फूलों की तरह मुस्कुराते रहें
Wednesday, April 5, 2017
Friday, March 31, 2017
नन्हकू
हमने भी देखा एक सपना ,
किससे कहूँ सपनों की बात ,
नन्हकू किसान की मेहरिया
सोचती है ,
सोचती है -
अबकी नन्हकू आवेगा
तो , उससे कहेगी
मेरे लिए भी ले आना
शहर से
एक ठो ' बिन्दी '
और
एक ठो ' सिन्दूर की डिब्बी ' ,
बच्चों के लिए
एक सस्ता जूता ,
एक स्कूल बैग ,
कुछ किताबें , कुछ कापियां
और पेन्सिल भी ,
अबके फसल
कुछ ठीक लगी है .....
नन्हकू शहर से
लौट आया है ,
खाली हाथ ,
हताश !
क्या हुआ ?
नन्हकू की मेहरिया ने पूछा ,
नन्हकू कुछ नहीं बोला ,
बैठा रहा , गुम - सुम , उदास ...
नन्हकू के मन में भी
उठती रही , उसके
मन की बात -
मंडी के ठेकेदारों ने
औने - पौने में
आलू खरीद लिया ,
पैसे भी पूरे नहीं दिये ,
बीज के पूरे दाम भी
नहीं निकले ,
कहाँ से लाऊँ
बच्चों के लिए जूते ,
किताबें ,
और उसके लिए
' बिन्दी ' ?
साहूकार ने बीज के पैसे
मंडी में ही रखबा लिए ,
फिर वही
साल भर का फाका - कसी ,
फिर साल भर का
इन्तजार ,
फिर उधार ,
फिर कर्ज ,
कब आयेंगे
मेरे अच्छे दिन ?
' सिलिंडर की ' कौन कहे ,
खाने - पीने से लेकर
डीज़ल - पेट्रोल ,
हर चीजों के दामों में
उन्नति हो रही है ,
बस किसान मर रहे हैं,
' वादों ' के पिटारों से
' वादों ' के फूल
अब भी झड़ रहे हैं ।
फूल तो फूल हैं ,
चाहे वे कागज के हों
या फिर ,
असल ही,
सभी एक दिन मुरझा जाते हैं .....
नन्हकू ने देखा
रात का स्याह अँधेरा ,
पर , सुबह का उजाला
नहीं देख सका ,
भोर के पंछी
चह - चहा रहे थे
पर नन्हकू का ' पंछी '
अँधेरे में ही गुम हो गया ........
( रचना तिथि - 29 - 03 - 2017 समय - सुबह एक 1 बज कर 30 मिनट )
---- ( प्रकाशित )
किससे कहूँ सपनों की बात ,
नन्हकू किसान की मेहरिया
सोचती है ,
सोचती है -
अबकी नन्हकू आवेगा
तो , उससे कहेगी
मेरे लिए भी ले आना
शहर से
एक ठो ' बिन्दी '
और
एक ठो ' सिन्दूर की डिब्बी ' ,
बच्चों के लिए
एक सस्ता जूता ,
एक स्कूल बैग ,
कुछ किताबें , कुछ कापियां
और पेन्सिल भी ,
अबके फसल
कुछ ठीक लगी है .....
नन्हकू शहर से
लौट आया है ,
खाली हाथ ,
हताश !
क्या हुआ ?
नन्हकू की मेहरिया ने पूछा ,
नन्हकू कुछ नहीं बोला ,
बैठा रहा , गुम - सुम , उदास ...
नन्हकू के मन में भी
उठती रही , उसके
मन की बात -
मंडी के ठेकेदारों ने
औने - पौने में
आलू खरीद लिया ,
पैसे भी पूरे नहीं दिये ,
बीज के पूरे दाम भी
नहीं निकले ,
कहाँ से लाऊँ
बच्चों के लिए जूते ,
किताबें ,
और उसके लिए
' बिन्दी ' ?
साहूकार ने बीज के पैसे
मंडी में ही रखबा लिए ,
फिर वही
साल भर का फाका - कसी ,
फिर साल भर का
इन्तजार ,
फिर उधार ,
फिर कर्ज ,
कब आयेंगे
मेरे अच्छे दिन ?
' सिलिंडर की ' कौन कहे ,
खाने - पीने से लेकर
डीज़ल - पेट्रोल ,
हर चीजों के दामों में
उन्नति हो रही है ,
बस किसान मर रहे हैं,
' वादों ' के पिटारों से
' वादों ' के फूल
अब भी झड़ रहे हैं ।
फूल तो फूल हैं ,
चाहे वे कागज के हों
या फिर ,
असल ही,
सभी एक दिन मुरझा जाते हैं .....
नन्हकू ने देखा
रात का स्याह अँधेरा ,
पर , सुबह का उजाला
नहीं देख सका ,
भोर के पंछी
चह - चहा रहे थे
पर नन्हकू का ' पंछी '
अँधेरे में ही गुम हो गया ........
( रचना तिथि - 29 - 03 - 2017 समय - सुबह एक 1 बज कर 30 मिनट )
---- ( प्रकाशित )
Saturday, March 11, 2017
घर - घर का चूहा
मैं , घर - घर का
चूहा कहलाता ,
पर , घर में अब ,
ना घुसने पाता ,
ना ही कपड़े
कुतर हूँ पाता ,
ना ही रसोई घर में ही
भोजन मैं हूँ कर पाता।
घर - मकान सब पक्के हो गए ,
बंद हो गईं नालियाँ सारी ,
रोशनदान भी बंद हो गए ,
दरवाजों में लग गई जाली।
रहा न घर में रास्ता कोई ,
जिससे मैं घुस पाता भाई ,
हो गया हाल हमारा खस्ता ,
हमने तब , नापा रास्ता।
है रेलवे स्टेशन ही अब
मेरा स्थाई अड्डा ,
मेरा बसेरा
रेल का डब्बा ,
इसमें खूब
सफर मैं करता ,
बिना टिकट मैं
आता - जाता।
तरह - तरह की
भाषा सुनता ,
तरह - तरह का
भोजन करता ,
छुप कर सभी को
देखा करता ,
घाट - घाट का
पानी पीता।
एक जगह मैं
कभी ना टिकता ,
यायावर सा
जीवन जीता।
---- मंजु सिन्हा
चूहा कहलाता ,
पर , घर में अब ,
ना घुसने पाता ,
ना ही कपड़े
कुतर हूँ पाता ,
ना ही रसोई घर में ही
भोजन मैं हूँ कर पाता।
घर - मकान सब पक्के हो गए ,
बंद हो गईं नालियाँ सारी ,
रोशनदान भी बंद हो गए ,
दरवाजों में लग गई जाली।
रहा न घर में रास्ता कोई ,
जिससे मैं घुस पाता भाई ,
हो गया हाल हमारा खस्ता ,
हमने तब , नापा रास्ता।
है रेलवे स्टेशन ही अब
मेरा स्थाई अड्डा ,
मेरा बसेरा
रेल का डब्बा ,
इसमें खूब
सफर मैं करता ,
बिना टिकट मैं
आता - जाता।
तरह - तरह की
भाषा सुनता ,
तरह - तरह का
भोजन करता ,
छुप कर सभी को
देखा करता ,
घाट - घाट का
पानी पीता।
एक जगह मैं
कभी ना टिकता ,
यायावर सा
जीवन जीता।
---- मंजु सिन्हा
Monday, January 30, 2017
ओ परदेशी ,घर तू आ जा
रोटी तो बस दो खाते हैं ,
पानी भी थोड़ा पीते हैं ,
रोटी मुझको नहीं चाहिये ,
मुझको तो बस प्यार चाहिये ,
वापस तू अब घर को आ जा ,
आधी ही है मेरी पूजा ,
पूजा पूरी करने आ जा ,
ओ परदेशी ,घर तू आ जा।
बाट तिहारा जोह रहा हूँ ,
हर क्षण , हर पल विकल रहा हूँ ,
अँखियों में भी नीर नहीं है ,
मन को भी अब धीर नहीं है ,
मेरे दिल के अरमां आ जा ,
नयनों का तारा तू आ जा ,
कुछ सम्बल मुझको तू दे जा ,
ओ परदेशी घर तू आ जा।
( रचना तिथि 30 मार्च -2015 )
पानी भी थोड़ा पीते हैं ,
रोटी मुझको नहीं चाहिये ,
मुझको तो बस प्यार चाहिये ,
वापस तू अब घर को आ जा ,
आधी ही है मेरी पूजा ,
पूजा पूरी करने आ जा ,
ओ परदेशी ,घर तू आ जा।
बाट तिहारा जोह रहा हूँ ,
हर क्षण , हर पल विकल रहा हूँ ,
अँखियों में भी नीर नहीं है ,
मन को भी अब धीर नहीं है ,
मेरे दिल के अरमां आ जा ,
नयनों का तारा तू आ जा ,
कुछ सम्बल मुझको तू दे जा ,
ओ परदेशी घर तू आ जा।
( रचना तिथि 30 मार्च -2015 )
Sunday, January 29, 2017
प्रकाशित रचनाएँ ( मंजु सिन्हा )
प्रकाशित रचनाएँ ( मंजु सिन्हा )
1 . माँ तुम क्यों चली गईं ? कविता कायस्थ प्रहरी माo पत्रिका मई 2015 आगरा
