Friday, September 26, 2014

कोयल क्यों काली हुई ?

पाकर इतनी मीठी बोली ,
कोयल क्यों काली हुई  ?
कुहू-कुहू का रट क्यों करती ,
किसकी मतवाली हुई  ?
कूज , कूज कर शोर हो करती ,
क्यों कर तुम वातुल हुई  ?
आम्र-कुञ्ज में छिपती फिरती ,
क्यों लाजो वाली हुई 

Thursday, September 25, 2014

चिड़ियाँ प्यासी















भरी दुपहरी ,
 लू में तपती
चिड़ियाँ प्यासी ,
बहुत उदासी ,
सूरत रोनी ,
ढूंढ़ रही है पानी।

पानी कहाँ शहर में मिलता ,
यहाँ पानी पैसों से मिलता ,
बोलो चिड़ियाँ ,
कुछ तो बोलो ,
पास तुम्हारे ,
कितने पैसे ?

पिता ब्रह्म ,पिता ही पर्वत

माता धरणि सम हुई , पिता गगन से ऊँचे ,
दृढ़ और संतुलित सीख दे , सुत व सुता को सींचे।

पिता ब्रह्म ,पिता ही पर्वत , माँ शक्ति का स्रोत ,
अटल सत्य है सर्व लोक में , पिता गति के स्रोत।

पिता ने अपनी पौरुषता से , साहस का संचार किया ,
साम-दाम और दंड भेद का ,संतति को है ज्ञान दिया।

कवच, धैर्य व शौर्य - शील का , पिता ने ही है पहनाया ,
विषम काल में शांत भाव से , जीवन जीना सिखलाया।
 
माता ने ममता सिखलाया , पिता से सीखा दृढ़ता ,
उद्दम से ही भाग्य बदलता , कर्म ही भाग्य विधाता।
 
इस सुंदर सृष्टि में हमने , जीवन को साकार किया ,
नमन पिता को हम सब का है , जिसने यह उपकार किया।

Wednesday, September 17, 2014

माँ सा न कोई मिला

आँख खुली तो माँ को देखा , मुझको ईश मिला ,
ढूंढ़ा जग के कोने-कोने , माँ सा न कोई मिला।

माँ पर्वत है ,माँ ही धरनी , क्षीर का सागर माँ ,
जग यह तपता मरुस्थल है ,शीतल जल है माँ।

गोद में जिसके स्वर्ग बसा है , वह मूरत है माँ ,
चरणों में जिसके तीरथ है ,वह सूरत है माँ।

आँचल में आकाश समाया , है देवी सी माँ ,
सब गुरुओं में जो गुरुतर है ,वह है केवल माँ। 

कविता कहना ,ग़ज़ल सुनाना
















कविता कहना ,ग़ज़ल सुनाना ,
ये तो एक बहाना है ,
सच्ची-सच्ची बात है यारों ,
मिलना और मिलाना  है।

जीवन नीरस हो जाए न ,
हँसना और हँसाना है ,
दो दिन की इस बस्ती में ,
सब का एक फ़साना है।

नहीं महत्तर , नहीं लघुतर ,
भेद यहाँ नहीं माना है ,
मस्ती सब की एक यहाँ है ,
सब का एक तराना है।

चिड़ियों सा है मिल कर रहना ,
चिड़ियों सा ही गाना है ,
हमने तो बस गीत-ग़ज़ल में ,
ईश्वर को पहचाना है।


