Friday, July 18, 2014

पत्थर-पत्थर, भगवान।


संत उन्हें ही जानिये , पर-दुःख जिन्हें सताय ,
करै भेद इंसान में , कैसे संत कहाय। 
जीव ईश का अंश है , है गीता का ज्ञान ,
मुझ में तुझ में ईश है , पत्थर-पत्थर , भगवान।
ना मंदिर , मस्जिद गए ,न गुरुद्वारा न चर्च ,
इन्सां धर्म निभाईये , लागे ना कोई खर्च।
कोई पूजै पोथी को , कोई पूजै पहाड़ ,
जिसकी जैसी आस्था ,करें क्यों तिल का ताड़।
जित देखा तित पाईयाँ , गुरु , ईश , अल्लाह ,
एक साथ तीनों खड़े , वाह ! वाह ! वल्लाह।



Friday, June 27, 2014

जो चला अकेला


मन में उठते तूफानों को ,
बाँध गगन उड़ जाना है ,
भर साहस अपने बाजू में  ,
नभ में तुमको छा जाना है।

इस धूप-छाँव की दुनियाँ में ,
सुख-दुःख साथ निभाना है ,
जीवन  के अनमोल सफर में,
मिलना और बिछड़ना  है।
मन के द्वन्द्वों को छोड़ निकल ,
तुम को मीलों चलना है ,
जो चला अकेला,वही चला ,
मंजिल पार पहुँचना है।
तू माँझी है ,जग सागर है ,
सागर लाँघ निकलना  है ,
क़श्ती है तुम्हारा मन केवल ,
क़श्ती पार ले जाना है।
 

Sunday, June 22, 2014

वतन के वास्ते


एक  पत्थर तो  हवा में उछाल कर देखो ,
कहर बन कर,दुश्मन पर बरस कर देखो ,
हो नाम शहीदों में तुम्हारा भी  कहीं ,
चमन के वास्ते , सिर पर कफ़न बाँध कर देखो।

आजादी के शोलों को जला कर रखो ,
दुश्मन से गुलिस्तां को बचा कर रखो ,
कोई नापाक निगाहें न वतन पर उठे ,
अपनी आँखों में चिंगारी सजा कर रखो।

वतन के वास्ते ,जीने का फ़न सीख लो ,
कुर्बानी का जज्वये हुनर तो सीख लो ,
दे देंगे जां ,तिरंगा न झुकने देंगे ,
अपने कलम को तलवार बनाना तो सीख लो।

नागफनी उग आया है





नागफनी  उग आया  है
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तमाम उम्र समझते रहे हम,
रिश्तों के समीकरण ,
देखता हूँ अब इनका भी
हो गया है भौतिकिकरण।
खो गई है लावण्यता ,
हर चेहरा मुरझाया है ,
यह सच है कि  फूल कोई 
असमय ही कुम्हलाया है
"रिश्तों का अनुबंध"
अर्थ " पर टिक गया है,
" अर्थ " बिना हर रिश्ता ,
अर्थहीन हो गया है।
गैर  से दीखते हैं ,अब ,
सब ,अपने भी पराये,
लगता है  रिश्तों में ,
नागफ़नी  उग आया है। 

Friday, June 20, 2014

दीप-शिखा

 ( प्रस्तुत कविता श्री जसजीत सिंह , वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक ,उत्तर रेलवे ,मुरादाबाद के दिनांक 14 -07 -1988 को ,देहरादून स्टेशन पर प्रथम आगमन के अवसर पर स्वागत -सम्मान समारोह में मैंने पढ़ कर सुनाया तथा इसकी एक प्रति उन्हें भेंट किया )




तुम तरुवर ,हम भटके राही ,
तुम सरवर ,हम प्यासे राही  ,
तुम ज्योतिर्मय दीप-शिखा हो ,
आशा की किरणों को लेकर ,
जगमग-जगमग दीप जलाओ ,
दिशाहीन भटके राही को ,
आशा की एक राह दिखाओ ,
और ,
निराशा के सागर में ,
उतराते जो ,
कर गह कर ,
तुम उन्हें उबारो।
तुम हो एक कुसुम इस तट के ,
हम पंछी इस सागर तट के ,
कुसुम गंध को फैलाओ तुम ,
कुसुम गंध को फैलाएं हम ,
आओ मिल कर मोद मनायें ,
आओ गीत मिलन के गायें ,
जीवन को खुशियों से भर दें ,
जीवन को महकाते जायें।