2 . तब और अब " हलन्त " अगस्त " देहरादून
3 . माँ का जाना " " " अक्टूबर " "
4 . जिस देश में गंगा " " " जनवरी 2016 "
5 . विडंबना " " " फरवरी " "
6 . माँ " " " अप्रैल - मई " "
7 . आईसक्रीम वाला " " " जुलाई " "
8 . अकेली माँ " " " अगस्त " "
9 . बड़ों का सम्मान " " " सितम्बर "
1 . माँ तुम क्यों चली गईं ? कविता कायस्थ प्रहरी माo पत्रिका मई 2015 आगरा
2 . तब और अब " हलन्त " अगस्त " देहरादून
3 . माँ का जाना " " " अक्टूबर " "
4 . जिस देश में गंगा " " " जनवरी 2016 "
5 . विडंबना " " " फरवरी " "
6 . माँ " " " अप्रैल - मई " "
7 . आईसक्रीम वाला " " " जुलाई " "
8 . अकेली माँ " " " अगस्त " "
9 . बड़ों का सम्मान " " " सितम्बर "
Friday, January 27, 2017
प्रकाशित रचनाएँ : -
प्रकाशित रचनाएँ : -
1 . वीर प्रहरी ( कविता ) - मुंगेर टाइम्स - सo पत्र नवंबर / 1965 ( मुंगेर )
2 . कभी न होगा मेरा अंत ( लेख ) - दमामा सo पत्र जनवरी / 1976 ( देहरादून )
3 . यह गाँधी का देश ( कविता ) - रेल राजभाषा रेल पत्रिका फरवरी 1994 ( रेलवे बोर्ड ,
नई दिल्ली )
4 . मंजिल को पाने तू चल ( कविता ) - वैनगार्ड सo पत्र 15 -01 - 2006 ( देहरादून )
5 . लड़कियां ( कविता ) - " " 03 - 02 -2006 "
6 . वज़ूद ( कविता ) - पेज -3 " 26 -02 -2006 "
7 . किसने खेली होली ( कविता ) - " " 13 -03 -2006 "
8 . आरक्षण पर राजनीति ( लेख ) - " " 04 - 05 - 2006 "
9 . आत्मदाह ( कविता ) - " " 28 - 05 - 2006 "
10 . खामोश ( कविता ) - वैनगार्ड " 04 -06 -2006 "
11 . फिर इस महगाई ने मारा ( लेख ) अमर उजाला " 05 -06 -2006 "
( कॉम्पैक्ट )
12 . सड़क ( कविता ) - वैनगार्ड " 09 - 07 -2006 "
13 . पल - पल , छिन - छिन ( कविता ) " " 23 -07 - 2006 "
14 . परचम हमको लहराना है " " " 19 - 08 - 2007 "
15 . गाँधी को किसने है मारा ( कविता ) पेज - 3 " 31 - 01 -2008 "
16 . कैसे खायें दाल -रोटी ( लेख ) अमर उजाला कॉम्पैक्ट " 01 - 04 -2008 "
17 . माधो मेरी जात न पूछो ( कविता ) - पेज - 3 " 20 - 06 - 2010 "
18 . मैं नेता हूँ ( कविता ) " " 25 - 06 - 2010 "
19 . मंहगाई , जनता और
सरकार ( लेख ) " " 10 - 07 - 2010 "
20 . बरगद का पेड़ ( कविता ) " " 11 -07 -2010 "
21 . आखिर क्यों होते हैं
ट्रेन हादसे ( लेख ) " " 24 - 07 - 2010 "
22 . बेटियां ( कविता ) - उत्तराखण्ड भारती वार्षिक पत्रिका 2010 ( अक्टूबर ) "
( राजस्व विभाग , देहरादून )
23 घोटालों एवं भ्रष्टाचार ( लेख ) पेज - 3 सo पत्र 19 - 03 - 2011 "
का विष
24 . माँ ( कविता ) पेज - 3 सo पत्र 05 - 04 - 2011 "
25 . अब भी चेत जाओ " - युगवाणी ( माo पत्रिका ) सितंबर -2013 "
26 . आँखों में है ये कैसी नमी ( कहानी ) - फैमिली " फरवरी - 2014 "
( वैलेनटाइन डे स्पेशल )
27 . मोहे रंग दे ( होली पर विशेष ) लेख " मार्च - 2014 "
28 . मुझको गुब्बारे दिलवा दो ( कविता ) युगवाणी " दिसम्बर - 2014 "
29 . कोयल क्यों काली हुई " कायस्थ प्रहरी " जनवरी - 2015 आगरा
30 . माँ सा न कोई मिला " " " फरवरी - 2015 "
31 . पर्यावरण बचाना होगा ( लेख ) हलन्त " मार्च - 2015 देहरादून
32 . वसंत और होली " कायस्थ प्रहरी " " आगरा
33 . हमारी नैतिकता " हलन्त " अप्रैल - 2015 देहरादून
34 . अभ्यर्थना ( कविता ) " " मई - 2015 "
35 . आँखे ( कहानी ) कायस्थ प्रहरी " जून - 2015 आगरा
36 . लौट आओ तुम ( कविता ) " " " "
37 . नई गंगा निकलनी " हलन्त " जुलाई - 2015 देहरादून
चाहिए
38 . अम्बियाँ " कादम्बिनी " अगस्त - 2015 दिल्ली
39 . हम और हमारे बुजुर्ग ( लेख ) हलन्त " " " देहरादून
40 . भालू ( बाल कविता ) बाल प्रहरी " जुलाई-सितंबर -15 अल्मोड़ा
41 . हिन्दी की बिन्दी ( लेख ) हलन्त " सितंबर -2015 देहरादून
का सवाल
42 . ग़ज़ल ( ग़ज़ल ) परिन्दे " नवo - दिसम्बर - 15 दिल्ली
43 . राजनीति और सेवा ( लेख ) हलन्त " अक्टूबर - 2015 देहरादून
44 . बहशियाना है बहुत ( कविता ) " " नवम्बर - 2015 "
45 . एक कविता अनाम सी ( कविता ) " " दिसम्बर- 2015 "
46 . नव क्रांति चाहिए ( कविता ) हिन्दी सुरभि स्मारिका ( वर्ष 2014 - 15 ) हाथरस
( बिलम्ब प्राप्त )
47 . मोमबत्त्ती और मैं ( कविता ) ज्योति पत्रिका - 2015 ( बिलम्ब से प्राप्त ) - हरिद्वार
48 . अभिनन्दन नव वर्ष ( कविता ) हलन्त माo पत्रिका जनवरी -2016 - देहरादून
49 . रोटी का स्वाद " " " फरवरी -2016 "
50 . कागजी आदमी " " " " " "
51 . लो वसंत आ गया " प्राची क्षितिज " मार्च " लखनऊ
52 . अभी बहुत है शेष " हलन्त " अप्रैल -मई " देहरादून
53 .जँगली आदमी " " " " "
54 . श्रद्धांजलि " " " जून - 2016 "
55 . पहाड़ का दर्द " " " जुलाई " "
56 . तिरंगा न झुकने देंगे " " " अगस्त " "
57 . जय किसान " " " " " "
58 . गुरुवै नम: ( हिन्दी दिवस पर विशेष लेख ) " " सितम्बर " "
59 . खोया हुआ शहर देहरादून - कविता " " अक्टूबर " "
60 . शीश को मैं वार दूँ " " " नवम्बर " "
61 . मेरा गाँव " " " दिसम्बर " "
62 . आज भी " वागर्थ " दिसम्बर 2016 - कोलकाता
63 . मेरे आँगन पेड़ आम का " हलन्त " जनवरी - 2017 देहरादून
64 . माँ शारदे ! " " " फरवरी - 2017 "
65 . बरगद का पेड़ " " " मार्च - 2017 "
1 . वीर प्रहरी ( कविता ) - मुंगेर टाइम्स - सo पत्र नवंबर / 1965 ( मुंगेर )
2 . कभी न होगा मेरा अंत ( लेख ) - दमामा सo पत्र जनवरी / 1976 ( देहरादून )
3 . यह गाँधी का देश ( कविता ) - रेल राजभाषा रेल पत्रिका फरवरी 1994 ( रेलवे बोर्ड ,
नई दिल्ली )
4 . मंजिल को पाने तू चल ( कविता ) - वैनगार्ड सo पत्र 15 -01 - 2006 ( देहरादून )
5 . लड़कियां ( कविता ) - " " 03 - 02 -2006 "
6 . वज़ूद ( कविता ) - पेज -3 " 26 -02 -2006 "
7 . किसने खेली होली ( कविता ) - " " 13 -03 -2006 "
8 . आरक्षण पर राजनीति ( लेख ) - " " 04 - 05 - 2006 "
9 . आत्मदाह ( कविता ) - " " 28 - 05 - 2006 "
10 . खामोश ( कविता ) - वैनगार्ड " 04 -06 -2006 "
11 . फिर इस महगाई ने मारा ( लेख ) अमर उजाला " 05 -06 -2006 "
( कॉम्पैक्ट )
12 . सड़क ( कविता ) - वैनगार्ड " 09 - 07 -2006 "
