Saturday, June 4, 2022

समन्दर की चीख

दिल के ज़ख्मों को
हम क्या गिनायें ,
एक हो तो कुछ बतायें ,
अपनों और गैरों ने ही नहीं ,
हवाओं ने भी
कुछ कम ज़ुल्म नहीं ढाये।
समन्दर चीखता रहा ,
लोग आनन्द उठाते रहे ,
किसी की चीख भी ,
किसी के लिये
आनन्द का पर्याय बन जाये !
इस दुनिया के भी
अजब तमाशे हैं ,
गिद्धों ने ययह बात , हमें
तरीके से समझाये   .....
-विजय कुमार सिन्हा " तरुण "

बारिस का कहर

आज फिर हवाओं ने
आसमान में साजिस की ,
बादलों ने जमकर उत्पात मचाया ,
कहर ढाती बारिस में ,
आज, फिर ,
एक पेड़ धराशायी हो गया ,
यानि कि
मौत की नींद सो गया ,
परिंदों का आशियाना उजड़ गया ।
टूटे ,झुके, डालों पर ,
बैठी है चिड़िया ,गुमसुम , उदास ।
नये ठिकाने की तलाश
फिर से करनी होगी ,
फिर ,
एक नया आशियाना बनाना होगा।
पागल हवाओं को कैसे बतायें , कि
एक घरौंदा बनाने में ,
कितनी परेशानियाँ आती हैं , उफ़ .... 
तमाम उम्र खप जाती है
तिनका - तिनका जोड़ने में। 

---विजय कुमार सिन्हा " तरुण "

प्रकाशित - नवम्बर -2022 ( हलन्त )

Thursday, October 28, 2021

मेरा प्यार नहीं बदलेगा

ये मौसम बदल जायेगा , ये ऋतुएँ बदल जायेंगी ,

ये दिन , सप्ताह , महीना सब बदल जायेगा ,

सुनो , तुम गौर से सुनो , मेरा प्यार नहीं बदलेगा। 

मैं सूरज हूँ , हाँ सूरज ,

तुम्हारी ठंढी हथेली पर ,

अपने गरम हथेली रख ,

तुम्हे प्यार का अहसास कराऊंगा।

मैं मौसम नहीं , जो बदल जाऊंगा ,

वक़्त बदल सकता है , बदल जायेगा ,

पर मेरा प्यार नहीं बदलेगा। 

हाँ , वक़्त के क्षुद्र बादल ,

मुझे कुछ देर के लिये ,

ढँक तो सकते हैं ,

पर तिरोहित नहीं कर सकते। 

यह क्षुद्र बादल ,

मेरे तपिश में पिघल जायेगा ,

पर , मैं सच कहता हूँ ,

मेरा प्यार नहीं बदलेगा ,

नदी समन्दर बन सकती है ,

समन्दर नदी बन सकता है , 

सहरा में सैलाब बन सकता है ,

ये तारे टूट कर गिर सकते हैं ,

हवा प्रलय मचाती है  मचा लेगा ,

पर मेरा प्यार नहीं बदलेगा। 

रचना तिथि- 15 -04 - 21

किसने नाव डुबोई

लहर -लहर नदिया की लहरें ,

पूछ रहीं हर कोर-कोर से ,

होकर अति बेचैन ,

नाव किसने है डुबोई  ?

