वह अबोध,
थक - हार कर,
निराश हो कर ,
माँ का इन्तजार करते -करते ,
दादी की गोद में सो जाता है ,
वह , एक डॉक्टर माँ का बेटा है।
वह, महज तीन साल का है ,
पर उसे बोध है ,कि ,
उसकी माँ
एक बड़े हॉस्पिटल में डॉक्टर है ,
दूसरों की होठों पर
मुस्कान लाने के वास्ते ,
अपने , दुधमुँहे बच्चे को
घर पर छोड़ आती है।
बच्चा तो बच्चा ही है ,
उसे दादी की जरूरत है ,
पर ,
माँ की भी जरूरत है ........
रचना तिथि :- 23 -05 -2022
Wednesday, August 17, 2022
डॉक्टर माँ का बेटा
Wednesday, July 27, 2022
आज के इन्सान को क्या हो गया
ज़ुल्म की,हर हदों को लांघता,
आज के इन्सान को क्या हो गया ,
ईश ने तो,था बनाया आदमी ,
आदमी हैवान क्यों कर बन गया।
हो गई है चूक किस मुक़ाम पर,
इन्सानियत का खून क्यों कर हो गया ,
खून,काटो तन , तो सब का लाल है ,
क्या हुआ , जो आज विषधर हो गया।
जो यहाँ आया है , वह तो जायेगा
किस भ्रम में ,आदमी है खो गया।
-- विजय कुमार सिन्हा "तरुण"
सोचा ना था
जिन्दगी कभी इतनी बेबस हो जायेगी ,
सोचा ना था ,
धरती के स्वयंभू भगवान् भी सो जायेंगे ,
सोचा ना था ,
बाड़ ही खेत को खा जायेगा ,
सोचा ना था।
Saturday, June 4, 2022
समन्दर की चीख
दिल के ज़ख्मों को
हम क्या गिनायें ,
एक हो तो कुछ बतायें ,
अपनों और गैरों ने ही नहीं ,
हवाओं ने भी
कुछ कम ज़ुल्म नहीं ढाये।
समन्दर चीखता रहा ,
लोग आनन्द उठाते रहे ,
किसी की चीख भी ,
किसी के लिये
आनन्द का पर्याय बन जाये !
इस दुनिया के भी
अजब तमाशे हैं ,
गिद्धों ने ययह बात , हमें
तरीके से समझाये .....
-विजय कुमार सिन्हा " तरुण "
बारिस का कहर
आज फिर हवाओं ने
आसमान में साजिस की ,
बादलों ने जमकर उत्पात मचाया ,
कहर ढाती बारिस में ,
आज, फिर ,
एक पेड़ धराशायी हो गया ,
यानि कि
मौत की नींद सो गया ,
परिंदों का आशियाना उजड़ गया ।
टूटे ,झुके, डालों पर ,
बैठी है चिड़िया ,गुमसुम , उदास ।
नये ठिकाने की तलाश
फिर से करनी होगी ,
फिर ,
एक नया आशियाना बनाना होगा।
पागल हवाओं को कैसे बतायें , कि
एक घरौंदा बनाने में ,
कितनी परेशानियाँ आती हैं , उफ़ ....
तमाम उम्र खप जाती है
तिनका - तिनका जोड़ने में।
---विजय कुमार सिन्हा " तरुण "
प्रकाशित - नवम्बर -2022 ( हलन्त )
Thursday, October 28, 2021
मेरा प्यार नहीं बदलेगा
ये मौसम बदल जायेगा , ये ऋतुएँ बदल जायेंगी ,
ये दिन , सप्ताह , महीना सब बदल जायेगा ,
सुनो , तुम गौर से सुनो , मेरा प्यार नहीं बदलेगा।
मैं सूरज हूँ , हाँ सूरज ,
तुम्हारी ठंढी हथेली पर ,
अपने गरम हथेली रख ,
तुम्हे प्यार का अहसास कराऊंगा।
मैं मौसम नहीं , जो बदल जाऊंगा ,
वक़्त बदल सकता है , बदल जायेगा ,
पर मेरा प्यार नहीं बदलेगा।
हाँ , वक़्त के क्षुद्र बादल ,
मुझे कुछ देर के लिये ,
ढँक तो सकते हैं ,
पर तिरोहित नहीं कर सकते।
यह क्षुद्र बादल ,
मेरे तपिश में पिघल जायेगा ,
पर , मैं सच कहता हूँ ,
मेरा प्यार नहीं बदलेगा ,
नदी समन्दर बन सकती है ,
समन्दर नदी बन सकता है ,
सहरा में सैलाब बन सकता है ,
ये तारे टूट कर गिर सकते हैं ,
हवा प्रलय मचाती है मचा लेगा ,
पर मेरा प्यार नहीं बदलेगा।
रचना तिथि- 15 -04 - 21
किसने नाव डुबोई
लहर -लहर नदिया की लहरें ,
पूछ रहीं हर कोर-कोर से ,
होकर अति बेचैन ,
नाव किसने है डुबोई ?