तुम्हें " देवता " बना देगा …

यह बात कितनी सच है-
जो पैरों पर गिरता है
उसे ठोकर मार दिया जाता है ,
जैसे -धूल और राह का पत्थर ....
यही बात इन्सानों के साथ भी है ,
फर्क केवल इतना है, कि
धूल या पत्थर टूटते नहीं ,
इंसान यानी आदमी टूट जाता है ....
यह बात भी कितनी सच है, कि
सितारों के टूटने की आवाज नहीं होती है ,
ठीक उसी तरह ,
आदमी के भी टूटने की आवाज नहीं होती है ,
पर आदमी टूट जाता है ,
जिन्दा रह कर भी ,
जिन्दा लाश बन कर रह जाता है... ..
आदमी होकर ,
आदमी को ठोकर तो मत लगाओ ,
इन्हें पत्थर नहीं ,आदमी बनाओ।
माना , तुम देवता नहीं बन सकते हो ,
रहनुमा तो बन सकते हो !
और ,
आदमी को आदमी तो बना सकते हो !
कौन जाने ,कौन कितना थका -हारा है  ?
और ,
चुपचाप लब सिले बैठा है ?
उसकी  "थकन "और "हार "का
अंदाजा तो लगाओ ,
"सच "को जो जान पाओगे
"प्यार " का अहसास ,और
"भलाई " का मंत्र ,
तुम्हें " देवता " बना देगा  …

(  यह कविता देहरादून स्टेशन पर श्री राम प्यारे ,वरिष्ठ मंडल प्रबंधक ,उत्तर रेलवे के विदाई समारोह के आयोजन पर श्री  जसजीत सिंह , वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक ,उत्तर रेलवे ,मुरादाबाद के दिनांक 14 -07 -88 को ,उनके प्रथम आगमन पर मैंने भेंट किया )

Tuesday, June 17, 2014

पागल


जाड़े की एक रात
एक पागल , फटेहाल
घूमता रहा रात भर
सड़क पर ,
शायद वह भूखा था,
वह एक होटल के सामने रुका ,
फिर दूसरे ,
फिर तीसरे ,

अंदर होटल में लोग
नोच - नोच कर बोटियाँ खा रहेथे
और वह बाहर खड़ा
एक रोटी को तरसता  रहा ..........
किसी ने उसे तवज्जो नहीं दी ,
लोगों ने उसे  दुत्कार दिया  -
कहा -पागल है।
वह चल पड़ा ,
एक आवारा कुत्ता
उस पर भौंका ,
पागल चलता रहा ,
कुत्ते ने पागल को पास से सूंघा
फिर वह
पागल के साथ - साथ चल दिया ,
पागल ने कुत्ते को देखा
कुत्ते ने पागल को ,
जहां-जहां पागल गया
वहाँ-वहाँ कुत्ता गया .........
पागल एक कूड़े के ढेर  के पास रुका
कुत्ता भी रुक गया ,
दोनो, फिर कूड़े के ढेर  में
कुछ ढूंढने लगे ...........
अल सुबह
लोगों ने देखा
वह पागल कूड़े के ढेर  के पास
मृत पड़ा है
और
एक कुत्ता
उसके मृत शरीर से सट कर
उदास बैठा है .........

Tuesday, June 10, 2014

माँ




माँ तो माँ होती है ,
बच्चों की जां होती है ,
हो चाहे कितनी भी विपदा ,
माँ पहाड़ होती है ,
माँ तो माँ होती है।

ऊपर से कठोर दिखती है ,
दिल में ममता होती है ,
खुद झेलती है विपत ,
बच्चों को सुख देती है ,
माँ तो माँ होती है।

तुम पुकारो ईश को ,
माँ पहले आ जाती है ,
माँ नाम है ईश का ,
माँ तो पूरा जहान होती है ,
माँ तो माँ होती है।

Monday, May 12, 2014

माँ !तुम क्यों चली गईं ?


