Sunday, May 5, 2013

भारत की वह नारी थी

खूब    लड़ी    थी    लड़की    वह   तो
सचमुच       झाँसी       रानी        थी    ,
हमने    सर्द     हवाओं      के    मुख 
उसकी      सुनी       कहानी       थी      ।

एक    अकेली     लड़ी    आठ     से
फिर    भी    सब   पर    भारी    थी     ,
थी    साहस   व   शौर्य   की    देवी 
भारत     की     वह     नारी      थी     ।   

गली   -  गली  ,  हर    सड़कों    पर  
चौक        और        चौराहों       पर      ,
दुर्योधन      सम      अधम      खड़े
यहाँ      मिलते     हर    राहों    पर       ।

युग -   युग   से    ही  सदा   द्रौपदी
सड़क   बीच   विवस्त्र    की   जाती     ,
ध्रितराष्ट्र    सब     बन     जाते   हैं
धर्मराज      की   हार    ही      होती     ।

शाशन     गूंगा     हो     जाता    है 
न्याय   देर  का   बिक  जाता    है       ,
जनता   की     परवाह    किसे   है
सत्ता    सुख    भोगा    जाता   है     ।

इन     भोगी      सत्ताधारी      के
मृत     हो    चुके    आत्मा       के      ,
दिल    में    आग    जलाना      है
नैतिक       पाठ      पढ़ाना       है     ।   

Saturday, May 4, 2013

नारी




       अबला  कह  करके  नारी  का , मत  करना  अपमान  कभी ,
       बिन नारी के जग  में  नर की , है  कोई  भी  पहचान   नहीं  ।

      नारी बिन तो नर  आधा  है , नारी  ने  नर  को  साधा   है     , 
       त्याग , तपस्या और प्यार  की , वह तो मोहन की राधा है     ।

      गंगा सी  निर्मल  है नारी , और  वज्र  की  भाँती  कठोर    ,
      दिल में ममता की सरिता  है , प्रीति  बाँटती  है चहुँओर   ।

      चाहे वह मजदूरिन हो,  या, हो तोड़ती पत्थर नारी ,
      ममता की मूरत है , पर है , नहीं किसी से कमतर नारी।

      चीड़ हवा के सीने को ,नभ में उड़ान भरती है नारी ,
      साहस , शौर्य , पराक्रम की भी , देवी होती है यह नारी।

       दुश्मन भी  गर आन पड़े , बन जाती तलवार है नारी ,
       लाँघ पहाड़ों की चोटी , छू लेती आकाश है नारी।

       नर का सृजन  वही  करती  है, है पयपान  कराती  नारी   ,
       पाल  पोस कर बड़ा बना कर , साहस  ऊर्जा भरती  नारी  ।

       देख- देख निज  सृजन सदा  ही , मुग्ध  हुआ  करती  है नारी  ,
       जीवन  में इक नेह  छोड़  कर , नहीं   माँगती  कुछ  भी  नारी  ।
  
       छूता  है अभिमान न उसको , न्योछावर  जीवन  कर  जाती   ,
       देश  प्रेम , परिवार प्रेम में , सब  कुछ त्याग अमर  हो जाती ।

      अति कोमल है , भावप्रवण  है , करुणा  का  सागर  है  नारी  ,
      जब  रक्षा का  प्रश्न  खड़ा हो , बन जाती असि धार है  नारी  ।

      देवी  भी है , दुर्गा  भी  है ,  है  रणचंडी  भी    यह     नारी   ,
      सरस्वती  सी वाणी इसकी , प्रकृति  का  सौंदर्य है  नारी   ।

      नहीं सबल नारी  के जैसा , जग  में  कोई  सबल  हुआ   है  ,
      दानशील नारी  के  जैसा  , जग  में  कोई   नहीं    हुआ   है ।

      नारी ने निज कोख  से  सदा , वीरों को  ही जन्म  दिया   है  ,
      हँसते - हँसते देश के लिये , सुत सरहद पर भेज  दिया    है  ।  

