाक के नीचे

जहाँ मोल मानव जीवन का ,
कौड़ी सा आँका जाता है ,
कविता कहना , गीत सुनाना ,
बेईमानी सा लगता है।

जहाँ धर्म के नाम कोई भी
कृत्य अधर्म कर जाता है ,
कविता कहना , गीत सुनाना ,
बेईमानी सा लगता है।

कदम - कदम पर मुँह बाये ही ,
मिलती हो खड़ी अराजकता ,
कविता कहना , गीत सुनाना ,
बेईमानी सा लगता है।

जब शाशन के नाक के नीचे ,
अस्मत नारी की लुटती है ,
कविता कहना , गीत सुनाना ,
बेईमानी सा लगता है।

जहाँ आदमी का जीवन ,
पशु से बदतर हो जाता है ,
कविता कहना , गीत सुनाना ,
बेईमानी सा लगता है।

जहाँ शाशन भी आँख मूँद ,
बस दर्शक सा बन जाता है ,
कविता कहना , गीत सुनाना ,
बेईमानी सा लगता है।

Friday, June 15, 2018

" गौरैया "

कहते हैं अब  नहीं दिखती है  गौरैया
जिसकी  चीं -चीं  की आवाज से
होती थी सुबह ,
वह अब कहीं खो गई है ,                  
जिसकी चहचहाहट से
घर - आँगन होता था गुलजार। 

गौरैया  शहरों में नहीं दिखती ,
दिखती है शहर की गलियों में ,
नहीं लगता है उसका दिल
कंक्रीट के महलों में ,
अट्टालिकायें  और फ्लैट
उसे पसंद नहीं ,
शहर के मकानों में आँगन नहीं होते ,
ना ही सुखाये जाते हैं
गेहूँ  - चावल जैसे अन्न।
शहर में लोग लाते हैं  , खाते हैं
पके - पकाये भोजन ,
गौरैया  चुगती है दाने ,
इसीलिये वह दिखती है
शहर की गलियों में ,
गली वाले घर में ,
जहाँ  उसको  मिलते हैं दाने ,
रहने को छोटी सी जगह ,
छप्पर - छाजन और ताखे ,     
आज भी दिखती है गौरैया  ,
गली  वाले घर के आँगन में ,
क्योंकि वह है आँगन की चिड़िया   ........
              --------   मंजु सिन्हा
  

Sunday, April 29, 2018

हुआ शहर में जब से ठाँव ,

हुआ शहर में जब से ठाँव ,
छूट गया मेरा अपना गाँव।
गाँव क्या छूटा , छूटे सब ,
छूट गए सब अपने मीत।

हरे धान की मीठी खुशबू  ,
गेहूँ की बाली के गीत ,
जाने कहाँ मिलेंगे मुझको   ,
बचपन के वो अपने मीत।

वो निश्छल मुस्कान अधर के ,
साथ कह- कहे हम छोरों के ,
बैठ आम्र के बौर के नीचे ,
सुनते थे जब पिक संगीत।

भरी दोपहरी लेकर गगरी  ,
पनघट पर जब आती गोरी ,
तपते गर्मी के दिन में भी  ,
दिल में छा जाता था शीत।

चंचल चितवन  की कोरों से  ,
प्यार का बुनती ताना - बाना ,
भले हार जाता था दिल यह ,
हार में भी होती थी जीत।

पीपल के पत्तों  की सर - सर ,
भरे तपिश में बरगद छाँव  ,
बीता जहाँ किशोरापन था ,
शैशवपन के अपने रीत।

पुरबैया की गन्ध सुहानी ,
याद बाहत आता वह गाँव।
 भादो में कीचड़ में  सन  कर ,
धान रोपते गाते गीत।

हुआ  शहर में जब से ठाँव ,
छूट गया मेरा अपना गॉंव ,
छूटे सब संगी और साथी ,
छूट गए सब अपने मीत। 
 ब्लॉग तिथि -अप्रैल -2018

Thursday, March 15, 2018

सात मुक्तक

थीर जल के झील में ना फेंक कोई कंकरी ,
चंचला हो जायेगी जल में छिपी जल की परी।

बात छोटी है , मगर ,हल्के में लेना तुम नहीं ,
एक चिंगारी से ही जल सकती है पूरी मही।

ओ दीवानों प्रेम के ,  तुम होश में रहना जरा ,
प्यार के दुश्मन बहुत हैं , पढ़ रहे चेहरा तेरा। 

हर ख़ुशी , हर दर्द में , आंसू  छलकते  आँख से ,
प्यार की हर बात होती , आँख की है आँख से।