नाविक था मगरूर ,
नशे में था वह चूर ,
आंधी आई , तूफां आया ,
फिर भी वह तो चेत न पाया।
था उसको बहुत गुरूर ,
था मस्ती में भरपूर ,
जा बैठा मस्तूल के ऊपर ,
नाव गई वह डूब।
आंधी ने नहीं ,तूफां ने नहीं ,
ना लहरें , ना नदिया ,
था जिनके हाथों पतवार ,
नाव उसने ही डुबोई।
रचना तिथि - 07 -05 - 2021
Saturday, June 19, 2021
प्यार बाँटिये
बाँटना ही है अगर , तो प्यार बाँटिये ,
नफ़रतों की आग , हरगिज न बाँटिये।
यह आग है ,बस आग , करती न कोई फ़र्क़ ,
इस आग से मोहतरम , अपना घर बचाइये।
हम सब ही जल जायेंगे , कोई ना बचेगा ,
दिल में है गर जगह ,मुहब्बत सजाइये।
पास होकर भी हैं हमसब , दूर दूजे से ,
कर रहा मौसम इशारा , इसको जानिये।
घर कीजिये रौशन , अपना प्यार बाँट कर ,
हो सके , तो , प्यार का दीपक जलाइये।
-विजय कुमार सिन्हा "तरुण "
रचना तिथि :- 06 - 05 - 2021
Thursday, June 10, 2021
ये बचपन लौट कर नहीं आता
ले लो न साहब , एक गुब्बारा-
गुब्बारे बेचने वाले ने कहा ,
पिता के साथ चलता बच्चा
मचल पड़ा ,
पापा , गुब्बारे ले दो न ....
नहीं - मँहगे हैं ,
नहीं साहब , मँहगा नहीं है साहब ,
बस ,पाँच रुपये के ही तो हैं ,
पाँच रुपये ,
पाँच रुपये में क्या होता है साहब !
एक रोटी की कीमत ,
बच्चा फिर मचला -
पापा ले दो न ,
बच्चे का पिता आगे बढ़ गया ,
बच्चा मायूस हो गया।
यका - यक गुब्बारे वाला
सामने आ गया ,
बच्चे के हाथ में
एक गुब्बारा देते हुए बोला-
साहब मत देना पैसे ,
रोटी कहीं और खा लेंगे ,
बच्चे का दिल ना तोड़ेंगे ,
एक गुब्बारे लेकर
इसकी आँखों में
ख़ुशी की जो चमक दिखेगी ,
वह इस पाँच रुपये के गुब्बारे से
कहीं बहुत बड़ी है साहब ,
यह दुनिया की सब से बड़ी ,
अनमोल दौलत है ,ये बचपन
लौट कर नहीं आता साहब ,
ये बचपन लौट कर नहीं आता .........
रचना तिथि :- 07-06-2021
Thursday, June 3, 2021
रोटी
रोटी कब सस्ती हुई ?
रोटी कल्ह भी मँहगी थी ,
रोटी आज भी मँहगी है ,
सब काम -धंधा मंद ,
मेहनत - मजूरी बन्द ,
जो चार पैसे कमा लाते थे ,
सब बन्द ,
ऐसे में रोटी हाथ से
बहुत दूर चली जाती है ,
रोटी , गोल - गोल रोटी ,
लहक कर कभी चाँद बन जाती ,
कभी सूरज बन जाती ,
कभी सितारों में टाँक दी जाती ,
हाथ से दूर , बहुत दूर चली जाती .......
माँ बच्चे से कहती -
सो जा मेरे लाल , सो जा ,
चाँद तोड़ लाने की जिद्द ,
बच्चे माँ से करते ,
ला दो न माँ ,
तोड़ कर चाँद ,
खा लेंगे रोटी !
माँ क्या बताये !
कहती , सो जा मेरे लाल ,
रात चाँद आयेगा ,
तुम्हारे सपनों में ,
तुम्हे रोटी दे जायेगा ,
बच्चा , फिर एक बार मचलता ,
फिर सो जाता .......