Wednesday, September 10, 2014

पर्यावरण बचाना होगा।


















ईश ने जब यह सृष्टि रची ,
जीने के साधन रच डाले ,
पर्वत-नदियाँ झरनों के संग ,
मनभावन प्रकृति रच डाले।
शुद्ध हवा में सांस ले सकें ,
हरे-भरे कानन रच डाले,
सभी स्वस्थ्य हों ,सभी सुखी हों,
नदियों में मीठे जल डाले।
उसकी इस सुन्दर सृष्टि को ,
प्रदूषित हमने कर डाले  ,
अपने-अपने स्वार्थ की खातिर ,
धरती तहस-नहस कर डाले।
तोड़ पहाड़ों की छाती को ,
द्वार मौत के हमने खोले ,
नदियों के मुख बांध-बांध कर ,
विभीषिका के पथ हैं खोले।
किया विकास  बहुत ही हमने ,
कल और कारखाने खोले ,
धुआँ भरा संसार रचा  कर
दरवाजे विनाश के खोले।
हरे-भरे पेड़ों को काट कर ,
कंकड़-महल खड़े कर डाले ,
लगी सूखने नदियाँ  हैं अब ,
सोये हैं  हो कर मतवाले।
पर्वत-राज हिमालय ने तब ,
कहर स्वर्ग पर बरपा डाले  ,
रूप बदल कर नदियों ने भी ,
जल-प्लावित जन्नत कर डाले।
हाहाकार मचा  है जग में ,
त्राहि-त्राहि हर ओर मची है ,
चीख-पुकार, रुदन-क्रंदन से ,
कोई नहीं बचाने वाले।
भीषण औ विकराल लहर ने ,
होटल-महल सभी धो डाले ,
आज प्रकृति ने छेड़-छाड़ के  ,
इसके सबक हमें दे डाले।
अब भी अगर नहीं संभले तो ,
अपनी मन की करने वाले ,
नदियाँ - धरती सूख जायेंगी ,
सूरज कुपित हैं होने वाले।

खाली न हो जाए धरती ,
हमको इसे बचाना होगा ,
जीवित रहे संतान हमारी ,
हमको पेड़ लगाना होगा।
इससे पहले , हम कुछ खोयें ,
हम को अलख जगाना होगा ,
बची रहे ये धरा हमारी ,
पर्यावरण बचाना होगा।

   -----    ( प्रकाशित )

सुगना बोलै …



सुगना बोलै दिन-रात हो रामा
सुगना बोलै  …
सोनमा के पिंजरा न सुगना के भावै ,
टक - टक, निहारै आकाश हो रामा ,
सुगना बोलै। ……
कहै महतारी , मोहे मन नहीं भावै ,
बाँधौ न सुगना के पिंजरे में रामा ,
सुगना बोलै.......
मचिया बइठल दादी कहै पूत सोनमा ,
केहू के न बंधन में बांधउ  हो रामा ,
सुगना बोलै ……।
हँसि - हँसि  कहै बहिना सुकुमारी ,
सुगना के करि देहु आजाद हो रामा ,
सुगना बोलै ………

Tuesday, August 26, 2014

फुर्सत के क्षण में


           





















                 ( 1  )
हम याद नहीं करते उनको ,              
ऐसा तो नहीं है ,                                                                                   
जाने ,क्यों ये भ्रम पाल रक्खा है ,
ऐसा तो नहीं है ,
हम दिल में उनकी याद लिए
रहते तो हैं हरदम ,
कुछ मजबूरियाँ रही होंगी ,
भूले नहीं हैं हम।
                 (  2   )
खत उनका , बड़े प्यार से
पढ़ते रहे हैं हम ,
लिखने की थी मजबूरियाँ ,
कुछ लिख सके न हम ,
शायद यही बात,
उनको दे गया हो दर्द ,
लब से छलक कर
लेखनी में ,
उतरा मन का गर्द।
              (  3   )
 रास्ते जाने कहाँ-कहाँ पे मुड़ गये ,
हर मोड़ मेरी जिन्दगी में शूल बो गए ,
पर प्रीत के ही फूल बिछाता चला गया ,
काँटों से जिन्दगी को सजाता चला गया।
                (   4    )
छोड़ो गिले औ शिकवे ,
नया कुछ आज कर जायें ,
भूली हुई कुछ मीठी बातें ,
याद कर जायें ,
वो शरारतें ,वो चुहलवाजियाँ ,
सब कुछ तो याद है ,
कुछ देर के ही लिए ,
हम अजनबी बन जायें।
                  

Friday, July 25, 2014

नव क्रान्ति चाहिए





कैसी हवा चली यहाँ इस देश में हे राम ,                                                       
हर आदमी है हो रहा कामुकता का गुलाम  ।                                          
अपनी ही माँ -बहनों के अस्मत को लूटता
कर कलंकित देश को यह कर रहा बदनाम।

हर तरफ है  चीख बस मासूम कलियों  का ,                                                           
हर तरफ आक्रोश है इस नीच कृत्य का।
हैवानियत भी शर्मसार है ये देख कर ,
आँखों से बह रहा लहू पतन यह देख कर।