मन की लहर पर , याद की कश्ती न रखना तुम कभी ,
जाने कब लहरें बहा ले जायेंगी  मझधार में।

डूब जाने को समंदर की जरूरत है नहीं  ,
हमने देखा है , किनारे पर सफ़ीना डूबते।

तुम चले जाओ कहीं भी , याद रखनी बात यह ,
टूट कर पत्ता नहीं जुड़ता कभी भी शाख से।

Monday, March 12, 2018

अपनों से मिलने को

अपनों से मिलने को जब इस दिल को होता है  ,
कितना आकुल , कितना व्याकुल दिल यह होता है।

सर - सर चलती हवा पहुँचती , कभी फूल के पास ,
कभी चूमती है पर्वत को और कभी आकाश।

चीड़ - चिनार  व देवदार भी उसे बुलाता है ,
अपनों से मिलने को जब इस दिल को होता है।

नहीं समय की पाबंदी है , ना कोई बंधन ,
जब मन  करता , उड़ चलता , फिरता नंदन - कानन।

आज मनुज की बातों में अपनापन खोता है ,
अपनों से मिलने को जब इस दिल को होता है।

हम भी हवा सा बन जायें  और चूमे नित आकाश ,
हो ऐसा दिल सबका , जिसमें प्यार बरसता है।



तुम याद बहुत आती हो

अंतस की पीड़ा जब घुलने लगती मन में ,
तुम याद बहुत आती हो।
जब वसंत की थापों पर सरसों लहराता ,
तुम याद बहुत आती हो।
जब - जब बादल घिरने लगता नीले नभ में ,
तुम याद बहुत आती हो।
जब घेर लेता तनहाई मुझको साँझ ढले ,
तुम याद बहुत आती हो।
जब - जब बजती दूर कहीं भी शहनाई है ,
तुम याद बहुत आती हो।
जब - जब मेरी आँखों में तिरते हैं सपने ,
तुम याद बहुत आती हो

Tuesday, February 13, 2018

पहाड़ की लड़की

पहाड़ की लड़की ,
होती है
एक सम्पूर्ण कविता ,
इसमें निहित है ,
छंद - ताल ,
लय और सुर ,
गीत और संगीत  ......

जब कभी ,
किसी पहाड़ी सोते से ,
भर कर पानी
ताँबे की गगरी में ,
और फिर
रख कर कमर पर ,
चलती है लड़की
पहाड की ऊँची - नीची ,
चढ़ती - उतरती
पगडंडियों पर ,
मन्दाकिनी की
धार सी पवित्र ,
चंचल  - छल - छल करती ,
अपनी धुन में चलती ,
सारा वातावरण
झंकृत हो उठता है ,
बज उठता है संगीत ,
फूट पड़ते हैं झरने ,
खिल उठता है बुरांस ,
बुरांस का फूल है लड़की ,
अनुपम , अद्भुत ,अद्वीतीय ,
अप्रतिम सौंदर्य लिए
प्रकृति का वरदान ,
ईश की सृष्टि
होती है लड़की ,
रचती है पूरा संसार ,
धरा और आकाश ,
पर्वत , सागर और नदियाँ ,
करती है जीवन का विकास,
चाहती है सम्मान ,
अन्यथा  ,
विनाश ही विनाश   .........

( नोट  : - प्रकाशित  )

आओ आज गले हम मिल लें

आओ आज गले हम मिल लें ,
कुछ तुम रो लो , कुछ हम रो लें ,
आँखों से आँसू छलका लें  ,
दिल के जख्मों को सहला लें ।

मौसम का है आना जाना ,
जीवन का भी आना जाना ,
भूली बिसरी यादों को हम ,
मिल बैठ कर फिर महका  लें।

कभी पतझड़ है , कभी वसंत है ,
जीवन भी तो इक वसंत है ,
इस वसंत को जी भर जी लें ,
तुम्हे हँसा लें , खुद भी हँस लें।

मानो तो मदिरा है जीवन ,
न मानो तो एक गरल है ,
मदिरा और गरल हम पी लें ,
आओ इस क्षण को हम जी लें।
आओ आज गले हम   .........

Monday, February 12, 2018

गीत ( गव्य )

आ जा खुली हैं कब से ये बाहें ,
दिल मेरा तुझको पुकारे।    

कितना हँसी आज का है ये मौसम ,
मौसम करे क्या इशारे ,
हर ओर कलियों की है मुस्कराहट ,
हँसती हुई ये बहारें।
आ जा   .........