13 . पल - पल , छिन - छिन ( कविता ) " " 23 -07 - 2006 "
14 . परचम हमको लहराना है " " " 19 - 08 - 2007 "
15 . गाँधी को किसने है मारा ( कविता ) पेज - 3 " 31 - 01 -2008 "
16 . कैसे खायें दाल -रोटी ( लेख ) अमर उजाला कॉम्पैक्ट " 01 - 04 -2008 "
17 . माधो मेरी जात न पूछो ( कविता ) - पेज - 3 " 20 - 06 - 2010 "
18 . मैं नेता हूँ ( कविता ) " " 25 - 06 - 2010 "
19 . मंहगाई , जनता और
सरकार ( लेख ) " " 10 - 07 - 2010 "
20 . बरगद का पेड़ ( कविता ) " " 11 -07 -2010 "
21 . आखिर क्यों होते हैं
ट्रेन हादसे ( लेख ) " " 24 - 07 - 2010 "
22 . बेटियां ( कविता ) - उत्तराखण्ड भारती वार्षिक पत्रिका 2010 ( अक्टूबर ) "
( राजस्व विभाग , देहरादून )
23 घोटालों एवं भ्रष्टाचार ( लेख ) पेज - 3 सo पत्र 19 - 03 - 2011 "
का विष
24 . माँ ( कविता ) पेज - 3 सo पत्र 05 - 04 - 2011 "
25 . अब भी चेत जाओ " - युगवाणी ( माo पत्रिका ) सितंबर -2013 "
26 . आँखों में है ये कैसी नमी ( कहानी ) - फैमिली " फरवरी - 2014 "
( वैलेनटाइन डे स्पेशल )
27 . मोहे रंग दे ( होली पर विशेष ) लेख " मार्च - 2014 "
28 . मुझको गुब्बारे दिलवा दो ( कविता ) युगवाणी " दिसम्बर - 2014 "
29 . कोयल क्यों काली हुई " कायस्थ प्रहरी " जनवरी - 2015 आगरा
30 . माँ सा न कोई मिला " " " फरवरी - 2015 "
31 . पर्यावरण बचाना होगा ( लेख ) हलन्त " मार्च - 2015 देहरादून
32 . वसंत और होली " कायस्थ प्रहरी " " आगरा
33 . हमारी नैतिकता " हलन्त " अप्रैल - 2015 देहरादून
34 . अभ्यर्थना ( कविता ) " " मई - 2015 "
35 . आँखे ( कहानी ) कायस्थ प्रहरी " जून - 2015 आगरा
36 . लौट आओ तुम ( कविता ) " " " "
37 . नई गंगा निकलनी " हलन्त " जुलाई - 2015 देहरादून
चाहिए
38 . अम्बियाँ " कादम्बिनी " अगस्त - 2015 दिल्ली
39 . हम और हमारे बुजुर्ग ( लेख ) हलन्त " " " देहरादून
40 . भालू ( बाल कविता ) बाल प्रहरी " जुलाई-सितंबर -15 अल्मोड़ा
41 . हिन्दी की बिन्दी ( लेख ) हलन्त " सितंबर -2015 देहरादून
का सवाल
42 . ग़ज़ल ( ग़ज़ल ) परिन्दे " नवo - दिसम्बर - 15 दिल्ली
43 . राजनीति और सेवा ( लेख ) हलन्त " अक्टूबर - 2015 देहरादून
44 . बहशियाना है बहुत ( कविता ) " " नवम्बर - 2015 "
45 . एक कविता अनाम सी ( कविता ) " " दिसम्बर- 2015 "
46 . नव क्रांति चाहिए ( कविता ) हिन्दी सुरभि स्मारिका ( वर्ष 2014 - 15 ) हाथरस
( बिलम्ब प्राप्त )
47 . मोमबत्त्ती और मैं ( कविता ) ज्योति पत्रिका - 2015 ( बिलम्ब से प्राप्त ) - हरिद्वार
48 . अभिनन्दन नव वर्ष ( कविता ) हलन्त माo पत्रिका जनवरी -2016 - देहरादून
49 . रोटी का स्वाद " " " फरवरी -2016 "
50 . कागजी आदमी " " " " " "
51 . लो वसंत आ गया " प्राची क्षितिज " मार्च " लखनऊ
52 . अभी बहुत है शेष " हलन्त " अप्रैल -मई " देहरादून
53 .जँगली आदमी " " " " "
54 . श्रद्धांजलि " " " जून - 2016 "
55 . पहाड़ का दर्द " " " जुलाई " "
56 . तिरंगा न झुकने देंगे " " " अगस्त " "
57 . जय किसान " " " " " "
58 . गुरुवै नम: ( हिन्दी दिवस पर विशेष लेख ) " " सितम्बर " "
59 . खोया हुआ शहर देहरादून - कविता " " अक्टूबर " "
60 . शीश को मैं वार दूँ " " " नवम्बर " "
61 . मेरा गाँव " " " दिसम्बर " "
62 . आज भी " वागर्थ " दिसम्बर 2016 - कोलकाता
63 . मेरे आँगन पेड़ आम का " हलन्त " जनवरी - 2017 देहरादून
64 . माँ शारदे ! " " " फरवरी - 2017 "
65 . बरगद का पेड़ " " " मार्च - 2017 "
Saturday, December 24, 2016
बड़ी ठंढक सी लगती है
बड़ी ठंढक सी लगती है
तुम्हारे गेसू में आ कर ।
तुम्हारे गेसू में आ कर ।
तुम्हारे पास होता हूँ ,
सुकूँ इस दिल को मिलता है ,
तुम्हारी साँसों की खुशबू से ,
मेरा ये दिल धड़कता है।
छू कर नर्म होठों को
पवन भी गुनगुनाता है ,
चुरा कर आँख का काजल
ये बादल भी मचलता है।
गिरा जो शानो से आँचल
ये मौसम भी बहकता है ,
तुम्हारी ही हँसी से तो
चमन भी खिल - खिलाता है।
घटाओं को शिकायत है
तेरी ज़ुल्फ़ों में ख़म क्यों है ,
जो तुमने ख़म को खोला तो
झमक कर घन बरसता है।
तुम्हारी साँसों की खुशबू से ,
मेरा ये दिल धड़कता है।
छू कर नर्म होठों को
पवन भी गुनगुनाता है ,
चुरा कर आँख का काजल
ये बादल भी मचलता है।
गिरा जो शानो से आँचल
ये मौसम भी बहकता है ,
तुम्हारी ही हँसी से तो
चमन भी खिल - खिलाता है।
घटाओं को शिकायत है
तेरी ज़ुल्फ़ों में ख़म क्यों है ,
जो तुमने ख़म को खोला तो
झमक कर घन बरसता है।
ब्लॉग तिथि - 24 - 12 - 2016
Wednesday, December 14, 2016
काले धन वाले
नोट की लाइन लगने वाले ही , काले धन वाले हैं ,
जो काले धन वाले हैं , लाइन में लगने वाले हैं।
करैं किसानी हाथ हो काला , मजदूरी में हाथ हो काला ,
करैं पढ़ाई हाथ हो काला , करैं चाकरी हाथ हो काला ,
ये काले धन वाले हैं हैं , लाइन में लगने वाले हैं ,
नोट की लाइन लगने वाले ही , काले धन वाले हैं। ( 1 )
अम्मा - बाबू , दादा - दादी , रोज ही लाइन लगते हैं ,
फिर भी नोट हाथ न आते , खाली हाथ घर आते हैं ,
पी कर पानी विस्तर में वे , भूखे पेट सो जाते हैं ,
यही तो हैं काले धन वाले , लाइन में लगने वाले हैं।
नोट की लाइन लगने वाले ही , काले धन वाले हैं।( 2 )
खाते जो ईमानदारी की , नित विदेश को जाते हैं ,
जो काले धन वाले हैं , लाइन में लगने वाले हैं।
करैं किसानी हाथ हो काला , मजदूरी में हाथ हो काला ,
करैं पढ़ाई हाथ हो काला , करैं चाकरी हाथ हो काला ,
ये काले धन वाले हैं हैं , लाइन में लगने वाले हैं ,
नोट की लाइन लगने वाले ही , काले धन वाले हैं। ( 1 )
अम्मा - बाबू , दादा - दादी , रोज ही लाइन लगते हैं ,
फिर भी नोट हाथ न आते , खाली हाथ घर आते हैं ,
पी कर पानी विस्तर में वे , भूखे पेट सो जाते हैं ,
यही तो हैं काले धन वाले , लाइन में लगने वाले हैं।
नोट की लाइन लगने वाले ही , काले धन वाले हैं।( 2 )
खाते जो ईमानदारी की , नित विदेश को जाते हैं ,
लंबी - लंबी गप्पें हाँकै , भाषण यही तो देते हैं ,
बड़े - बड़े महलों में रहते , नित दिन पार्टी करते हैं ,