माँ !तुम क्यों चली गईं ?
तुम थी 
तो घर था ,परिवार था ,
व्रत था ,त्योहार था ,
भाई थे ,बहन थी ,
नाते रिश्तेदार थे  ,
खुशियाँ थी ,भाव था ,
एक दूसरे के लिये प्यार था |

माँ !तुम क्यों चली गईं ?
आज भी सब कुछ है ,
पर प्यार का अभाव है ,
भाई है बहन है ,
पर रिश्तों में दुराव है ,
आदर का अभाव है ,
खुद को बड़ा दिखाने का चाव है |

माँ तुम्हारे जाने के बाद..
घर अब मकान है ,
सबके लालसा की दुकान है ,
रिश्तों को तोड़ने का सामान है ,
बदनीयती बढ़ाने का खान है,

माँ !शायद तुमको इसका अहसास था ,
दिल में दर्द था ,मन उदास था ,
तभी तुम चली गईं ,
और तुम्हारा मकान ?
सब कुछ देख कर ,
शर्मशार है ,
और अपने आपको
धरती में मिलाने को
बेकरार है |
   -  मंजु सिन्हा
       डी - 40 , रेस कोर्स ,
        देहरादून। 
      11-05-2014   (  मदर डे स्पेशल  )


Tuesday, April 1, 2014

किरणें बोलीं सुन मेरी बात।

















सूरज निकला हुआ प्रभात ,
किरणें बोलीं सुन मेरी बात ,
पहले मातु -पिता की पूजा ,
दूजे गुरु के चरण प्रणाण ,
तीजे नमन ईश को करना ,
करना फिर दिन की शुरुआत ,
किरणें बोलीं सुन मेरी बात।

संत जनों का आदर करना ,
सच का साथ कभी ना तजना ,
रखना सदा ही सब का मान ,
करना नहीं मिथ्या अभिमान ,
दीन -दुखी की सेवा करना ,
सदा याद रखना यह तात ,
किरणें बोलीं सुन मेरी बात। 

मिल कर रहना तुम हे प्यारे ,
बंद मुट्ठी से सब  हैं हारे ,
बाधाओं से मत घबराना ,
धीरज - धैर्य कभी न खोना ,
साहस के बल पर ही नाविक ,
लहरों को देते हैं मात ,
किरणें बोलीं सुन मेरी बात।

Friday, February 7, 2014

सच्ची -सच्ची कहता हूँ

नहीं जँचेगी बात तुम्हें ,पर सच्ची -सच्ची कहता हूँ ,
मैं झूठ नहीं कुछ कहता हूँ ,मैं आँखों देखी कहता हूँ ।

बातों की खेती होती है ,लाशों की खेती होती है ,
जिसे  काटते - बोते हैं कुछ खाश किस्म के लोग यहाँ ,
हैं लोग बड़े ही भले यहाँ।

देख खेत में लाशों को ,गिद्धोँ के बिचरण बढ़ जाते ,
हैं इनमें से कुछ बड़े -बड़े , कुछ छोटे और मँझोले हैं ,
पर पर सब के सब ही भोले हैं।

सुन कर अटपटा लगा होगा , मुझ पर विश्वास घटा होगा ,
पर बात सुनाता खरी - खरी , है सोलह आने बात  सही।

मनुज यहाँ बिक जाता है , कफ़न यहाँ बिक जाता है ,
खड़े - खड़े ही लोगों का ईमान यहाँ बिक जाता है।

गोदामों में पड़े - पड़े ही ,अन्न यहाँ सड़ जाता है ,
किन्तु ,बचपन रोता - रोता ,भूखा ही मर जाता है।

मनरेगा में मजदूरों का , श्रम यहाँ बिक जाता है   ,
मिड -डे मील का खाना भी भी , प्रबंधक ही खा जाता है।

 कहने को तो स्कूलों में खाना पोषक ही मिलता ,
उनसे भी जाकर पूछो , जिनका सड़ांध से नाता है।

वो अक्षर ज्ञान को क्या बांचे , है जिनका पेट नहीं भरता ,
पर नेताओं के दावत में , मुर्गा हलाल हो जाता है। 

( 13- 7 - 2013 की रचना  )