हवाओं की बाहों पर बादल घनेरे ,
बरसाए रिमझिम फुहारें ,
कलियों की अधरों पर भँवरों की नजरें ,
मस्ती भरे ये नज़ारे।
आ जा  .......

सतरंगी किरणों ने धनुषी छटाएँ
अँगना गगन के पसारे ,
तुम हो कहाँ आ भी जाओ ओ साजन ,
पलकों ने पथ हैं बुहारें।
आ जा  ......

Sunday, February 4, 2018

" आग "

रोटी पकाने के लिए ,
आग की जरूरत होती है ,
रोटी ,  वह चाहे पेट के लिए हो
या , राजनीतिक लिप्सा के लिए ,
या फिर ,
कुर्सी के लिए ही।

आग जलाने के लिए ,
समिधा की जरूरत होती है ,
समिधा चाहे  " धर्म " की हो
अथवा , " जाति  " की हो ,
या फिर ,
" आरक्षण " की ही
आग तो आग है ,
वह कभी फर्क नहीं करती ,
" अमीर " और " गरीब " की ,
" बच्चे " और " बूढ़े " की ,
" मर्द " और " औरत " की ,
" अभिजात " और  " अनअभिजात " की ,
कोई भी जले ,
" युवा " जलें तो जलें ,
" प्रतिभा " जलती है तो जले ,
" देश " जलता है तो जले ,
रोटी अपनी सिंकनी चाहिए  ।

कब छुटकारा पायेंगे हम
इस ओछी मानसिकता से  ?
यह देश हमारा है ,
ये युवा हमारे हैं ,
ये  " बच्चे " ये  " बूढ़े "
ये हमारी  " बहनें " और  " माएं "
हमारी ताकत  हैं  ,
हमारी धरोहर हैं।
क्या हम इतने कमजोर हैं
कि ,
अपनी अमानत की ,
स्वयं , रक्षा  नहीं कर सकते  ?
या फिर , हम अविवेकी हैं  ?
हमारी कमजोरियों और अविवेकीपन को
भाँप कर ही ,
शत्रु बलवान होते हैं  ।
तो , आओ ,
हम अपने सीने में आग  जलायें  ,
और ,
अपने अन्दर और बाहर के
शत्रुओं का नाश करें ,
अपने मन की  " सरहदों "को
अपने  देश की "  सरहदों  "  को
सुरक्षित करें ,
और ,
गर्व से  कहें  -
हम महान हैं ,
यह हमारा देश महान है ,
यह  " भारत " है , 
यह हमारा भारत है। 
 
ब्लॉग तिथि - 04 - 02 - 2018


( नोट : - प्रकाशित )


Tuesday, January 16, 2018

इसीलिये वह जली

जाने कितनी पीड़ा
रही होगी उसके मन में  ,
जब ही मन के साथ
स्वयं अपने ही तन में
उसने आग लगाई होगी  ,
हाँ , अवश्य ही
तपन आग से भी ज्यादा
उसके अपने मन की होगी ,
इसीलिए वह जली
नहीं चीखी  - चिल्लाई  ......

अन्तर्मन  की पीड़ा  में  जब
पल -पल वह  घुलती  होगी ,
अति  विवश  हो  कर  ही  उसने
जग  से  कूच  किया  होगा ,
जाने  कितने  दर्द  रहे  होंगे
उसके  हृतस्थल  में  ,
जब  कण्ठहार  रस्सी  का , वह
ग्रीवा  में  डाल  रही  होगी ,
नहीं  चीख -चिल्लाहट  थी ,
पीड़ा  थी  इतनी  दुःखदायी।
इसीलिये  वह  जली
नहीं  चीखी  चिल्लाई  .......

स्तब्ध  दिशायें  हुईं
हुई  तार -तार  जब अस्मत ,
तुला  न्याय  की  भी  टूटी
जब  हुआ  न्याय  असंगत ,
पीड़ित  को  ही  दोषी  मान ,
दण्डित  वह  करता  है ,
और  ,
भेड़िए  लेते  हैं  जग  में
खुले  आम  अंगड़ाई ,
इसीलिए  वह  जली
नहीं  चीखी  चिल्लाई   .....

         --- ( प्रकाशित )

Friday, December 29, 2017

गंगा मैली हो गई है ....