ये मौज मनाने वाले हैं , गुलछर्रे उड़ाने वाले हैं।
नोट की लाइन लगने वाले ही , काले धन वाले हैं।(3 )
जिनके पास नहीं काला धन , सुख की नींद वो सोते हैं ,
बैंक के पीछे दरवज्जे से , नोट बटोर ले आते हैं ,
ये सफ़ेद धन वाले हैं , सब नेता जी के साले हैं ,
जो काले धन वाले हैं , लाइन में लगने वाले हैं।
नोट की लाइन लगने वाले ही काले धन वाले हैं।( 4 )
अंधे हाथ बटेर लगी है , स्वाद भुनाने वाले हैं ,
लूट - लाट कर , गठरी बाँध , रफूचक्कर होने वाले हैं
ख़्वाब दिखाने वाले , लॉलीपाप थमाने वाले हैं ,
भीख माँगने को ये भैया , पात्र थमाने वाले हैं ,
जो काले धन वाले हैं , लाइन में लगने वाले हैं ,
नोट की लाइन लगने वाले ही काले धन वाले हैं।( 5 )
बड़े - बड़े महलों में रहते , नित दिन पार्टी करते हैं ,
ये मौज मनाने वाले हैं , गुलछर्रे उड़ाने वाले हैं।
नोट की लाइन लगने वाले ही , काले धन वाले हैं।(3 )
जिनके पास नहीं काला धन , सुख की नींद वो सोते हैं ,
बैंक के पीछे दरवज्जे से , नोट बटोर ले आते हैं ,
ये सफ़ेद धन वाले हैं , सब नेता जी के साले हैं ,
जो काले धन वाले हैं , लाइन में लगने वाले हैं।
नोट की लाइन लगने वाले ही काले धन वाले हैं।( 4 )
अंधे हाथ बटेर लगी है , स्वाद भुनाने वाले हैं ,
लूट - लाट कर , गठरी बाँध , रफूचक्कर होने वाले हैं
ख़्वाब दिखाने वाले , लॉलीपाप थमाने वाले हैं ,
भीख माँगने को ये भैया , पात्र थमाने वाले हैं ,
जो काले धन वाले हैं , लाइन में लगने वाले हैं ,
नोट की लाइन लगने वाले ही काले धन वाले हैं।( 5 )
रचना तिथि / माह -दिसंबर 2016
ब्लॉगड - 16 -12 -2016
Saturday, December 3, 2016
" मरी खाल की साँस सों
अपनी सत्ता और पुत्रों के प्रति मोह ने
आज फिर ,
धृतराष्ट्र को अंधा बना दिया है ,
उसके चारों ओर खड़े
जनतंत्र के पुजारी
दुश्मन दीख रहे हैं,
अपने अजेय किले
और ,
पुत्रों - बान्धवों की कतार देख
वह कुटिल मुस्कराहट
और ,
विद्रूप हँसी से
सबका उपहास मना रहा है।
फिर एक महाभारत की तैयारी
कलियुग ने कर ली है।
फैली हुई अव्यवस्थायें
उसे नहीं दीखतीं ,
उसकी अट्टहास में
गिरते - पड़ते - मरते जन
नहीं दीखते ,
उसकी आँखों पर
अहंकार का पर्दा पड़ गया है।
इतिहास अपने आपको दुहराता है ,
वही चौकड़ी है ,
शकुनि भी है , गुरु द्रोण भी ,
वृद्ध भीष्म पितामह भी ,
जिन्हें अब
एक बगल खड़ा कर दिया गया है ,
वह भी वही बोलते हैं ,
जो , धृतराष्ट्र बुलबाना चाहते हैं।
अरे ! ओ धृतराष्ट्र
काल का पहिया घूमता है,
भूल मत , यहाँ सब नश्वर है ,
न तू रहेगा , न तेरी सत्ता ,
न तेरे पुत्रों - बान्धवों की फ़ौज ,
जो बच जाएंगे तेरे परिजन
तब वही तेरा उपहास करेंगे।
कहाँ खोया है ?
मन की आँखें खोल ,
" मरी खाल की साँस सों
लौह भस्म हो जाय " ।
मत ले आह ,
दुनियाँ ने पत्थरों को पूजा है
तो , ठोकरें भी लगाई हैं।
दर्प की अग्नि में ,
जल जाता है सब कुछ ,
न तख्त ही रहता ,
न ताज ही रहता ,
एक प्यार के ही न्याय का
बस राज है रहता।
आज फिर ,
धृतराष्ट्र को अंधा बना दिया है ,
उसके चारों ओर खड़े
जनतंत्र के पुजारी
दुश्मन दीख रहे हैं,
अपने अजेय किले
और ,
पुत्रों - बान्धवों की कतार देख
वह कुटिल मुस्कराहट
और ,
विद्रूप हँसी से
सबका उपहास मना रहा है।
फिर एक महाभारत की तैयारी
कलियुग ने कर ली है।
फैली हुई अव्यवस्थायें
उसे नहीं दीखतीं ,
उसकी अट्टहास में
गिरते - पड़ते - मरते जन
नहीं दीखते ,
उसकी आँखों पर
अहंकार का पर्दा पड़ गया है।
इतिहास अपने आपको दुहराता है ,
वही चौकड़ी है ,
शकुनि भी है , गुरु द्रोण भी ,
वृद्ध भीष्म पितामह भी ,
जिन्हें अब
एक बगल खड़ा कर दिया गया है ,
वह भी वही बोलते हैं ,
जो , धृतराष्ट्र बुलबाना चाहते हैं।
अरे ! ओ धृतराष्ट्र
काल का पहिया घूमता है,
भूल मत , यहाँ सब नश्वर है ,
न तू रहेगा , न तेरी सत्ता ,
न तेरे पुत्रों - बान्धवों की फ़ौज ,
जो बच जाएंगे तेरे परिजन
तब वही तेरा उपहास करेंगे।
कहाँ खोया है ?
मन की आँखें खोल ,
" मरी खाल की साँस सों
लौह भस्म हो जाय " ।
मत ले आह ,
दुनियाँ ने पत्थरों को पूजा है
तो , ठोकरें भी लगाई हैं।
दर्प की अग्नि में ,
जल जाता है सब कुछ ,
न तख्त ही रहता ,
न ताज ही रहता ,
एक प्यार के ही न्याय का
बस राज है रहता।
Monday, November 7, 2016
नेह की बाती
शीत अधरों पर शिखा रख ,
जलन का मत हाल पूछो ,
प्रीत में जलते शलभ से ,
ह्रदय का मत हाल पूछो।
नेह की बाती संजोये ,
दीप जलते हैं हजारों ,
हार कर बैठे तमस से ,
हार का मत हाल पूछो।
अविरल तमस को भेद कर ,
लघु दीप वह जलता रहा ,
मोम से उसके ह्रदय के ,
ताप का मत हाल पूछो।
प्रेम का विश्वास था यह ,
वा प्रीति का उल्लास था ,
इस गहनतम प्यार के ,
उल्लास का मत हाल पूछो।
जलन का मत हाल पूछो ,
प्रीत में जलते शलभ से ,
ह्रदय का मत हाल पूछो।
नेह की बाती संजोये ,
दीप जलते हैं हजारों ,
हार कर बैठे तमस से ,
हार का मत हाल पूछो।
अविरल तमस को भेद कर ,
लघु दीप वह जलता रहा ,
मोम से उसके ह्रदय के ,
ताप का मत हाल पूछो।
प्रेम का विश्वास था यह ,
वा प्रीति का उल्लास था ,
इस गहनतम प्यार के ,
उल्लास का मत हाल पूछो।
Friday, October 21, 2016
ऐसी प्रीति न चाहिये
भँवरा बोला कली से , सुनो हमारी बात ,
शाख झुलाता है तुम्हें , दुलराती है रात।
तेरा मेरा प्रेम तो जग में है विख्यात ,
झूठ नहीं मैं बोलता , सच्ची है यह बात।
आ लग जा मेरे गले चूमू तेरा माथ ,
नतमस्तक भँवरा हुआ, ले आँसू की सौगात ।
है बेला यह प्रेम का , करो प्रेम की बात ,
बीत न जाए समय यह , बीत ना जाए रात।
शाख झुलाता है तुम्हें , दुलराती है रात।
तेरा मेरा प्रेम तो जग में है विख्यात ,
झूठ नहीं मैं बोलता , सच्ची है यह बात।
आ लग जा मेरे गले चूमू तेरा माथ ,
नतमस्तक भँवरा हुआ, ले आँसू की सौगात ।
है बेला यह प्रेम का , करो प्रेम की बात ,
बीत न जाए समय यह , बीत ना जाए रात।
आया है मधुमास यह , करो प्रीति की बात,
अंग - अंग में रंग भरूँ , जो छू लूँ तेरे गात।
अंग - अंग में रंग भरूँ , जो छू लूँ तेरे गात।
कहा कली ने भँवर से , तू भी सुन एक बात ,
दिन भर फिरता बाबरा , कहाँ बितायी रात ?