माँ सोचती ,
सबको रोटी मिलेगी ,
आश्वासन तो मिला ,
रोटी नहीं मिली ,
जो कुछ मिला ,
वह नून भर भी तो नहीं था ,
वह भी बहुत दिन हो गये ,
इसी खयाल में रात बीत गई ,
सुबह देर तक सोई रही ,
जब आँख खुली ,
बाहर डुगडुगी पिट रही थी ,
आज कैम्प में ,
रोटी बाँटी जायेगी ,
जिसे चाहिये , आ जाना ,
उसने पलट कर देखा -
बच्चा सो रहा था ,
निश्छल , निश्चल ,
उसने बच्चे को हिलाया ,
पर ,यह क्या !
वह सन्न रह गई ,
बच्चा रोटी के लिये
चाँद पर चला गया ,
सितारों के बीच चला गया ,
सूरज के पास चला गया ,
नहीं , अब लौट कर नहीं आयेगा ,
यों ही डुगडुगी पिटती रहेगी ,
यों ही ,
रोटी पर खेल होता रहेगा ,
हर काल में ,
यों ही ,
रोटी लुढ़क कर
चाँद पर चली जायेगी ......
रोटी कब सस्ती हुई ?
रोटी , कल्ह भी मँहगी थी ,
रोटी आज भी मँहगी है .........
रोटी आज भी मँहगी है .......
रोटी ! रोटी ! रोटी !
रचना तिथि - 12.04.2021
Sunday, March 28, 2021
फागुन का उपहार
आया है रस -रंग ले , होली का त्यौहार ,
विविध रंगों का मेल है ,फागुन का उपहार ,
प्रीत और अनुराग का , बरसै आज फुहार ,
रंग प्यार का घोल कर , करें आज बौछार ,
ऐसो रंग को डारियो , खुशियां मिले हजार।
विजय कुमार सिन्हा " तरुण "
Thursday, February 25, 2021
लो वसंत आ गया पथिक रे !
लो वसंत आ गया पथिक रे !
फूलों पर आई मादकता ,
पर्ण छाँव में बैठ पपीहा ,
पिहूपिहू की टेर लगाता।
सरसों फूले ,तीसी फूले ,
बाँज-बुरांस जंगल दहकाता ,
लहर-लहर नदियाँ जब बहती ,
कूल -कूल यौवन लहराता।
शुक ,पिक ,खग , खंजन औ बुलबुल,
मिल कर सारे शोर मचाते ,
फूल - फूल भौंरा मंडराये ,
जब -जब, यह वसंत है आता।
लो वसंत आ गया पथिक रे ,
मधुकर यह देता संदेशा।
Monday, January 11, 2021
कमेंट्स
धन्यवाद रोचक अच्छी रचना बधाई आपका आशीर्वाद हमारे साथ
कमेंट्स अच्छी कहानी बहुत सुन्दर , बहुत खूब
बूढी हो गई आँखें , अतीत के पन्नों में खोई ,
कहाँ छूटा , कहाँ खोया ,इसी यादों में है खोई। आहा ! क्या बात है
शादी की सालगिरह की बहुत - बहुत शुभकामनायें। सदैव स्वस्थ और सुखी रहें
जन्म दिन की बहुत -बहुत बधाई एवं शुभकामनायें
अजब हैं लोग ,
पेड़ों को काट कर " हवा " ढूंढ़ते हैं , विजय कुमार सिन्हा " तरुण "
मिटा कर सूरज ,
" सवेरा " ढूंढ़ते है।
हम तो चले परदेश
भले ही हम आप से दूर बहुत रहते हैं ,
भूले नहीं हैं , हम , रोज याद करते हैं।
आपकी नज़्मों को हम रोज पढ़ा करते हैं ,
इनमें सेझाँकती छवि आपकी देख लेते हैं।
Friday, October 30, 2020
नयनों की नयनों से
ना ,जाने क्या -क्या बात हुई ,
कसमस -कसमस दिन बीता ,
साँझ ढली , फिर रात हुई।
चाँद छुपा जा अंक गगन के ,
तारों की बरात सजी ,
अधरों के आमंत्रण पर ,
अधरें भी रक्ताभ हुईं।
साँसों का था मिलन एक बस ,
चुपके -चुपके रात हँसी ,
महक उठा तब अंग -अंग ,
अमृत की बरसात हुई।
खोई थी मादक सपनों में
कोयल की कूकों से जब ,
स्वर्णिम सी एक भोर हुई ।
अलसाई आँखों ने कर दी ,
चुगली बीते रात की ,
पायलिया ने खोल दिए सब ,
राज प्यार के बात की।