नाविक था मगरूर ,

नशे में था वह चूर ,

आंधी आई , तूफां आया ,

फिर भी वह तो चेत न पाया।

था उसको बहुत गुरूर , 

था मस्ती में भरपूर ,

जा बैठा मस्तूल के ऊपर ,

नाव गई वह डूब।

आंधी ने नहीं ,तूफां ने नहीं ,

ना लहरें , ना नदिया ,

था जिनके हाथों पतवार ,

नाव उसने ही डुबोई। 

रचना तिथि - 07 -05 - 2021 


Saturday, June 19, 2021

प्यार बाँटिये

बाँटना ही है अगर , तो प्यार बाँटिये ,
नफ़रतों की आग , हरगिज न बाँटिये।
यह आग है ,बस आग , करती न कोई फ़र्क़ ,
इस आग से मोहतरम , अपना घर बचाइये।
हम सब ही जल जायेंगे , कोई ना बचेगा ,
दिल में है गर जगह ,मुहब्बत सजाइये।
पास होकर भी हैं हमसब , दूर दूजे से ,
कर रहा मौसम इशारा , इसको जानिये।
घर कीजिये रौशन , अपना प्यार बाँट कर ,
हो सके , तो , प्यार का दीपक जलाइये।
-विजय कुमार सिन्हा "तरुण "
रचना तिथि :- 06 - 05 - 2021

Thursday, June 10, 2021

ये बचपन लौट कर नहीं आता

 ले लो न साहब , एक गुब्बारा-
गुब्बारे बेचने वाले ने कहा ,
पिता के साथ चलता बच्चा
मचल पड़ा ,
पापा , गुब्बारे ले दो न  ....
नहीं - मँहगे हैं ,
नहीं साहब , मँहगा नहीं है साहब ,
बस ,पाँच रुपये के ही तो हैं ,
पाँच रुपये ,
पाँच रुपये में क्या होता है साहब !
 एक रोटी की कीमत ,
बच्चा फिर मचला -
पापा ले दो न ,
बच्चे का पिता आगे बढ़ गया ,
बच्चा मायूस हो गया।
यका - यक गुब्बारे वाला
सामने आ गया ,
बच्चे के हाथ में
एक गुब्बारा देते हुए बोला-
साहब मत देना पैसे ,
रोटी कहीं और खा लेंगे ,
बच्चे का दिल ना तोड़ेंगे ,
एक गुब्बारे लेकर
इसकी आँखों में
ख़ुशी की जो चमक दिखेगी ,
वह इस पाँच रुपये के गुब्बारे से
कहीं बहुत बड़ी है साहब ,
यह दुनिया की सब से बड़ी ,
अनमोल दौलत है ,ये बचपन
लौट कर नहीं आता साहब ,
ये बचपन लौट कर नहीं आता   ......... 

रचना तिथि :- 07-06-2021

 


Thursday, June 3, 2021

रोटी

रोटी कब सस्ती हुई ?
रोटी कल्ह भी मँहगी थी ,
रोटी  आज भी मँहगी है ,
सब काम -धंधा मंद  ,
मेहनत - मजूरी बन्द ,
जो चार पैसे कमा लाते थे ,
सब बन्द  ,
ऐसे में रोटी हाथ से
बहुत दूर चली जाती है , 
रोटी , गोल - गोल रोटी ,
लहक कर कभी चाँद बन जाती ,
कभी सूरज बन जाती ,
कभी सितारों में  टाँक दी जाती ,
हाथ से दूर , बहुत दूर चली जाती   .......
माँ बच्चे से कहती -
सो जा मेरे लाल , सो जा ,
चाँद तोड़ लाने की जिद्द ,
बच्चे माँ से करते ,
ला दो न माँ ,
तोड़ कर चाँद ,
खा लेंगे रोटी !
माँ  क्या बताये !
कहती , सो जा मेरे लाल ,
रात चाँद आयेगा ,
तुम्हारे सपनों में ,
तुम्हे रोटी दे जायेगा ,
बच्चा , फिर एक बार मचलता ,
फिर सो जाता .......
माँ सोचती ,
सबको रोटी मिलेगी ,
आश्वासन तो मिला ,
रोटी नहीं मिली ,
जो कुछ मिला ,
वह नून भर भी तो  नहीं था ,
वह भी बहुत दिन  हो गये ,
इसी खयाल में रात  बीत गई ,
सुबह देर  तक सोई रही ,
जब आँख खुली ,
बाहर डुगडुगी पिट रही थी ,
आज कैम्प में ,
रोटी बाँटी जायेगी ,
जिसे चाहिये , आ जाना ,                                   
उसने पलट कर देखा -
बच्चा सो रहा था ,
निश्छल , निश्चल ,
उसने बच्चे को हिलाया ,
पर ,यह क्या !
वह सन्न रह गई ,
बच्चा रोटी के लिये
चाँद पर चला गया ,
सितारों  के बीच  चला गया ,
सूरज  के पास चला गया ,
नहीं , अब लौट कर नहीं आयेगा ,
यों ही डुगडुगी पिटती रहेगी ,
यों ही ,
रोटी पर खेल होता रहेगा ,
हर काल में ,
यों ही ,
रोटी लुढ़क कर
चाँद पर चली जायेगी ...... 
रोटी कब सस्ती हुई ?
रोटी , कल्ह भी मँहगी थी ,
रोटी आज भी मँहगी है     .........
रोटी आज भी मँहगी है  .......   
रोटी ! रोटी ! रोटी !