डाली - डाली जा मिले , बुझी न दिल की प्यास ,
तू आवारा शूल है , कर सकता है घात।
मैं हूँ कोमल सी कली , मखमल जैसे गात ,
जो छू लेगा तू मुझे , जल जायेगी गात।
ऐसी प्रीति न चाहिये , जा सौतन के पास ,
रंग उन्हीं पर डारियो , जहाँ बिताई रात।
रख अधरों पर हास अलि , गया कली के पास ,
सुनो सुनाता हूँ कथा , जहाँ बिताई रात।
शाम ढले मैं घूमता , पहुँचा सरवर पास ,
बैठा सरसिज पंखुरी , बिना विचारे बात।
शतदल ने छल से मुझे , लिया पाश में बांध ,
कैद रहा मैं अंक में , बीत गयी यह रात।
प्रात काल सूरज जगा , जग में हुआ प्रभात ,
मुक्त हुआ मैं कैद से ,खुले कमल के पात।
मैं कुरूप हूँ रंग से , और न दूजा खोट ,
तन व मन मेरा है शुचि , जैसे कदली पात।
है कोमल सा दिल मेरा , करो नहीं आघात ,
हँस कर देवी ग्रहण करो , प्रीत भरा सौगात।
दिन भर फिरता बाबरा , कहाँ बितायी रात ?
डाली - डाली जा मिले , बुझी न दिल की प्यास ,
तू आवारा शूल है , कर सकता है घात।
मैं हूँ कोमल सी कली , मखमल जैसे गात ,
जो छू लेगा तू मुझे , जल जायेगी गात।
ऐसी प्रीति न चाहिये , जा सौतन के पास ,
रंग उन्हीं पर डारियो , जहाँ बिताई रात।
रख अधरों पर हास अलि , गया कली के पास ,
सुनो सुनाता हूँ कथा , जहाँ बिताई रात।
शाम ढले मैं घूमता , पहुँचा सरवर पास ,
बैठा सरसिज पंखुरी , बिना विचारे बात।
शतदल ने छल से मुझे , लिया पाश में बांध ,
कैद रहा मैं अंक में , बीत गयी यह रात।
प्रात काल सूरज जगा , जग में हुआ प्रभात ,
मुक्त हुआ मैं कैद से ,खुले कमल के पात।
मैं कुरूप हूँ रंग से , और न दूजा खोट ,
तन व मन मेरा है शुचि , जैसे कदली पात।
है कोमल सा दिल मेरा , करो नहीं आघात ,
हँस कर देवी ग्रहण करो , प्रीत भरा सौगात।
Thursday, October 6, 2016
गूँजा शंखनाद आज
ज्यों उठा उदधि में ज्वार ,जगा शौर्य जन - जन में ,
गूँजा शंखनाद आज , है भारत के प्रांगण में।
मोल लहू से कम ना हो , मातृभूमि पर हुए शहीद ,
जीवन जिसने वार दिया , सरहद पर अरिमर्दन में।
कर हुँकार गर्जना सिंह सा , अरि दल पर जब टूट पड़े ,
मानो काल - कराल आज , खड़ा शत्रु के आँगन में।
गुह्य गढ़ को भेद अरि के , पहुँच गया वह अरि गढ़ में ,
जैसे मद से मत्त शत्रि , जा पहुँचा कदलीवन में।
अरि पर कर भीषण प्रहार , घाट मौत के सुला दिया ,
तहस - नहस कर शत्रु शिविर , जग को नव संदेश दिया।
देख पराक्रम के वैभव को , जग ने जयजयकार किया ,
माँ के वीर सपूतों को ,देवों ने भी नमन किया।
गूँजा शंखनाद आज , है भारत के प्रांगण में।
मोल लहू से कम ना हो , मातृभूमि पर हुए शहीद ,
जीवन जिसने वार दिया , सरहद पर अरिमर्दन में।
कर हुँकार गर्जना सिंह सा , अरि दल पर जब टूट पड़े ,
मानो काल - कराल आज , खड़ा शत्रु के आँगन में।
गुह्य गढ़ को भेद अरि के , पहुँच गया वह अरि गढ़ में ,
जैसे मद से मत्त शत्रि , जा पहुँचा कदलीवन में।
अरि पर कर भीषण प्रहार , घाट मौत के सुला दिया ,
तहस - नहस कर शत्रु शिविर , जग को नव संदेश दिया।
देख पराक्रम के वैभव को , जग ने जयजयकार किया ,
माँ के वीर सपूतों को ,देवों ने भी नमन किया।
Friday, September 30, 2016
शीश को मैं वार दूँ
धरा क्या , आकाश क्या , पाताल को भी लाँघ लूँ ,
हूँ शिवा मैं हिन्द का , मैं काल को भी बाँध लूँ।
सिंधु की मैं गर्जना हूँ , अनल दावानल का हूँ ,
नागवन के व्याल भी उंगलियों पर साध लूँ।
दशों दिशाएँ थर्राती , हुँकार भरता जब कभी ,
इस गगन से उस गगन तक , शत्रु को मैं नाध लूँ।
हैं नहीं हम पालते निज , शत्रुता बेकार की ,
पर नहीं ललकार को सुन मौनता को साध लूँ।
कृष्ण की है देवभूमि , हैं कुचलते नाग को ,
फैलते फण विषधरों के बाँसुरी से नाथ लूँ।
हम नहीं रणक्षेत्र में हैं पीठ दिखलाते कभी ,
मातृभूमि की चरण में शीश भी मैं वार दूँ।
है विजय के गीत का परचम हमारे हाथ में ,
मैं तिरंगे को सदा ही अपने काँधे काँध लूँ।
------ - ( प्रकाशित )
हूँ शिवा मैं हिन्द का , मैं काल को भी बाँध लूँ।
सिंधु की मैं गर्जना हूँ , अनल दावानल का हूँ ,
नागवन के व्याल भी उंगलियों पर साध लूँ।
दशों दिशाएँ थर्राती , हुँकार भरता जब कभी ,
इस गगन से उस गगन तक , शत्रु को मैं नाध लूँ।
हैं नहीं हम पालते निज , शत्रुता बेकार की ,
पर नहीं ललकार को सुन मौनता को साध लूँ।
कृष्ण की है देवभूमि , हैं कुचलते नाग को ,
फैलते फण विषधरों के बाँसुरी से नाथ लूँ।
हम नहीं रणक्षेत्र में हैं पीठ दिखलाते कभी ,
मातृभूमि की चरण में शीश भी मैं वार दूँ।
है विजय के गीत का परचम हमारे हाथ में ,
मैं तिरंगे को सदा ही अपने काँधे काँध लूँ।
------ - ( प्रकाशित )
Friday, September 23, 2016
स्वर्गीय पिता के नाम
उस दिन
वर्ष का आखिरी दिन था ,
पुराने वर्ष की विदाई
और
नए वर्ष के स्वागत में
चारों ओर खुशियाँ
तैर रही थीं ,
शरीक था मैं भी ,
मन से नहीं ,
तन से।
तभी ,अचानक फोन आया-
" पिता जी नहीं रहे "
रोते - रोते ,
उसने भरे गले से बताया ,
पर मैं नहीं रो पाया ,
धैर्य !