भोर की आहट भर थी ,
भोर नहीं हुई थी ,
मैंने माँ गंगे से पूछा  -
हे ! पतित पावनि ,
पापहारिणी ,
माँ गंगे !
शीतल , निर्मल
स्वच्छ धाराओं संग ,
छल - छल, कल - कल  कर
बहती रहती हो अनवरत , अबाध ,
कभी भगीरथ की प्रार्थना से
द्रवित हो ,
तुम धरती का उद्धार करने
अवतरित हो  ,
मौज में बहने लगीं ,
पर , अब सभी कहते हैं  , कि
गंगा मैली हो गई है  ......
और ,
इस मैली गंगा के आँचल की सफाई
वर्षों से हो रही है ,
करोड़ों खर्च हुए ,
करोड़ों खर्च हो रहे हैं ,
करोड़ों खर्च होंगे
पर , तुम्हारा आँचल
मैला का मैला ही रहा  ,
ऐसा क्यूँ  ?
माँ की अधरों पर
एक निश्छल मुस्कान उभरी ,
कहने लगीं  -
वत्स ! माँ का आँचल तो
कब से मैला ही है ,
मैं बार - बार धोती हूँ ,
बार - बार साफ करती हूँ
और तुम हो कि
इसे बार - बार मैला कर देते हो  ,
फिर पूछते भी हो !

अरे !
करोड़ों खर्च करो या अरबों  ,
रुपयों से भला माँ का आँचल
कैसे साफ होगा
जब, हमारे पुत्रों का
मन ही मैला हो   ?
यह आँचल धन से नहीं ,
मन और तन के श्रम से
साफ हो सकेगा  .......
मेरे जीर्ण - शीर्ण जीवन पर
कौन ध्यान देता है ,
सभी अपने नाम की
डुगडुगी पिटवाते हैं  ,
और ,
हमारे ही तट पर बैठ कर
सन्यासी बन जाते.हैं  ।

जब व्यवस्था में ही दोष हो
और , मन में भी खोट  हो  ,
तो ,
एक मेरा ही दामन क्या
सभी का दमन मैला ही रहेगा ,
चाहे जितनी चन्दन घिसो ,
चाहे जितना तिलक लगाओ ।
अब कोई भगीरथ नहीं ,
जिसने जनकल्याण के लिए
वर्षों तपस्या कर
मुझे इस धरा पर लाया।
अब तो
सभी शाशक
और
सभी शोषक बने हैं ,
जनकल्याण की भावना
विलुप्त हो गई है
और लक्ष्य
स्वकल्याण और स्वसत्ता पर
केंद्रित हो गई है
और मैं !
मैली की मैली
रह गई हूँ   ........
 
       ---- ( प्रकाशित )

Monday, December 18, 2017

अभिनन्दन

नूतन नवल बरस अभिनन्दन ,
तुमसे नई - नई आशायें ,
निष्कंटक हो पंथ हमारा ,
जीवन पथ पर बढ़ते जायें ।

फूलों सा जीवन यह महके ,
जग को भी महकाते जायें  ,
मन में हो सद्भाव सभी के ,
बैर भाव मन में ना आयें ।

अभ्युदय हो सकल विश्व का ,
मधुर सरस रस को बरसायें ,
प्यार के फूल खिले हर दिल ,
जग को अपना मीत बनायें ।

नित - नित नव सोपान चढ़ें हम ,
नित - नित , नव , नव संरचना हो ,
मानवता हो ध्येय हमारा ,
चहुँ विकास का लक्ष्य बनायें ।

चन्दन सम धरती की माटी ,
माथे इसका तिलक लगायें  ,
इस नव वर्ष करें कुछ ऐसा ,
जीवन कुसुमित सा मह्कायें ।