रचना तिथि - 12.04.2021

 

Sunday, March 28, 2021

फागुन का उपहार

आया है रस -रंग ले , होली का त्यौहार ,

विविध रंगों का मेल है ,फागुन का उपहार ,

प्रीत और अनुराग का , बरसै आज फुहार ,

रंग प्यार का घोल कर , करें आज बौछार ,

ऐसो रंग को डारियो , खुशियां मिले हजार।  

विजय कुमार सिन्हा " तरुण "

Thursday, February 25, 2021

लो वसंत आ गया पथिक रे !

 

 

 

 

 

 

 


 

लो वसंत आ गया पथिक रे !

फूलों पर आई मादकता ,

पर्ण छाँव में बैठ पपीहा ,

पिहूपिहू की टेर लगाता।

सरसों फूले ,तीसी फूले ,

बाँज-बुरांस जंगल दहकाता ,

लहर-लहर  नदियाँ जब बहती ,

कूल -कूल यौवन लहराता।

शुक ,पिक ,खग , खंजन औ बुलबुल,

मिल कर सारे शोर मचाते ,

फूल - फूल भौंरा मंडराये ,

जब -जब, यह वसंत है आता। 

लो वसंत आ गया पथिक रे ,

मधुकर यह देता संदेशा। 


Monday, January 11, 2021

कमेंट्स

धन्यवाद    रोचक    अच्छी रचना   बधाई    आपका आशीर्वाद हमारे साथ 

कमेंट्स     अच्छी कहानी  बहुत सुन्दर ,    बहुत खूब

बूढी हो गई आँखें , अतीत के पन्नों में खोई ,               

कहाँ छूटा , कहाँ खोया ,इसी यादों में है खोई।            आहा ! क्या बात है 

शादी की सालगिरह की बहुत - बहुत शुभकामनायें। सदैव स्वस्थ और सुखी रहें 

जन्म दिन की बहुत -बहुत बधाई एवं शुभकामनायें

अजब हैं लोग ,

पेड़ों को काट कर  " हवा "  ढूंढ़ते हैं ,                                       विजय कुमार सिन्हा " तरुण "

मिटा कर सूरज ,

" सवेरा "  ढूंढ़ते है। 

 हम तो चले परदेश 

भले ही हम आप से दूर बहुत रहते हैं ,

भूले नहीं हैं , हम , रोज याद करते हैं। 

आपकी नज़्मों को हम रोज पढ़ा करते हैं ,

इनमें सेझाँकती छवि आपकी देख लेते हैं।



Friday, October 30, 2020

नयनों की नयनों से

नयनों की नयनों से ही  ,
ना ,जाने क्या -क्या बात हुई ,
कसमस -कसमस दिन बीता ,
साँझ ढली , फिर रात हुई।

चाँद छुपा जा अंक गगन के ,
तारों की बरात सजी ,
अधरों के आमंत्रण पर ,
अधरें भी रक्ताभ हुईं।

साँसों का था मिलन एक बस ,
चुपके -चुपके रात हँसी ,
महक उठा तब अंग -अंग ,
अमृत की बरसात हुई। 

खोई थी मादक सपनों में 
अनायास ही आँख खुली ,
कोयल की कूकों से जब ,
स्वर्णिम सी एक भोर हुई ।