विपत में धैर्य ,
तुमने ही तो सिखलाया था।
मुझे कुछ दिन पहले ही
आभास हो गया था ,
जब एक दिन
तुमने मुझसे फोन पर
बात किया था ,
घर में नया - नया फोन लगा था ,
जाने क्यों कर मेरे मन में
तब एक कोहराम मच गया था ,
पर मैं मूढ़ मति , कायर ,
अपनी विवशता में ,
कुछ सरकारी नौकरी की परेशानी में ,
तुम तक नहीं आ पाया
तुम्हारी मृत्यु से पहले ,
तुम्हारी चरण रज लेने।
पश्चात ,
मैं सम्पूर्ण श्राद्ध खत्म होने तक
नहीं रोया , या , चुपके - चुपके रोया ,
जाने लोगों ने क्या - क्या कहा ,
अपने भी , पराये भी ।
मैं लौट आया वापस
नौकरी की ठौर।
पर , मैं एक दिन रोया ,
जार - जार रोया ,
जोर - जोर से रोया ,
वहाँ कोई नहीं था
मेरा रुदन सुनने वाला ,
वह था एक सपाट मैदान ,
निपट निर्जन ,
शाम का धुँधलका ,
टिमटिमाते जुगनू ,
पर ,
तुम थे मेरे पास , तब ,
जब मैं सचमुच रोया।
तुम अब भी मेरे पास हो ,
नहीं हो मेरे सामने ,
किन्तु , मेरी आँखों में ,
मेरे मन में ,
मेरे ह्रदय में।
तुम कब हुए जुदा मुझसे !
मैं नहीं जान पाया ,
मुझे अब भी
महसूस होता है
तुम्हारा स्पर्श ,
तुम्हारे गोद की खुशबू
अब भी मेरी श्वासों में है ,
नहीं भूल पाया मैं
तुम्हारा प्यार ,
तुम्हारा दुलार ,
मेरा मचलना ,
" ठीक होली के दिन
मेरे लिए ,
वह पीतल की पिचकारी
ला कर देना ,
जिससे एक ही बार में
सहस्त्रों धाराओं के
फव्वारों का निकलना ,
कितनी यादें
साथ - साथ चलती हैं मेरे ,
तुम हो ,
क्योंकि , तुम अब भी
मेरे साथ हो ,
पल , हर पल ,
कदम दर कदम।
वर्ष का आखिरी दिन था ,
पुराने वर्ष की विदाई
और
नए वर्ष के स्वागत में
चारों ओर खुशियाँ
तैर रही थीं ,
शरीक था मैं भी ,
मन से नहीं ,
तन से।
तभी ,अचानक फोन आया-
" पिता जी नहीं रहे "
रोते - रोते ,
उसने भरे गले से बताया ,
पर मैं नहीं रो पाया ,
धैर्य !
विपत में धैर्य ,
तुमने ही तो सिखलाया था।
मुझे कुछ दिन पहले ही
आभास हो गया था ,
जब एक दिन
तुमने मुझसे फोन पर
बात किया था ,
घर में नया - नया फोन लगा था ,
जाने क्यों कर मेरे मन में
तब एक कोहराम मच गया था ,
पर मैं मूढ़ मति , कायर ,
अपनी विवशता में ,
कुछ सरकारी नौकरी की परेशानी में ,
तुम तक नहीं आ पाया
तुम्हारी मृत्यु से पहले ,
तुम्हारी चरण रज लेने।
पश्चात ,
मैं सम्पूर्ण श्राद्ध खत्म होने तक
नहीं रोया , या , चुपके - चुपके रोया ,
जाने लोगों ने क्या - क्या कहा ,
अपने भी , पराये भी ।
मैं लौट आया वापस
नौकरी की ठौर।
पर , मैं एक दिन रोया ,
जार - जार रोया ,
जोर - जोर से रोया ,
वहाँ कोई नहीं था
मेरा रुदन सुनने वाला ,
वह था एक सपाट मैदान ,
निपट निर्जन ,
शाम का धुँधलका ,
टिमटिमाते जुगनू ,
पर ,
तुम थे मेरे पास , तब ,
जब मैं सचमुच रोया।
तुम अब भी मेरे पास हो ,
नहीं हो मेरे सामने ,
किन्तु , मेरी आँखों में ,
मेरे मन में ,
मेरे ह्रदय में।
तुम कब हुए जुदा मुझसे !
मैं नहीं जान पाया ,
मुझे अब भी
महसूस होता है
तुम्हारा स्पर्श ,
तुम्हारे गोद की खुशबू
अब भी मेरी श्वासों में है ,
नहीं भूल पाया मैं
तुम्हारा प्यार ,
तुम्हारा दुलार ,
मेरा मचलना ,
" ठीक होली के दिन
मेरे लिए ,
वह पीतल की पिचकारी
ला कर देना ,
जिससे एक ही बार में
सहस्त्रों धाराओं के
फव्वारों का निकलना ,
कितनी यादें
साथ - साथ चलती हैं मेरे ,
तुम हो ,
क्योंकि , तुम अब भी
मेरे साथ हो ,
पल , हर पल ,
कदम दर कदम।
Monday, August 29, 2016
शायद तुम लौट आओगे
शायद तुम लौट आओगे अपनी भूल जान कर ,
शायद मेरा ख्याल आ गया होगा किसी मोड़ पर ,
पर तुम नहीं आये , बीत गया उदासा पहर ,
पाँव मेरे ठिठके , लौटा न सकी तुम्हें घर ।
शायद तुम लौट आओगे बच्चों के पास ,
उन्हें फिर से प्यार करने , उन्हें याद कर ,
तुम नहीं आये , मैं लौट आई , पिता के घर ,
एक बार फिर वृद्ध पिता के कमजोर कंधो पर।
तुम ,वही रंभा , मेनका , उर्वशी में लिपटे रहे ,
छोड़ नहीं पाए तुम अँगूर की बेटी का साथ ,
मैं रोज तुम्हें समझाती , गिड़गिड़ाती ,
पर , नहीं हुआ कभी भी तुम पर कोई असर।
रोज रात को देर से घर आना , लड़ना - झगड़ना ,
फिर वही तमाशा , मुझे बेधती पड़ोसियों की नजर ,
उस रात तो हद हो गई , जब तुमने मेरे साथ - साथ ,
कर दिया अपने ही बच्चों को भी घर से बाहर।
मैं अब भी तुम्हारे नाम का सिन्दूर ,
माँग में सजाये लड़ रही अपने आप से ,
शायद तुम्हारा ज़मीर लौट आये कभी ,
मुझे मुक्ति मिल जाए इस काले अभिशाप से।
तुम्हारी बेटी अब बहुत बड़ी हो गई है ,
ताड़ सी लंबी और ताड़ सी ही पतली ,
बेटे के मन में है क्षोभ और आक्रोश भी ,
नहीं बोलता है वह कुछ ,कहता चुप ही भली।
नहीं होने दिया है उजागर अपने दर्द को ,
ज़माना पढ़ ना ले चेहरा ,मुस्कुराती हूँ ,
शायद लौट आओ तुम उस गली को छोड़ कर ,
इसीलिये अँधेरी राह पर दिये जलाती हूँ।
बावजूद इसके , मैं खड़ी हूँ अडिगता से ,
हार गई है तुम्हारी पुरुषात्मक सत्ता ,
इसी हार की खीज से तुम बर्बर हो गए हो ,
करते , अँधेरे में , अकेले में छिप कर घात।
मैंने तोड़ दी हैं तमाम वर्जनाओं को ,
लाँघ लिया है मैंने आकाश , परबत , नदियाँ ,
तुम भले ठुकराते रहो , मैं नहीं हारूँगी ,
किसी भी डगर , किसी भी मोड़ , किसी सरहद पर।
शायद मेरा ख्याल आ गया होगा किसी मोड़ पर ,
पर तुम नहीं आये , बीत गया उदासा पहर ,
पाँव मेरे ठिठके , लौटा न सकी तुम्हें घर ।
शायद तुम लौट आओगे बच्चों के पास ,
उन्हें फिर से प्यार करने , उन्हें याद कर ,
तुम नहीं आये , मैं लौट आई , पिता के घर ,
एक बार फिर वृद्ध पिता के कमजोर कंधो पर।
तुम ,वही रंभा , मेनका , उर्वशी में लिपटे रहे ,
छोड़ नहीं पाए तुम अँगूर की बेटी का साथ ,
मैं रोज तुम्हें समझाती , गिड़गिड़ाती ,
पर , नहीं हुआ कभी भी तुम पर कोई असर।
रोज रात को देर से घर आना , लड़ना - झगड़ना ,
फिर वही तमाशा , मुझे बेधती पड़ोसियों की नजर ,
उस रात तो हद हो गई , जब तुमने मेरे साथ - साथ ,
कर दिया अपने ही बच्चों को भी घर से बाहर।
मैं अब भी तुम्हारे नाम का सिन्दूर ,
माँग में सजाये लड़ रही अपने आप से ,
शायद तुम्हारा ज़मीर लौट आये कभी ,