है नहीं रोना तुम्हें , संकल्प तुम करो ,
आँख में आँसू नहीं अंगार को भरो ,
हाथों में चूड़ियाँ नहीं तलवार को धरो ,
अस्मत के लुटेरों पर प्रहार तुम करो।

जब तक न तेरी चूड़ियाँ कटार बनेंगी  ,
जब तक न अश्रुधार ये अंगार बनेगी ,
जब तक न तेरी आहें ज्वालायें बनेंगी ,
तब तक नहीं इस  जुल्म की दीवार ढहेगी।

समाज को नई दिशा , नव क्रान्ति चाहिए ,
उन्नत समाज के लिए जन क्रान्ति चाहिए ,
अकलुष और स्वच्छ एक समाज चाहिए ,
दृढ़ शक्ति के संकल्प का समाज चाहिए।

पंगु नहीं , न मूक ,जाग्रत राष्ट्र चाहिए,
नव राष्ट्र के निर्माण को नव क्रान्ति चाहिए ,
फौलादी से विचार और आचार चाहिए ,
क्रान्ति , क्रान्ति , क्रान्ति , क्रान्ति , क्रान्ति चाहिए।


फ़रिश्तों तुम जरा ठहरो


फ़रिश्तों तुम जरा ठहरो ,
मेरा कुछ काम बांकी है.…
जरा उनसे तो कर लूँ प्यार ,
मेरा कुछ काम बांकी है.....

होंगी हूर औ परियाँ ,
मुझे मालूम ज़न्नत में ,
यहाँ है सामने मेरे वो
जीनत  प्यार तो कर लूँ  ....

है जाना छोड़ कर दुनियाँ
मुकम्मल है पता मुझको ,
मगर यह दुनियाँ भी मेरी ,
किसी ज़न्नत से कम न है ,
जरा  मैं अपनी ज़न्नत को ,
नजर भर प्यार तो कर लूँ  .....

फ़रिश्तों तुम जरा ठहरो  …

Monday, July 21, 2014

प्यार प्रकृति है ,प्यार ही ईश्वर

        

सब कहते हैं तिनका-तिनका जोड़-जोड़ घर बनता है ,
मैं कहता हूँ प्यार-प्यार को जोड़-जोड़ घर बनता है।
प्यार नहीं तो शीशमहल भी तिनके जैसा लगता है ,
जहाँ प्यार है , रूखा भोजन भी अमृत सा लगता है।
प्यार ही है जो काँटों पर भी फूल सदा मुस्काता है ,
प्यार नहीं हो जीवन में तो जीना दूभर लगता है।
प्यार प्रकृति है ,प्यार ही ईश्वर ,प्यार का ही सब नाता है ,
प्रेम सने रस पागल बादल , नभ से जल बरसाता है।



Saturday, July 19, 2014

सुहाना सावनी मौसम


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है बरसात का मौसम, चलो मिल घूम आयें हम ,                              
बारिस के मौसम में ,चलो मिल भींग आयें हम।
घटा को देख कर मेरा मयूरी मन बहकता है ,
कहता भींग लें कुछ देर , मेरा मन चहकता है।
अजब बरसात का मौसम है ये,मन को सुहाता है ,
पवन भी झूम कर चलता सदा इतराता बहता है।
बरसती बूँद है जब भी , सुनाती गीत सरगम सी ,
बदन पर पड़ती बूँदों से , उठती दिल में सिहरन सी।
फिसलती बूँद जब छू कर , तुम्हारे गोरे  गालों को ,
दमक कर दामिनी भी चूमती तेरे कपोलों को।
बरसता जब भी है सावन ,धरा भी तृप्त हो जाती ,
हो कर तृप्त यह धरणी , छटा है अपनी दिखलाती।
छा जाती हरियाली यहाँ , चारों दिशाओं में ,
संदेश है बरसात का लिखा घटाओं में।
कहीं झनकार झींगुर का , कहीं पर शोर दादुर का ,
कहीं पर चातकी की चहक भी देती सुनाई  है।
कहीं पर नाचता है मोर , कहीं पर मोरनी की कूक ,
तन में आग लगती है , दिल में उठती मीठी हूक।
चलो फिर आज हम मिल कर बना लें नाव कागद के ,
गुजारे पल जो बचपन में , उन्हें फिर आज दुहरा लें।
सुहाना सावनी मौसम , है ये श्रृंगार का मौसम ,
झूलों का मौसम है , है यह मेहँदी  का भी मौसम।
आओ तुम्हारे हाथ पर , मेहँदी रचा दें हम ,
आ जाओ बाँहों में , तुम्हें झूला झुला दें हम।
जो बूढ़ी हो गईं यादें , उन्हें फिर से नया कर लें ,
बिसरी हुई गीतों को फिर से आज हम गा  लें।