Monday, February 3, 2014

आयल बसंत बहार













 आयल बसंत बहार
सखी री , मोरा पिया  नहीं आयल  ।
सावन मास वाणिज को गयल पिया ,
नहीं लीनी सुधि भी हमार
सखी री,मोरा पिया नहीं आयल ।
कही के गयल पिया अबहुँ लौं आवति ,
बीत गयल दिन-मास
सखी री मोरा पिया नहीं आयल ।
नहीं कोउ पतिया , न कोउ खबरिया ,
कासे पठावउँ सन्देश
सखी री मोरा पिया नहीं आयल  ।
डारि-डारि बिहुँसहिं कलियाँ निगोरी ,
भँवरा करत गुँजार
सखी री  मोरा पिया नहीं आयल ।
महकै जो बौरना तो हिया बौराबै ,
महुआ पकहिं वन माहिं
सखी री मोरा पिया नहीं आयल  ।
चहुँ ओर कूजत कोयलिया कारी ,
उठत करेजवा में पीड़
सखी री मोरा पिया नहीं आयल  ।
साँझ भये जोहूँ बाट - डगरिया ,
जोबना भयल मोर उदास
सखी री मोरा पिया  नहीं आयल  ।
आयल बसंत बहार ,
सखी री मोरा पिया नहीं आयल  ।


Thursday, January 23, 2014

कोरा - कोरा दिल है मेरा


कोरा - कोरा दिल है मेरा ,कोरा-कोरा गीत ,
ढूंढ रहा है यह दिल मेरा ,मन का कोई मीत।
किसे बताऊँ, किसे सुनाऊँ, दिल की  अपनी बात ,
दिन ढल जाता, शाम है आती, आ जाती फिर रात।
जब सागर के खुले वक्ष, छू लेता पूनो चाँद ,
मचल-मचल सागर की लहरें, चलीं चूमने चाँद ।

Wednesday, January 22, 2014

पहाड़ की नारी की व्यथा



बहुत दिनों पर चिट्ठी तेरी आन मिली है ,
पूछ रहे हो हाल हमारा क्या बतलाऊँ ,
जैसे  - तैसे कट जता है जीवन  मेरा ,
अपनी पीड़ा इस ख़त में कैसे जतलाऊँ।

जीवन कितना कठिन हो रहा है पहाड़ पर ,
पीने के पानी को मीलों चलना पड़ता ,
नहीं सड़क है यहाँ कोई कच्ची या पक्की ,
ऊबड -खाबड़ पथरीले पथ चढ़ना पड़ता  ।

मिलती नहीं है बाज़ारों में हरी सब्जियाँ ,
सब ही सब चट कर गईं सुना है बड़ी इल्लियाँ ,
नमक,दाल ,चावल,आटा का हाल बुरा है ,
इससे तो सस्ती बोतल की बन्द सुरा है।

सुना,कि पिट्रोल -डीजल का कुछ दाम बढ़ा है ,
फिर भी नहीं मँहगाई का बोझ बढ़ा है ,
बढ़ा- चढ़ा  है,तो केवल बस प्याज चढ़ा  है
संग टमाटर भी थोड़ा सा साथ बढ़ा है।

हैं बिजली के तार सजे खम्भों पर लेकिन ,
नहीं बल्ब है इन खम्भों पर कभी लटकता ,
नहीं सूझता यहाँ हाथ को हाथ रात में  ,
रह-रह कर अम्मा-बाबू का दिल घबड़ाता।

नहीं डाक्टर यहाँ कभी कोई मिलते हैं ,
ना ही मिलती दवा यहाँ की दूकानों पर ,
यदि तम्हें फुर्सत मिल जाए अपने काम से ,
कुछ दवाईयाँ भी तुम अपने साथ  ले आना।

जलती नहीं है गीली लकड़ी भी चूल्हे में ,
खाँस -खाँस कर मेरा दम घुटने लगता है,
नहीं मदद सरकारी कोई मिलती है ,
मौसम का भी कोप हमें सहना पड़ता है।
एक काम है और तम्हें कैसे बतलाऊँ ,
संभव हो तो तेल मिट्टी का भी ले आना 
चाँद तोड़ कर लाना ,चाहे न लाना ,
एक सिलेंडर साथअपने तू ले आना।