मुझे मुक्ति मिल जाए इस काले अभिशाप से।
तुम्हारी बेटी अब बहुत बड़ी हो गई है ,
ताड़ सी लंबी और ताड़ सी ही पतली ,
बेटे के मन में है क्षोभ और आक्रोश भी ,
नहीं बोलता है वह कुछ ,कहता चुप ही भली।
नहीं होने दिया है उजागर अपने दर्द को ,
ज़माना पढ़ ना ले चेहरा ,मुस्कुराती हूँ ,
शायद लौट आओ तुम उस गली को छोड़ कर ,
इसीलिये अँधेरी राह पर दिये जलाती हूँ।
बावजूद इसके , मैं खड़ी हूँ अडिगता से ,
हार गई है तुम्हारी पुरुषात्मक सत्ता ,
इसी हार की खीज से तुम बर्बर हो गए हो ,
करते , अँधेरे में , अकेले में छिप कर घात।
मैंने तोड़ दी हैं तमाम वर्जनाओं को ,
लाँघ लिया है मैंने आकाश , परबत , नदियाँ ,
तुम भले ठुकराते रहो , मैं नहीं हारूँगी ,
किसी भी डगर , किसी भी मोड़ , किसी सरहद पर।
Monday, August 15, 2016
बड़ों का सम्मान
हे प्रभु !हमको दो ऐसा वरदान ,
हम कर सकें बुजुर्गों का सम्मान।
पकड़ ऊँगली चलना सिखलाया ,
गलत सही का , है भेद बताया ,
अपनी सारी शक्ति जिन्होंने ,
हम सब के हित में है लगाया ,
अपनी बुद्धि , कला , कौशल से ,
देश , समाज , परिवार सजाया।
गरीब , अमीर , शिक्षित , अशिक्षित ,
सब ने मिल कर यह देश बनाया।
ऐसे माननीय लोगों का ,
करें ना हम अपमान कभी ,
ना हो कष्ट इनको कोई भी ,
इनका रखें ध्यान सभी ,
सम्मान करेंगे यदि बड़ों का ,
पायेंगे हम आशीष सभी ,
नींव सहेज कर यदि रखेंगे ,
सुन्दर दिखेगा भवन तभी।
हम कर सकें बुजुर्गों का सम्मान।
पकड़ ऊँगली चलना सिखलाया ,
गलत सही का , है भेद बताया ,
अपनी सारी शक्ति जिन्होंने ,
हम सब के हित में है लगाया ,
अपनी बुद्धि , कला , कौशल से ,
देश , समाज , परिवार सजाया।
गरीब , अमीर , शिक्षित , अशिक्षित ,
सब ने मिल कर यह देश बनाया।
ऐसे माननीय लोगों का ,
करें ना हम अपमान कभी ,
ना हो कष्ट इनको कोई भी ,
इनका रखें ध्यान सभी ,
सम्मान करेंगे यदि बड़ों का ,
पायेंगे हम आशीष सभी ,
नींव सहेज कर यदि रखेंगे ,
सुन्दर दिखेगा भवन तभी।
Saturday, August 6, 2016
" शर्म " - ' बेशर्म '
भाई , आप मुझ कविता सुनाने कहते हैं ,
कविता सुनना मुझे अच्छा लगता है ,
लोग कविता सुनाते हैं ,
लोग ताली बजाते हैं ,
हम भी कविता सुनते हैं ,
सब को देख कर ,
हम भी ताली बजाते हैं ,
वैसे ताली बजाने में कुछ भी नहीं रखा है ,
बोर कविता पर भी ,
कवियों को ताली बजाते देखा है।
मुझे कविता नहीं आती ,
न लिखना , न पढ़ना ,
गो कि , काला अक्षर भैंस बराबर ,
लेकिन , चूंकि आप कह रहे हैं ,
कुछ जिद भी कर रहे हैं ,
तो , आईये , मैं कविता तो नहीं ,
एक वाकया सुनाता हूँ ,
और इसे ही ,
अपनी कविता बताना चाहता हूँ।
ताली बजाना कोई जरूरी नहीं है ,
क्योंकि यह एक किस्सा है ,
जीवन का एक हिस्सा है।
एक दिन मेरे एक प्रिय मित्र ने
मुझ से पूछा -
भाई , ' शर्म ' क्या होता है ?
और
" बेशर्मी " क्या होती है ?
प्रश्न सुनकर मैं अचकचाया ,
पहले तो मेरी समझ में कुछ नहीं आया ,
दिमाग पर जोर लगाया ,
अपनी भैंस वाली बुद्धी में
जो कुछ आया , उन्हें बताया ,
और एक ज्वलंत किस्सा सुनाया।
किस्सा यूँ है कि
तमाम अखबारों और न्यूज़चैनलों में
एक दिन एक समाचार आया -
एक शहर के जनपथ ( हाईवे ) पर
अपहरण और फिर
माँ - बेटी के साथ .......
दूसरे दिन एक मंत्री जी का बयान आया -
" राजनितिक साजिस "
तीसरे दिन फिर
एक अन्य मंत्री जी ने फरमाया -
यही घटना पहले वाले मंत्री जी के
घरवालों के साथ होती तो ?
' अमर्यादित भाषा ' ।
भाई , हाईवे पर जो कुछ हुआ
वह है " शर्म "
और , बाद में जो कुछ हुआ ,
वह है " बेशर्मी "
अमर्यादित भाषाएँ भी
' बेशर्म ' की श्रेणी में होती हैं।
' शर्म ' और ' बेशर्म ' की तमीज
अब किसी में नहीं रह गई है ,
क्या पढ़े , क्या अनपढ़े ,
क्या बड़े क्या छोटे ,
क्या संतरी क्या मन्त्री ,
इस कुकृत्य में शामिल हो
केवल " गंगा " को ही नहीं
अपितु , सम्पूर्ण वातावरण को
प्रदूषित कर रहे हैं ,
ऐसे में " गंगा " की सफाई क्या ख़ाक होगी ?
स्कूल हो या कॉलेज , होटल हो या घर ,
बाजार या मॉल ,
खेल का मैदान हो या दफ्तर ,
ट्रेन हो या हवाई जहाज ,
हर रोज चीखें उठती हैं ,
गाँव -गली , हर घर - हर शहर ,
सभी सहमें हैं ,
कोई ' गौ रक्षा ' के नाम पर ,
तो कहीं जातिवाद के नाम पर ,
अमानवीय यातनाएं दे रहा है ,
जिन्हें आप देख - सुन कर भी
नहीं देखते ,
कहीं नंगा कर उनके खुले जिस्म पर
सोटियां बरसाते हैं ,
कहीं नंगे कोमल तलवों पर
प्रहार करते हैं ,
मानो
मरे हुए मवेशियों के खाल उतारने के
काम का जिम्मा जिनका था
उनसे , उनका हक़ छीन कर
ये धर्म और समाज के तथाकथित उद्धारक,
जीवित लोगों की चमड़ी उधेरने में लग गए हैं।
यह शर्म ही नहीं , अति शर्म की बात है
और उससे भी इतर
इन दुर्घटनाओं पर राजनीति
' बेशर्मी ' की हद की बात है।
ऐसी हर वीभत्स
घटनाओं - दुर्घटनाओं पर
सभी राजनीतिक पार्टियों का,
पीड़ितास्थल पर,
एक - एक कर जमावड़ा,
और पीड़ित -पीड़िता के
अस्मत को तार -तार करते ,
उसके दग्ध ह्रदय के
जख्मकी धधकती आग पर ,
अपनी - अपनी
राजनितिक रोटियाँ सेंकना भी
बेशर्मी की पराकाष्ठा नहीं , तो
और क्या है ?
अन्यथा , नहीं तो ,
ऐसी घटनाओं की पुनरावृति नहीं होती।
भाई ,यहाँ तो , न उम्र देखते , न जाति ,
सभी एक ही जूठन पर पिल पड़ते हैं।
कानून भी कभी - कभी
उघेड़ती है बखिया ,
इन दग्ध पीड़ितों की ,
जो , रहा - सहा कसर बाँकी रह जाता है ,
उसे पूरी करता है ' मानवाधिकार आयोग ' ,
पीड़ितों का मानसिक शल्य - क्रिया कर ,
जो जख़्म सूखने को है ,
उसमें वे " स्पीरिट " डाल कर रखते हैं जिन्दा ,
ताकि वे , कह सकें -
हमने भी काम किया है।
क्या ये कानूनी प्रक्रियायें
बिना शोर - शराबे के नहीं हो सकतीं ?
मेरी समझ में ' शर्म ' और बेशर्मी को
किसी और तरीके से
परिभाषित नहीं किया जा सकता।
आप ही बताइये -
क्या आपके पास भी
कोई नई परिभाषा है क्या ?
किस्सा यहीं करते हैं समाप्त ,
आप ताली बजाइये या नहीं ,
पर यह तो सोचिये
समाज कहाँ जा रहा है ?
और ,
जहाँ जिस गर्त में जा रहा है
उससे उबरने का रास्ता बताइये।
उससे उबरने का ........