Friday, July 18, 2014

पत्थर-पत्थर, भगवान।


संत उन्हें ही जानिये , पर-दुःख जिन्हें सताय ,
करै भेद इंसान में , कैसे संत कहाय। 
जीव ईश का अंश है , है गीता का ज्ञान ,
मुझ में तुझ में ईश है , पत्थर-पत्थर , भगवान।
ना मंदिर , मस्जिद गए ,न गुरुद्वारा न चर्च ,
इन्सां धर्म निभाईये , लागे ना कोई खर्च।
कोई पूजै पोथी को , कोई पूजै पहाड़ ,
जिसकी जैसी आस्था ,करें क्यों तिल का ताड़।
जित देखा तित पाईयाँ , गुरु , ईश , अल्लाह ,
एक साथ तीनों खड़े , वाह ! वाह ! वल्लाह।



Friday, June 27, 2014

जो चला अकेला


मन में उठते तूफानों को ,
बाँध गगन उड़ जाना है ,
भर साहस अपने बाजू में  ,
नभ में तुमको छा जाना है।

इस धूप-छाँव की दुनियाँ में ,
सुख-दुःख साथ निभाना है ,
जीवन  के अनमोल सफर में,
मिलना और बिछड़ना  है।
मन के द्वन्द्वों को छोड़ निकल ,
तुम को मीलों चलना है ,
जो चला अकेला,वही चला ,
मंजिल पार पहुँचना है।
तू माँझी है ,जग सागर है ,
सागर लाँघ निकलना  है ,
क़श्ती है तुम्हारा मन केवल ,
क़श्ती पार ले जाना है।
 

Sunday, June 22, 2014

वतन के वास्ते


एक  पत्थर तो  हवा में उछाल कर देखो ,
कहर बन कर,दुश्मन पर बरस कर देखो ,
हो नाम शहीदों में तुम्हारा भी  कहीं ,
चमन के वास्ते , सिर पर कफ़न बाँध कर देखो।

आजादी के शोलों को जला कर रखो ,
दुश्मन से गुलिस्तां को बचा कर रखो ,
कोई नापाक निगाहें न वतन पर उठे ,
अपनी आँखों में चिंगारी सजा कर रखो।

वतन के वास्ते ,जीने का फ़न सीख लो ,
कुर्बानी का जज्वये हुनर तो सीख लो ,
दे देंगे जां ,तिरंगा न झुकने देंगे ,
अपने कलम को तलवार बनाना तो सीख लो।

नागफनी उग आया है





नागफनी  उग आया  है
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तमाम उम्र समझते रहे हम,
रिश्तों के समीकरण ,
देखता हूँ अब इनका भी
हो गया है भौतिकिकरण।
खो गई है लावण्यता ,
हर चेहरा मुरझाया है ,
यह सच है कि  फूल कोई 
असमय ही कुम्हलाया है
"रिश्तों का अनुबंध"
अर्थ " पर टिक गया है,
" अर्थ " बिना हर रिश्ता ,
अर्थहीन हो गया है।
गैर  से दीखते हैं ,अब ,
सब ,अपने भी पराये,
लगता है  रिश्तों में ,
नागफ़नी  उग आया है। 

Friday, June 20, 2014

दीप-शिखा

 ( प्रस्तुत कविता श्री जसजीत सिंह , वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक ,उत्तर रेलवे ,मुरादाबाद के दिनांक 14 -07 -1988 को ,देहरादून स्टेशन पर प्रथम आगमन के अवसर पर स्वागत -सम्मान समारोह में मैंने पढ़ कर सुनाया तथा इसकी एक प्रति उन्हें भेंट किया )