      न्योछावर कर पूत देश हित , नहीं कभी भी विचलित  होती  ,
      बलि वेदी  पर भेज तनय  को , नहीं  वीर  माता  है  रोती   ।

     निज  अदम्य  साहस  के , इतिहास  अमर  रचती  है  नारी   ,
      कभी टेरेसा , निवेदिता  व  कभी   लक्ष्मी  बन  जाती  नारी  ।

     कहीं  कोकिला  बन जाती  है , कहीं  लता  बन   झूमे  नारी  ,
     कहीं " कल्पना " की पाँखो  पर , छू लेती आकाश  है  नारी  ।

    होती  नहीं  अगर  नारी  तो ,  प्रकृति   का   श्रृंगार  न   होता ,
    होता  नहीं  असीम  गगन  यह  , वैभवपूर्ण संसार न  होता ।

    झील और  नदियाँ  ना  होतीं ,  ना  यह  पर्वतराज  ही   होता  ,
    हिम शिखरों पर रजत - पुंज से , हिम  का यह अंबार न होता  ।

    होती  नहीं  अगर  नारी   तो   ,  पुष्पों   में   सौरभ   न   होता    ,
    नंदन   कानन  कहीं  न  होता ,  शीतल  मंद  समीर  न  होता    ।

    नारी अगर नहीं  होती  तो , धर्म - अधर्म  का  मर्म  न होता  ,
    नहीं जन्म  का , नहीं मरण  का ,जीवन  कोई  कर्म न होता ।

    नारी भोग्या नहीं अरे ! यह  ,  पूज्या  है  जग - जननी   नारी   ,
    दिव्य अप्सरा देव लोक की   ,  मनोहारिणी   है    यह     नारी   ।

     नारी  है  तो  घर  देवालय  , घर  की  लक्ष्मी  होती   नारी    ,
     केवल  आदर , प्यार  और , सम्मान चाहती  है  हर  नारी   ।

     पत्नी  बन  अपने  प्रियतम  पर  , संचित  प्यार लुटाती नारी  ,
     आत्मशक्ति से हो परिपूरित  ,  है  हर  संबंध  निभाती   नारी  ।

     नानी , दादी , माता , बहना  , बन  कर स्नेह  लुटाती   नारी  ,
     मौसी, मामी , ताई  , चाची  ,  बन  कर  गले  लगाती   नारी  ।

     सच  है यह  इस जग  में  नर का , भाग्य , नारी ही लिखती  है ,
     नहीं  चाँदनी  बिना  चाँद  की , कोई , काया   ही  होती   है  ।

     नारी  ही  वह  शक्ति - पुंज  है , नर  में  साहस  भर  देती  है  ,
     चाहे तो दे भेज  नरक  , या  ,  चन्दन  सा  महका   देती    है ।

     नारी अगर नहीं  होती  तो , महापुरुष  कोई  ना  होता  ,
     होता ना कोई वीर  यहाँ , न , इतिहास  वीरों  का  होता ।

     अमर त्याग हाड़ा  रानी  का ,  चूड़ावत  का  नाम  न  होता   ,
      ना  होती  ज्वाला  जौहर  की , राजस्थान  सुधाम  न  होता  ।

     गर  ना होती  वह  शकुन्तला ,  भारत  वीर  भरत  ना   होता  ,
     त्यागमयी  वह  माँ  ना  होती , चन्द्रगुप्त  सम्राट  ना  होता  ।

     पन्ना  धाई  ना  होती  गर ,  ' राणा ' का यशगान न  होता   ,(  उदय सिंह राणा )
     जीजाबाई न होती गर , वीर शिवा का नाम न होता   ।

      यशोधरा का त्याग  ना होता , तो सिद्धार्थ ' बुद्ध ' न होते ,
      ' उर्मि ' का जो त्याग ना होता , ' लक्ष्मण ' फिर ' लक्ष्मण ' ना होते ।