विजय कुमार सिन्हा " तरुण "
डी - 40 , रेस कोर्स , देहरादून।
( उत्तराखण्ड )
पिन - 248001
कविता सुनना मुझे अच्छा लगता है ,
लोग कविता सुनाते हैं ,
लोग ताली बजाते हैं ,
हम भी कविता सुनते हैं ,
सब को देख कर ,
हम भी ताली बजाते हैं ,
वैसे ताली बजाने में कुछ भी नहीं रखा है ,
बोर कविता पर भी ,
कवियों को ताली बजाते देखा है।
मुझे कविता नहीं आती ,
न लिखना , न पढ़ना ,
गो कि , काला अक्षर भैंस बराबर ,
लेकिन , चूंकि आप कह रहे हैं ,
कुछ जिद भी कर रहे हैं ,
तो , आईये , मैं कविता तो नहीं ,
एक वाकया सुनाता हूँ ,
और इसे ही ,
अपनी कविता बताना चाहता हूँ।
ताली बजाना कोई जरूरी नहीं है ,
क्योंकि यह एक किस्सा है ,
जीवन का एक हिस्सा है।
एक दिन मेरे एक प्रिय मित्र ने
मुझ से पूछा -
भाई , ' शर्म ' क्या होता है ?
और
" बेशर्मी " क्या होती है ?
प्रश्न सुनकर मैं अचकचाया ,
पहले तो मेरी समझ में कुछ नहीं आया ,
दिमाग पर जोर लगाया ,
अपनी भैंस वाली बुद्धी में
जो कुछ आया , उन्हें बताया ,
और एक ज्वलंत किस्सा सुनाया।
किस्सा यूँ है कि
तमाम अखबारों और न्यूज़चैनलों में
एक दिन एक समाचार आया -
एक शहर के जनपथ ( हाईवे ) पर
अपहरण और फिर
माँ - बेटी के साथ .......
दूसरे दिन एक मंत्री जी का बयान आया -
" राजनितिक साजिस "
तीसरे दिन फिर
एक अन्य मंत्री जी ने फरमाया -
यही घटना पहले वाले मंत्री जी के
घरवालों के साथ होती तो ?
' अमर्यादित भाषा ' ।
भाई , हाईवे पर जो कुछ हुआ
वह है " शर्म "
और , बाद में जो कुछ हुआ ,
वह है " बेशर्मी "
अमर्यादित भाषाएँ भी
' बेशर्म ' की श्रेणी में होती हैं।
' शर्म ' और ' बेशर्म ' की तमीज
अब किसी में नहीं रह गई है ,
क्या पढ़े , क्या अनपढ़े ,
क्या बड़े क्या छोटे ,
क्या संतरी क्या मन्त्री ,
इस कुकृत्य में शामिल हो
केवल " गंगा " को ही नहीं
अपितु , सम्पूर्ण वातावरण को
प्रदूषित कर रहे हैं ,
ऐसे में " गंगा " की सफाई क्या ख़ाक होगी ?
स्कूल हो या कॉलेज , होटल हो या घर ,
बाजार या मॉल ,
खेल का मैदान हो या दफ्तर ,
ट्रेन हो या हवाई जहाज ,
हर रोज चीखें उठती हैं ,
गाँव -गली , हर घर - हर शहर ,
सभी सहमें हैं ,
कोई ' गौ रक्षा ' के नाम पर ,
तो कहीं जातिवाद के नाम पर ,
अमानवीय यातनाएं दे रहा है ,
जिन्हें आप देख - सुन कर भी
नहीं देखते ,
कहीं नंगा कर उनके खुले जिस्म पर
सोटियां बरसाते हैं ,
कहीं नंगे कोमल तलवों पर
प्रहार करते हैं ,
मानो
मरे हुए मवेशियों के खाल उतारने के
काम का जिम्मा जिनका था
उनसे , उनका हक़ छीन कर
ये धर्म और समाज के तथाकथित उद्धारक,
जीवित लोगों की चमड़ी उधेरने में लग गए हैं।
यह शर्म ही नहीं , अति शर्म की बात है
और उससे भी इतर
इन दुर्घटनाओं पर राजनीति
' बेशर्मी ' की हद की बात है।
ऐसी हर वीभत्स
घटनाओं - दुर्घटनाओं पर
सभी राजनीतिक पार्टियों का,
पीड़ितास्थल पर,
एक - एक कर जमावड़ा,
और पीड़ित -पीड़िता के
अस्मत को तार -तार करते ,
उसके दग्ध ह्रदय के
जख्मकी धधकती आग पर ,
अपनी - अपनी
राजनितिक रोटियाँ सेंकना भी
बेशर्मी की पराकाष्ठा नहीं , तो
और क्या है ?
अन्यथा , नहीं तो ,
ऐसी घटनाओं की पुनरावृति नहीं होती।
भाई ,यहाँ तो , न उम्र देखते , न जाति ,
सभी एक ही जूठन पर पिल पड़ते हैं।
कानून भी कभी - कभी
उघेड़ती है बखिया ,
इन दग्ध पीड़ितों की ,
जो , रहा - सहा कसर बाँकी रह जाता है ,
उसे पूरी करता है ' मानवाधिकार आयोग ' ,
पीड़ितों का मानसिक शल्य - क्रिया कर ,
जो जख़्म सूखने को है ,
उसमें वे " स्पीरिट " डाल कर रखते हैं जिन्दा ,
ताकि वे , कह सकें -
हमने भी काम किया है।
क्या ये कानूनी प्रक्रियायें
बिना शोर - शराबे के नहीं हो सकतीं ?
मेरी समझ में ' शर्म ' और बेशर्मी को
किसी और तरीके से
परिभाषित नहीं किया जा सकता।
आप ही बताइये -
क्या आपके पास भी
कोई नई परिभाषा है क्या ?
किस्सा यहीं करते हैं समाप्त ,
आप ताली बजाइये या नहीं ,
पर यह तो सोचिये
समाज कहाँ जा रहा है ?
और ,
जहाँ जिस गर्त में जा रहा है
उससे उबरने का रास्ता बताइये।
उससे उबरने का ........
विजय कुमार सिन्हा " तरुण "
डी - 40 , रेस कोर्स , देहरादून।
( उत्तराखण्ड )
पिन - 248001
Thursday, July 28, 2016
चलो चलो हम पेड़ लगायें
चलो चलो हम पेड़ लगायें ,
हरा - भरा संसार बनायें ,
कुसुम खिले पर्वत पर्वत पर ,
नदियाँ सब जल से भर जायें।
जब वर्षा की ऋतु आ जाये ,
घन भी बरस - बरस कर जाये ,
खेत और खलिहानों में अब ,
पौध धान की हैं मुस्काये।
खुशहाली जग में छा जाये ,
तुम मुस्काओ , हम मुस्कायें ,
शुद्ध हवा में साँस ले सकें ,
पेड़ लगायें , पेड़ लगायें।
चलो चलो हम पेड़ लगायें,
हरा - भरा संसार बनायें।
हरा - भरा संसार बनायें ,
कुसुम खिले पर्वत पर्वत पर ,
नदियाँ सब जल से भर जायें।
जब वर्षा की ऋतु आ जाये ,
घन भी बरस - बरस कर जाये ,
खेत और खलिहानों में अब ,
पौध धान की हैं मुस्काये।
खुशहाली जग में छा जाये ,
तुम मुस्काओ , हम मुस्कायें ,
शुद्ध हवा में साँस ले सकें ,
पेड़ लगायें , पेड़ लगायें।
चलो चलो हम पेड़ लगायें,
हरा - भरा संसार बनायें।
Saturday, July 23, 2016
जब से सावन
जब से सावन उमड़ के आया है ,
रूप धरती का है सँवरने लगा ,
हर तरफ छा रही है हरियाली ,
जैसे बादल से अप्सरा आई।
साल सोलहवाँ जो लगा आकर ,
रंग गोरी का है निखरने लगा ,
जैसे सावन के चाँदनी की हँसी ,
तन-वदन गोरी का है हँसने लगा।
रूपसी भी हैं अब लगी सजने ,
हाथ में मेंहदियाँ लगी रचने ,
लग गए डालियों पे झूले हैं ,
कृष्ण की बाँसुरी लगी बजने।
मोर भी हैं नाचने लगे वन में
जब से काली घटाएँ छाईं हैं ,
बज उठी घंटियाँ हैं मन्दिर में ,
भोले बाबा की याद आई है ।
रूप धरती का है सँवरने लगा ,
हर तरफ छा रही है हरियाली ,
जैसे बादल से अप्सरा आई।
साल सोलहवाँ जो लगा आकर ,
रंग गोरी का है निखरने लगा ,
जैसे सावन के चाँदनी की हँसी ,
तन-वदन गोरी का है हँसने लगा।
रूपसी भी हैं अब लगी सजने ,
हाथ में मेंहदियाँ लगी रचने ,
लग गए डालियों पे झूले हैं ,
कृष्ण की बाँसुरी लगी बजने।
मोर भी हैं नाचने लगे वन में
जब से काली घटाएँ छाईं हैं ,
बज उठी घंटियाँ हैं मन्दिर में ,
भोले बाबा की याद आई है ।
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