अलसाई आँखों ने कर दी ,
चुगली बीते रात की ,
पायलिया ने खोल दिए सब ,
राज प्यार के बात की।

Thursday, October 15, 2020

सात समन्दर पार

आँखों में ये कतरा है , 

या कोई यह दरिया है ,

या सागर ही उमड़ा है ,

ओह !सात समन्दर पार ,

बेटा मेरा रहता है। 

दिनांक - 10 -10 - 2020 

Sunday, September 20, 2020

, माँ जैसी ही लगती है

जब भी वह मुझ से मिलती है ,

वह बड़े प्यार से मिलती है ,

उसकी वाणी तो सच मुझको ,

मीठी मिश्री सी लगती है। 

वह वृद्धा मुझको तो , मेरी ,

हाँ  ,माँ जैसी ही लगती है। 

आँखों में प्यार का भाव भरा ,

चेहरे पर झुर्री सजी हुई ,

रख दे गर  सिर  पर हाथ जो वो ,

आशीष की बारिस करती है। 

वह वृद्धा मुझको तो  मेरी ,

हाँ , माँ जैसी ही लगती है। 

मैं जब भी नत हो जाता हूँ ,

पावन चरणों को छूने को ,

वो , बाँहें पकड़ उठाती है ,

वह अपने गले लगाती है। 

वह वृद्ध मुझको तो , सच ही ,

हाँ , माँ जैसी ही लगती है। 

मैं धन्य - धन्य हो जाता हूँ ,

उस क्षण सुख स्वर्ग का पाता हूँ ,

आँखों से झड़ते हैंआँसू ,

बेटा कह मुझे बुलाती है। 

वह वृद्धा मुझ को तो सच ही ,

हाँ , माँ जैसी ही लगती है। 

हो सिर पर जिसके हाथ सदा ,

माँ के स्नेहिल करकमलों का ,

दुःख - दर्दों की ही कौन कहे ,

मौत लौट कर जाती है। 

वह वृद्धा मुझको तो , सच ही ,

हाँ , माँ जैसी ही लगती है। 

रचना तिथि -- 13 09 -2020

 

Tuesday, September 8, 2020

बस एक तेरा नूर

 बहुत गुजर गया है ,

चन्द रोज और गुजर जायेंगे ,

हम तो वो दरख़्त हैं , जो 

कुछ न कुछ देकर ही जायेंगे। 

ज़माने ने दिया है ,

मुझको बहुत कुछ ,

प्यार , मोहब्बत ,इश्क और अखलाक़ ,

सब कुछ तुमको ही नज़र कर जायेँगे। 

किसी से क्या शिक़वा , क्या गिला ,

सब यहीं छोड़ जायेंगे ,

तुम्हारी यादों के सिवा ,

कुछ और ना ले जायेंगे। 

ये मकां , ये असबाब , ये साजो - सामां ,

सब यहीं रह जायेँगे ,

बस एक तेरा नूर  , तेरी मुस्कुराहट ,

जनम - जनम याद आयेंगे। 

( रचना तिथि : - 03 - 09 - 2020 )

Thursday, August 27, 2020

( 1 ) साजिस और ( 2 ) मेरा मन

( 1  )      साजिस
बूढ़े बरगद और पीपल के पेड़
यूँ ही धरासायी नहीं हुए होंगे ,
जरूर आसमां के                
नक्षत्रों ने मसविरा किया होगा ,
रचे होंगे साजिस ,
वरना आँधियों की क्या बिसात।

( 2  )  मेरा मन
मन ,मन भर का भारी हो गया ,
मेरा मन ,
मन ही मन में मेरे मन से ,
दूर हो गया मेरा मन ,
मन की मन से बात हुई थी ,
मन ही मन ,
मन की मन की बात रह गई ,
मन ही मन ,
मन ही मन में हुआ उदास ,
यह मेरा मन।
 मन कुछ कहता , मन कुछ सुनता ,
सुन कर भी अनसुनी करता ,
मन ही मन में मन सोचता ,
कैसा है यह मेरा मन ?