       नहीं सुजाता खीर खिलाती , नहीं बुद्ध को सिद्धी मिलती ,
       ना ही बिना आम्रपाली के ,  जग में नाम अमर हो पाते  ।

       विद्यावती  नहीं  होती  तो , भगत  सिंह  फौलाद ना  होता   ,
        ना   होती  जगरानी  देवी    , चन्द्रशेखर   आज़ाद  न   होता  ।

        होती  यदि  मुमताज़  नहीं   तो  , शाहज़हाँ  का ताज़  न  होता   ,
        शरद  चन्द्र  इर्ष्या  करता  क्यों  , ताज़महल विख्यात  न होता  ।

         रत्ना  जैसी  नारि  न  होती  ,  तुलसीदास अमर  ना  होते   ,
         ना  तो मिलते राम  ही उन्हें , ना  ही  वे रामायण लिखते  ।

         कौशल्या , कैकेई  न  होती ,    और    सुमित्रा  जैसी    माता   ,
         राम लखन ना होते  जग  में , भाई ,  भरत  समान  न  होता  ।

         जनक  दुलारी सिया न  होती , रावण अजर - अमर हो जाता  ,
         होती नहीं यशोदा यदि  तो  ,  कभी  कंस  का  अंत   न   होता  ।

         न  होती  यदि  देवकी  माता  , वंशीधर  का  जन्म  ना  होता   ,
         ना  होती  देवी - दुर्गा  ही  , कंसों  का  फिर  अंत  न   होता   ।  

         कुंती होती  नहीं  धरा  पर  , पार्थ-कर्ण  का  नाम  ना  होता   ,
         द्रुपद- पुत्रि  का जन्म  ना  होता , कौरव  का संहार ना होता  ।

         पुतलीबाई अगर न  होती  ,  मोहनदास   प्रगट   ना   होते  ,
         कस्तूरबा  नहीं  होती  तो  ,   बापू  फिर    बापू    ना   होते  ।

         होती  नहीं  अगर  सावित्री  ,  सत्यवान  फिर  लौट  न  आता   ,
         नारी के तप-त्याग शक्ति  का , इस  जग में आभास न  होता  ।

         ये  तो  सभी  नारियां  ही  थीं  , रत्नों को  ही  जन्म  दिया   है  ,
         क्यों  करता अपमान नारि  का , जिसने  इतना  मान दिया है ।
  
         नारि  अग्नि है , ज्वाला भी  है , दीप - स्तम्भ   भी  है यह नारी   ,
         यह शीतल चन्द्र किरण सी है , जब  जाग जाय  है चिनगारी   ।

         मूरख  मन  तू  मत  कुरेद  उन  , ठंढी  राख  की  ढेरों   को   ,
         जल  जाएगा  सब  कुछ   तेरा  ,  तू , दे  न हवा अंगारों  को  ।

         मत कर  ह्त्या  कन्या  भ्रूण  की , अपना भाग्य ना  खोटा  कर   ,
         फूल हैं  ये , खिलने  दे  इनको    , जीवन  इनका  तू  नष्ट  न  कर  ।

         नर  है नहीं , नराधम   है , जो  , नारी  को   सम्मान   न   देता  ,
         नारी का अपमान  जो  करता   , किस्मत उसका साथ न  देता  ।

         नारी  गंगा  सम  निर्मल  है , सब  पापों   को   धो   देती    है  ,
         क्षण  में  वही  उठा  देती  है  , क्षण  में   वही  गिरा  देती    है ।  

         त्याग , तपस्या , बलिदानों की , अमर कहानी है यह नारी ,
        सकल विश्व की सृष्टी रूपा , पूजित होती है यह नारी ।
           

Wednesday, May 1, 2013

मैं बबूल का फूल



                          