         ----  (  अभ्यर्थना शीर्षक से प्रकाशित )

Tuesday, January 21, 2014

उठाओ , मेरी जलती चिता से मशाल

मैं जीना चाहती थी ,
जीने कि जिजिविषा थी मुझ में ,
जीने कि लालसा में
मैं अपनी टूटती साँसों से
लगातार संघर्ष कर रही थी  ।
मेरी आँखों में ,
अब भी भय था ,संत्रास था ,
चिंदी - चिंदी हो रही थी  मेरी अस्मिता
मेरे बदन पर मानो
सहस्त्रों बिच्छुओं ने
एक साथ डंक चुभो दिये हों ,
मैं दर्द और पीड़ा से
चीखती रही , छटपटाती रही........
मेरा सम्पूर्ण शरीर ,जैसे सड़ गया,और
असंख्य कीड़े बिल - बिला रहे हैं ,
रेंग रहे हैं ,
मैं बेसुध हो गई,
जैसे ही होश आया
मैं पुन: संघर्षरत हो गई ।
मैं  नहीं हारी ,
हार कर   पिशाचों ने
मुझे खिड़की से बाहर फेंक दिया ,
फिर , मैं एक तमाशा बन गई............
सदियों से
यही होता चला आ रहा है ,
नारियाँ ,
जो संसार को चलातीं हैं ,
वही रौंदी जातीं हैं ,कुचली जातीं हैं ,
सताई जातीं हैं ,
काटी जातीं हैं ,
जलाई जातीं हैं।
नारियाँ ,
जो , कभी माँ , कभी बहन ,
कहीं पत्नी ,
कहीं नानी , दादी ,बुआ ,मौसी और
न जाने कितने रिश्तों को जोड़ कर
ममता और स्नेह से
पुरुष  को सींचतीं हैं,
वही पुरुष , कापुरुष,
नरपिशाच बन जाता है ,
कैसा अधम है यह पुरुष जो  ,
सम्पूर्ण नारी जाती को
अपमानित , कलंकित और
तिरस्कृत करता है ?
नारियों ,उठाओ ,
मेरी जलती चिता से मशाल
और
जला दो इस विश्व को ,
ऐसे विश्व का क्या करना
जो विषकुंभ बन गया हो ...........



 

Sunday, January 19, 2014

कुछ गीत लिखे अपने मन की




निज करतल में मैं प्रकृति का श्रृंगार लिए चलता हूँ  ,
मैं अपने उर में जीवन  का उद्गार लिए चलता हूँ    ।

मैं पथिक अकेला अपनी राह का, मस्ती में चलता हूँ ,
मैं अरमानों और भावों का उपहार लिए चलता हूँ    ।

तूफ़ानों - झंझावातों को मुट्ठी बाँध  लिए चलता हूँ     ,
सुख - दुःख के दोनों तीरों को अपने साथ लिए चलता हूँ  ।

निविड़ अंधकार  में भी , पथ , आलोकित कर के चलता हूँ ,
साहस के बल, हर मुश्किल ,हँस कर पार किये चलता हूँ    ।

नहीं संग कोई संगी साथी ,मन को साथ लिए चलता हूँ  ,
मैं मौजों में भी हिम्मत का पतवार लिए चलता हूँ   ।

मिले राह में काँटे भी ,  मैं , उनको प्यार किये  चलता हूँ   ,
कुछ गीत लिखे अपने मन की , वह गीत गाये चलता हूँ   ।





Saturday, January 18, 2014

ज़िंदगी के यारों ऐसे मजे कहाँ हैं


है आ गया बुढ़ापा यह हम भी जानते हैं
पर बोझ है बुढ़ापा यह हम न मानते हैं। 

हर रोज हर सुबह में  हम साथ बैठते हैं
पीते  हैं चाय मिलकर और टी वी देखते हैं।

तैयार होते - होते हो जाता दोपहर है
हो जाता जल्दी यारों , खाने का भी प्रहर है।

खाना बनाती मैडम , फिर साथ बैठ खाते ,
बस इस तरह ही दोनों हर दिन गुजारते हैं।

न शिक़वा कोई है मुझको, न उनको है शिकायत
हर रोज घूमने की  हमने लगाई आदत।

होती अगर इनायत कुछ दोस्त आ के मिलते
हम भी कभी-कभी ही , हैं उनके घर पहुँचते  ।

कुछ खाश हो खबर तो अखबार भी हैं पढ़ते
टी वी और रेडियो पर गाना - ग़ज़ल हैं सुनते।

तकलीफ है बुढ़ापा कहते सभी यहाँ हैं
पर ज़िंदगी के यारों ऐसे मजे कहाँ  हैं। 
रचना तिथि - मई , 2012 