Thursday, October 15, 2020
सात समन्दर पार
आँखों में ये कतरा है ,
या कोई यह दरिया है ,
या सागर ही उमड़ा है ,
ओह !सात समन्दर पार ,
बेटा मेरा रहता है।
दिनांक - 10 -10 - 2020
Sunday, September 20, 2020
, माँ जैसी ही लगती है
जब भी वह मुझ से मिलती है ,
वह बड़े प्यार से मिलती है ,
उसकी वाणी तो सच मुझको ,
मीठी मिश्री सी लगती है।
वह वृद्धा मुझको तो , मेरी ,
हाँ ,माँ जैसी ही लगती है।
आँखों में प्यार का भाव भरा ,
चेहरे पर झुर्री सजी हुई ,
रख दे गर सिर पर हाथ जो वो ,
आशीष की बारिस करती है।
वह वृद्धा मुझको तो मेरी ,
हाँ , माँ जैसी ही लगती है।
मैं जब भी नत हो जाता हूँ ,
पावन चरणों को छूने को ,
वो , बाँहें पकड़ उठाती है ,
वह अपने गले लगाती है।
वह वृद्ध मुझको तो , सच ही ,
हाँ , माँ जैसी ही लगती है।
मैं धन्य - धन्य हो जाता हूँ ,
उस क्षण सुख स्वर्ग का पाता हूँ ,
आँखों से झड़ते हैंआँसू ,
बेटा कह मुझे बुलाती है।
वह वृद्धा मुझ को तो सच ही ,
हाँ , माँ जैसी ही लगती है।
हो सिर पर जिसके हाथ सदा ,
माँ के स्नेहिल करकमलों का ,
दुःख - दर्दों की ही कौन कहे ,
मौत लौट कर जाती है।
वह वृद्धा मुझको तो , सच ही ,
हाँ , माँ जैसी ही लगती है।
रचना तिथि -- 13 09 -2020
Tuesday, September 8, 2020
बस एक तेरा नूर
बहुत गुजर गया है ,
चन्द रोज और गुजर जायेंगे ,
हम तो वो दरख़्त हैं , जो
कुछ न कुछ देकर ही जायेंगे।
ज़माने ने दिया है ,
मुझको बहुत कुछ ,
प्यार , मोहब्बत ,इश्क और अखलाक़ ,
सब कुछ तुमको ही नज़र कर जायेँगे।
किसी से क्या शिक़वा , क्या गिला ,
सब यहीं छोड़ जायेंगे ,
तुम्हारी यादों के सिवा ,
कुछ और ना ले जायेंगे।
ये मकां , ये असबाब , ये साजो - सामां ,
सब यहीं रह जायेँगे ,
बस एक तेरा नूर , तेरी मुस्कुराहट ,
जनम - जनम याद आयेंगे।
( रचना तिथि : - 03 - 09 - 2020 )
Thursday, August 27, 2020
( 1 ) साजिस और ( 2 ) मेरा मन
बूढ़े बरगद और पीपल के पेड़
यूँ ही धरासायी नहीं हुए होंगे ,
जरूर आसमां के
नक्षत्रों ने मसविरा किया होगा ,
रचे होंगे साजिस ,
वरना आँधियों की क्या बिसात।
( 2 ) मेरा मन
मन ,मन भर का भारी हो गया ,
मेरा मन ,
मन ही मन में मेरे मन से ,
दूर हो गया मेरा मन ,
मन की मन से बात हुई थी ,
मन ही मन ,
मन की मन की बात रह गई ,
मन ही मन ,
मन ही मन में हुआ उदास ,
यह मेरा मन।
मन कुछ कहता , मन कुछ सुनता ,
सुन कर भी अनसुनी करता ,
मन ही मन में मन सोचता ,
कैसा है यह मेरा मन ?
Tuesday, August 4, 2020
रेशम का दुपट्टा
यूँ निकला ना करो ,
ज़माना है खराब ,
जमाने से डरो।
मौसम का क्या भरोसा ,
कभी ये भी मचल जायेगा ,
झूम कर नाचेगा ,
बहक जायेगा।
भींगा ना करो तुम कभी बूंदों में ,
रेशम का दुपट्टा है लिपट जायेगा।
जुल्फों से टपकता हुआ ,
बरसात का पानी ,
चूमेगा तन - वदन ,
वो बन के शराबी।
नाजुक तेरा बदन है ,
लग जायेगी नजर ,
निकली हो तुम बरसात में ,
सब को है ये खबर।
रहना ना इत्मीनान ,
अपनों से भी कभी ,
देते हैं बड़ा ज़ख्म ,
अपने भी हैं कभी।