तुम तरुवर ,हम भटके राही ,
तुम सरवर ,हम प्यासे राही  ,
तुम ज्योतिर्मय दीप-शिखा हो ,
आशा की किरणों को लेकर ,
जगमग-जगमग दीप जलाओ ,
दिशाहीन भटके राही को ,
आशा की एक राह दिखाओ ,
और ,
निराशा के सागर में ,
उतराते जो ,
कर गह कर ,
तुम उन्हें उबारो।
तुम हो एक कुसुम इस तट के ,
हम पंछी इस सागर तट के ,
कुसुम गंध को फैलाओ तुम ,
कुसुम गंध को फैलाएं हम ,
आओ मिल कर मोद मनायें ,
आओ गीत मिलन के गायें ,
जीवन को खुशियों से भर दें ,
जीवन को महकाते जायें।

तुम्हें " देवता " बना देगा …

यह बात कितनी सच है-
जो पैरों पर गिरता है
उसे ठोकर मार दिया जाता है ,
जैसे -धूल और राह का पत्थर ....
यही बात इन्सानों के साथ भी है ,
फर्क केवल इतना है, कि
धूल या पत्थर टूटते नहीं ,
इंसान यानी आदमी टूट जाता है ....
यह बात भी कितनी सच है, कि
सितारों के टूटने की आवाज नहीं होती है ,
ठीक उसी तरह ,
आदमी के भी टूटने की आवाज नहीं होती है ,
पर आदमी टूट जाता है ,
जिन्दा रह कर भी ,
जिन्दा लाश बन कर रह जाता है... ..
आदमी होकर ,
आदमी को ठोकर तो मत लगाओ ,
इन्हें पत्थर नहीं ,आदमी बनाओ।
माना , तुम देवता नहीं बन सकते हो ,
रहनुमा तो बन सकते हो !
और ,
आदमी को आदमी तो बना सकते हो !
कौन जाने ,कौन कितना थका -हारा है  ?
और ,
चुपचाप लब सिले बैठा है ?
उसकी  "थकन "और "हार "का
अंदाजा तो लगाओ ,
"सच "को जो जान पाओगे
"प्यार " का अहसास ,और
"भलाई " का मंत्र ,
तुम्हें " देवता " बना देगा  …

(  यह कविता देहरादून स्टेशन पर श्री राम प्यारे ,वरिष्ठ मंडल प्रबंधक ,उत्तर रेलवे के विदाई समारोह के आयोजन पर श्री  जसजीत सिंह , वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक ,उत्तर रेलवे ,मुरादाबाद के दिनांक 14 -07 -88 को ,उनके प्रथम आगमन पर मैंने भेंट किया )

Tuesday, June 17, 2014

पागल


जाड़े की एक रात
एक पागल , फटेहाल
घूमता रहा रात भर
सड़क पर ,
शायद वह भूखा था,
वह एक होटल के सामने रुका ,
फिर दूसरे ,
फिर तीसरे ,

अंदर होटल में लोग
नोच - नोच कर बोटियाँ खा रहेथे
और वह बाहर खड़ा
एक रोटी को तरसता  रहा ..........
किसी ने उसे तवज्जो नहीं दी ,
लोगों ने उसे  दुत्कार दिया  -
कहा -पागल है।
वह चल पड़ा ,
एक आवारा कुत्ता
उस पर भौंका ,
पागल चलता रहा ,
कुत्ते ने पागल को पास से सूंघा
फिर वह
पागल के साथ - साथ चल दिया ,
पागल ने कुत्ते को देखा
कुत्ते ने पागल को ,
जहां-जहां पागल गया
वहाँ-वहाँ कुत्ता गया .........
पागल एक कूड़े के ढेर  के पास रुका
कुत्ता भी रुक गया ,
दोनो, फिर कूड़े के ढेर  में
कुछ ढूंढने लगे ...........
अल सुबह
लोगों ने देखा
वह पागल कूड़े के ढेर  के पास
मृत पड़ा है
और
एक कुत्ता
उसके मृत शरीर से सट कर
उदास बैठा है .........

Tuesday, June 10, 2014

माँ




माँ तो माँ होती है ,
बच्चों की जां होती है ,
हो चाहे कितनी भी विपदा ,
माँ पहाड़ होती है ,
माँ तो माँ होती है।

ऊपर से कठोर दिखती है ,
दिल में ममता होती है ,
खुद झेलती है विपत ,
बच्चों को सुख देती है ,
माँ तो माँ होती है।

तुम पुकारो ईश को ,
माँ पहले आ जाती है ,
माँ नाम है ईश का ,
माँ तो पूरा जहान होती है ,
माँ तो माँ होती है।