लौट आओ















लौट आओ  तुम , (कि ) अब ये
दिल मेरा  लगता नहीं ,

नेह के इस पंथ को , न जाओ ,
तुम यूँ छोड़ कर  ,
जन्मों के बंधन हैं ये , न जाओ ,
तुम यूँ तोड़ कर ,
चुप न बैठो ,कुछ सुनाओ
दिल मेरा लगता नहीं..........

फूल संग काँटे रहें , या
संग काँटे फूल  के
संग ही हम तो खिले हैं
जग के इस दुकूल पे ,
रूठ कर तुम यूँ न जाओ
दिल मेरा लगता नहीं  ........

साथ ही जीवन मिला है
साथ ही हम  जाँयेंगे   ,
इस धरा पर प्यार का
संदेश दे कर जाँयेंगे  ,
तुम जरा सा मुस्कुराओ 
दिल मेरा लगता नहीं ..........

प्यार के जो क्षण मिले
आओ सजाएँ  प्यार से
बिन तुम्हारे प्यार के ,कोई
छंद बन पाता  नहीं  ,
गीत कोई गुन - गुनाओ
दिल मेरा लगता नहीं ........

अभिनन्दन नव वर्ष



नये वर्ष में मिलकर हम सब
नये - नये सपने बुन लें  ,
किस्म - किस्म के फूल यहाँ हैं  ,
उनमें से कुछ हम चुन लें  ।

आशाओं के नये पंख ले
जीवन- नभ में हम  उड़  लें  ,
नहीं करेंगे वैर किसी से
मन में यह निश्चय कर लें  ।

भ्रष्टाचार और कदाचार  का
साथ न देंगे जीवन में ,
अपने से छोटों की झोली
सदा प्यार से हम भर दें   ।

मातु - पिता गुरुजन की सेवा , का
व्रत हम धारण कर लें ,
हत्या कन्या - भ्रूण का ना हो
ठान के इसका प्रण कर लें  ।

ना जाने कि कौन सी कन्या
जग को तारने वाली हो ,
ऐसा ना हो अपने हाथों
नाश न अपना हम  कर लें  ।

नहीं गये गर मंदिर - मस्जिद
काज नये कुछ हम कर लें ,
किसी गरीब की कन्या को ही
हम थोड़ा शिक्षित कर लें  ।

हम मानव हैं मानव बन कर
जग में कुछ ऐसा कर लें
जिससे हो कल्याण विश्व का
इतिहास ऐसा रच लें  ।

अभिनन्दन नव वर्ष तुम्हारा
अमन चैन खुशहाली हो ,
विश्व के कोने - कोने में नित
ईद , होली ,दीवाली हो  ।
   
      -----  ( प्रकाशित )

Monday, December 16, 2013

ओ पहरुए देश के


ओ पहरुए देश के तू जाग ,
तुझको दूर जाना है ,
 छोड़ दे आलस्य ,गर ,
मंजिल को पाना है।

उठाओ जाम अपने जोश का ,
हुँकार भरना है ,
वतन के दुश्मनों का तुम्हें  ,
संहार करना है ।

लगे न जंग हाथों को ,
उठा तलवार , चलना है ,
हम मरेंगे या जियेंगे ,
सोच कर विचलित न होना है।

छिपे गद्दार जो घर में ,
कलम सिर उनका करना है ,
वतन के दुश्मनों से
सदा हुशियार रहना है।

छिड़ा संग्राम सरहद पर ,
वतन के पाशवां जागो ,
उठी है आँख दुश्मन की ,
वतन के नौजवाँ जागो ,
जागो किसानों और
जन -जन देश के जागो  .............. 

ओ पहरुए देश के ............