Tuesday, August 4, 2020

रेशम का दुपट्टा

बारिस का है मौसम,
यूँ निकला ना करो ,
ज़माना है खराब ,
जमाने से डरो।
मौसम का क्या भरोसा ,
कभी ये भी मचल जायेगा ,
झूम कर नाचेगा ,
बहक जायेगा।
भींगा ना करो तुम कभी बूंदों में ,
 रेशम का दुपट्टा है लिपट जायेगा।
जुल्फों से टपकता हुआ ,
बरसात का पानी ,
चूमेगा तन - वदन ,
वो बन के शराबी।
नाजुक तेरा बदन है ,
लग जायेगी नजर ,
निकली हो तुम बरसात में ,
सब को है ये खबर।
रहना ना इत्मीनान ,
अपनों से भी कभी ,
देते हैं बड़ा ज़ख्म ,
अपने भी हैं कभी।

Wednesday, July 15, 2020

ओ मनुज तू धीर धर

ओ मनुज तू धीर धर ,
ना हो विकल , न हो विकल।
आँधियों का जोर है ,
तूफ़ान का ये शोर है ,
पल में गुजर यह जायेगा ,
कहर भी थम जायेगा ,
कुछ भी नहीं तो नित्य है ,
सब कुछ यहाँ अनित्य है ,
जो आज है , ना होगा कल ,
पल ,पल बदलता है ये पल ,
ओ मनुज तू धीर धर ,
ना हो विकल ,ना हो विकल।

स्याह जितनी रात हो ,
आघात पर आघात हो ,
मिट जाता होते प्रात ही ,
आघात भी होगा विफल ,
ओ  मनुज तू धीर धर ,
ना हो विकल , ना हो विकल।

Sunday, June 14, 2020

कोरोना

हर तरफ भय का माहौल है ,
हर आदमी अपने आप में सहमा है ,
पसरा है हर तरफ ख़ौफ़ का मंजर ,
कोरोना लेकर आया है एक नया मंजर ,
इसने लोगों को घरों में दुबकाया है ,
सबके नाक-मुँह पर पट्टी बंधवाया है ,
हमें एक दूजे से दूर कराया है ,
तिरोहित हो गई अधरों की मुस्कान ,
अब अधरों पर सन्नाटा छाया है।
एक नए युग की शुरुआत हो गई है ,
ऐसा लगता है , हम सब अब ,
तीसरे लोक   के प्राणी हो गए हैं ,
लेकिन , सच तो यह है , कि
हम सब आदिकाल के
पूर्वजों के रूप में आ गए हैं।

Sunday, June 7, 2020

आरज़ू

सोचता हूँ ,
जब भी तेरा दम निकले , मेरी बाहों में निकले ,
मेरे अरमान , मेरा प्यार , तेरे संग ही हो ले ,
ऐ ख़ुदा ! मेरी ये आरज़ू पूरी कर दे ,
मेरे प्यार को फिर से दुल्हन तो  बना दे।
मेरी हसरत है ,
मैं एक बार फिर तेरे माँग में सिन्दूर सजाऊँ ,
तेरे हाथों की हथेली में , मेंहदी तो रचाऊँ ,
तेरे पैरों को महावर के रंगों से सजा कर ,
तुझे रुख़सत करूँ पीहर , डोली में बिठा कर कर।

एक दीया जला रहा हूँ

एक पागल एक क़ब्र  पर लिख आया-
एक तुम ही तो थी , जो
मुझे तंग करती थी ,
अब , जब तुम नहीं हो , तो
मैं कुछ भी नहीं हूँ।

तुम्हे रोशनी पसंद नहीं थी ,
मुझे अँधेरा पसंद नहीं था ,
इसलिये तुम्हारी क़ब्र  पर ,
एक दीया जला रहा हूँ ,
ताकि , तुम्हें अहसास हो , कि
मैं अब भी तुम्हारे पास हूँ।