 जाने     क्यों      जग       मुझ       से      रूठा       ही       रहता     ,
जाने     क्यों       मुझसे       कोई       प्यार        नहीं      करता     ।
कलि    गुलाब     की     नहीं   ,    मैं    बेनी    में     गुँथ     जाऊं     ,
चम्पा     या     चमेली      बेली   ,    गजरों     में    बिंध     जाऊं     ।
है    सुगंध    भी    नहीं   ,   किसी    करतल   पर    बिछ    जाऊं     ,
ना    ही    ऐसे    अधर   ,    सुघर     अधरों    से     लग     जाऊं     ।  
मैं       बबूल       का       फूल     सदा     काँटे      रहा      चुभाता    ,
संभव     है    कि     इसी     वजह   से   जग     मुझसे   कतराता    ।
इस     जग     के     हर    फूलों     को   ,    हमने     देखा    हँसते    ,
अपनी      ही     आँखों       में      मैंने      देखा     आँसू     तरते    
फिर   जन्म   न   हो   धरती   पर   ,   ईश    दया    तुम    करना    ,
जीवन     ही     देना     हो     तो     ,    काँटे    तुम    ना       देना    ।
देवों    के    सिर    चढूं    ,   और    गजरों      में      बिंध     जाऊं     ,
या    नन्हे    कोमल     हथेलियों     पर    चढ़     कर     मुस्काऊं    ।
काँटे     ही    देना    हो     तो   ,    यूँ      ही     फेंक     न     देना      ,
अरि    आयें     जिस    ओर    ,   वहीं  ,  मुझको    बिखरा   देना     ।
जहाँ    देश    की     रक्षा    हित   ,   नौजवान      लड़ते          हों       ,
माँ   के   दूध   की   रक्षा   हित    ,   जीवन   अर्पित    करते     हों       ,
जहाँ    गोलियां   चलती   हों   ,   तोप   गरजते   हों   पल  -  पल     ,
ओढ़    धूल    का    कफ़न   , वहीँ  ,   मुझको    सो   जाने     देना    ।   

(     1966    की     रचना       )


                              
 

Tuesday, April 30, 2013

यमुना की फुफकार

ताज    है    मुमताज़       का       साज    ,
ताज    है      शाहजहाँ       का       नाज    ,
ताज    में     शाहजहाँ       का      प्यार     ,
अमर     यह       प्यार      का    उपहार    ।

ताज      में     जीवित      है    मुमताज    ,
ताज      में      जीवित           शाहजहाँ    ,
ताज      के      पत्थर    में    है     प्राण    ,
ताज       दो     प्राणों    का    है     प्राण    ।

बाहें       हैं       इसके      खम्भे     चार     ,
दो     बदन     मिले  ,   हो      एकाकार    ,
है    अनुपम    यह    कृति   प्यार    की    ,
प्यार       हुआ      सचमुच        साकार    ।

प्यार     के     जल     से    वर्षों     सींच    ,
रखा    है     जनमानस      के        बीच    ,

रूक      कर      दुहरा    लो     इतिहास     ,
प्यार    की    ऐसी        होती      प्यास     ,
न     बुझती       पीने   से    एक    घूँट      ,
प्यार     का    बंधन       बहुत    अटूट       । 

शरद     के    नभ     का     पूरा    चाँद      ,
उतर     जब      आता       छूने    ताज      , 
उर्वसी       को     भी     आती      लाज      ,
देवगण       जलने      लगते       आज      ।

अलौकिक     किसका     है   यह    रूप      ,
अलौकिक     किसकी    यह    पहचान      ,
कौन     मलिका      सोई     है     आज       , 
ताज    के    नीचे     सब    कुछ    भूल       ।
            *         *         *          *
पास      यमुना     की      चंचल    धार     ,
वक्र     सी    चलती    जिसकी     चाल     ,
सुरा     पा     लेने        को       व्याकुल    ,
छोड़    कर    बढ़    आती    तट  -  मूल    ।

उफनाती       हुई       यमुना        धार      ,
है    करती      नागिन    सी    फुफकार     ,