Sunday, December 17, 2017

राम राज्य

राम राज्य  ?
कौन राम  ?
कैसा राज्य  ?
त्रेता से लेकर
कलयुग तक
राम भटकते ही रहे हैं 
जीवन भर  ........
कभी कर्तव्य  ,  कभी धर्म  ,
कभी राजनीति के
चक्र्व्यूह में फँस कर
सन्यासी जीवन ही
जीते रहे हैं ,
कभी मर्यादाओं में बाँधा ,
कभी सीमाओं में ,
न उनको राज्य ही मिला ,
ना ही ,  अपना धाम ही ।
कभी म्यूजियम में आश्रय मिला ,
कभी टेंट में रखा ,
तो ,
कभी   " सरयू " के तट पर
बहलाने को
हजारों प्रज्वलित दीपों से
स्वागत किया  ,
' अतिथि देवो भव ' !
वस्तुत: , हम राम को
छलते ही तो रहे हैं  ,
और ,
राम ! भोले राम
छले जाते रहे ,
छले जाने पर भी
मुस्कुराते ही रहे  ....... .
वह नियति के नियंता ,
मानव के इस कौतिक क्रीड़ा को
देखते हैं , समझते हैं
और ,
मुस्कुरा भर देते हैं ,
वह जानते हैं  -
यह विश्व - यह जगत
विष - कुंभ है ,
सभी इस विष - कुंभ के विष को
पी रहे हैं ,
कुछ कम , कुछ ज्यादा ,
सभी आनंदमग्न हैं
अपने आपको  छलते हुए   !
सत्य से
सभी को डर लगता है
इसलिए , अपने मन के अन्दर
वे नहीं झांकते हैं ,
कहीं वहाँ से गिर न पड़ें  ........
हा राम !
तुमने ताड़का को मारा ,
मारीच को मारा ,
बाहू - सुबाहू ,मेघनाद को मारा ,
रावण को भी मार गिराया ,
पर अपने ही निर्मित मानव के
मन के अन्दर छिपे बैठे
स्वार्थ और दुर्भावनाओं के दानव को
नहीं मार सके ,
भले तुम्हे अपने सिंहासन पर
विराजित नहीं  किया जा सका है
परन्तु , आदि से अनादि तक
सत्ता पूजित और पोषित
होती रही है , होती रहेगी ,
और , तुम यूँ ही
कभी यहाँ  , कभी वहाँ
भटकते ही रहोगे ,
आखिर एक माँ का श्राप भी तो तुम्हे  है  ,
" श्रवण कुमार " की आत्मा
अब भी भटक रही है ,
भटक रही है , भटक रही है  .........
(  यह कविता मैंने 9 दिसम्बर 2017 को लिखी  )
        ---- ( प्रकाशित )

Sunday, September 3, 2017

चाहत हमारी है

खिलेंगे फूल  खुशियों के , मगर तब हम नहीं होंगे ,
ज़माना मुस्कुराएगा  , मगर तब हम नहीं होंगे ,
मिले जन्नत , रहो आबाद , दुआ है तुमको ये मेरी ,
भले आँखों में है आँसू , जुवां पर है दुआ मेरी।

रहो जिस ठौर भी तुम सब , रहे सूरज की किरणें भी,
उजाले ही उजाले हों सदा , चाहत हमारी है  ,
नहीं गम हो कभी कोई , भरा खुशियों से दामन हो ,
तुम्हारे हिस्से के काँटे , ख़ुदा से माँग  मैं  लूँगा।

Friday, August 4, 2017

कोयल बोल रहा है

बादल ने तंबू गाड़े ,
आये  बरखा के दिन  ,
बारिस की बूंदों ने गया ,
रिम -झिम ता -ता धिन। 
पपीहा बोल रहा है ,
 पपीहा  बोल रहा है।

भींगी हवा हुई मस्तानी ,
मन है डाँबा - डोल ,
गोरी के नैना हैं देखो ,
खोल रहे हैं पोल।
 पपीहा बोल रहा है ,
 पपीहा बोल रहा है।

छमक - छमक कर बुलबुल चलती ,
घायल मातादीन ,
मौसम का आनन्द ले रहे ,
चाचा नसरुद्दीन ,
 पपीहा बोल रहा है
 पपीहा बोल रहा है।
( नोट : - रचना तिथि   25 . 07 . 2017  )








































































Friday, June 16, 2017

एक और महाभारत

मैं वक़्त हूँ  ,
मैं देखरहा हूँ ,,
चारों ओर लूट -खसोट हो रहा है ,
जिसे देखो , वही लूट रहा है ,
वही लुटेरा है ,
अमीर , और , अमीर  हो रहे हैं ,
गरीब  , और , गरीब हो रहे हैं ,
विद्वत जनों का अपमान हो रहा है ,
खल  पूजे जा रहे हैं ,
स्त्रियों की अस्मिता  ,
लूटी जा रही है  ,
मनुष्यता लुप्त हो रही है ,
क्रूरता अट्टहास कर रही है ,
पशुतापन बढ़ रहा  है  ,
दानवता पैर पसार रही है ,
हर गली - मोहल्ले  , चौराहों पर ,
रोज ही ,
द्रौपदी , निर्वसन  की जा रही है  ,
लोग मौन हैं  ,
युद्धिष्ठिर , अर्जुन ,भीम ,
नकुल और सहदेव  ,
तमाशाईयों की भीड़ में खड़े है  ,
दंभित प्रण कर  ," भीष्म पितामह  " ,
कौरवों की सेना से घिरे   ,
बार -बार
अपने धनुष पर  ,
प्रत्यंचा चढ़ा कर ,
अपनी  आत्मतुष्टि के लिए ,
टंकार दे रहे हैं  ,
एक और महाभारत की ,
जमीन तैयार हो रही है   .........

                      -------    ( प्रकाशित )