बहूंगी      सतत       तुम्हारे         कूल     ,
खोखला      कर   दूँगी     तेरा      मूल      ,
जहाँ     पर      इठलाता      है     आज      ,
वहाँ      पर       उड़वा      दूँगी     धूल      ।
           *       *        *        *
अरुण     के   किरणों     के   ही    संग     ,
शाख      पर       मुसकातीं     कलियाँ     ,
पवन    निज   अंक    पाश   में   बाँध      ,
झुलाता     रहता     है     पल   -  पल      ।

रवि    जब    जाता    नभ    को   छोड़    ,
शाख   से   कलि   को    तोड़  -  मरोड़    ,
गिरा     देता     चुपके      से       हाय     ,
धरा    पर    रौंदी     जाती    है    हाय     ।

कौन      सुनता      उसका       क्रंदन     ,
कौन    सुनता    है    उसकी      हाय     ,
समय   तो   जाता   सब   कुछ   भूल    ,
समय      जाएगा     तुझको       भूल   ।

(     23   -   3   -    68    की    रचना       )















   


Sunday, April 28, 2013

मीत , प्रीति के रीति न होते

बिन      काँटों      के      मीत      हमारे    
जीवन     में     संगीत       न        होते     ,
यहाँ      शमां      भी     परवाने     बिन
लगते      हैं      अति       फीके  - फीके     ।  

तट     को    चूम    अगर    लहरों     के
जीवन      प्यास     बुझा     ही     जातीं      ,
क्यों    आकुल    हो     कर    ये     लहरें   
बार   -   बार      तट      से      टकरातीं      ।

मन    की    ज्यों    न    सीमा     होती
सागर     के   ज्यों     तीर    न     होते       ,
इसी   तरह    इस   जग   में   सच   है
मीत  ,   प्रीति    के   रीति    न    होते        ।

    

Saturday, April 27, 2013

उतर आओ घटा काली




उतर     आओ     घटा       काली
जलद     बादलों       के      साथ    ,
खेतों    में   ,    इन     मेड़ों    पर
रिम - झिम    बूंद    बरसा    दो     ,
कृषक -  मन    को    हरषा    दो
सारी      भू     को    सरसा    दो     ।
चली     जाना    ,    न    रोकूँगा
मचलते    ह्रदय    को  ,   मधुर       ,
पावस      गीत      गाने       दो        ।
कृपण  क्यों  हो , लिए   जलघट  
बरस    जाओ    धरा   पर   तुम      ,
विदा     दूंगा    तुम्हें   ,   लेकिन    
दिखा    कर    ज़ाम    आँखों   को   ,
छुला   कर   मय   को    होंठों   से
हटा    लेना   ,     कहाँ      का
न्याय     है   बोलो      ?
उतर   ,   प्यासी   हुई    भू     की
तुम     प्यास     हर    लेना     ,
झुलस    जो    गये    हैं    तरुवर
उन्हें    तुम   तृप्त     कर   देना    ,
तपती   हुई     बहती     हवा   की
तपिश    हर   लेना     ,
उतर   आओ   ,  उतर    आओ     ,
उतर   आओ        ।

(    26 - 6 - 66      की    रचना    )

   
       



नर केसरी


सुमन       गंध       सा      महक       रहा       मेरा       जवाहर 
व्योम       में        रवि     रश्मियाँ    ज्यों     छिटक    रही     हैं  ,
धन्य    हीरा   ,   धन्य     मोती   ,   धन्य     वह    स्वरूपरानी
था       तेजस्वी      पूत     तेरा   ,    वह      जवाहरलाल     था   ,
जकड़ी       हुई      जंजीर        में       परतंत्रता        की           
कराह        रही    थी       जर्जरित       माता       हमारी    ,
बेड़ियों     को     तोड़ने     ही    आ    गया   सरताज  ,  वह 
नाहर     जवाहर    ,     कर   में   ले     रणभेरियाँ       तब      । 
थर्रा     उठी     थी    मही     ,    वह    महा    रणनाद     था
खोई      हुई      स्वतंत्रता      ,    का  ,  प्रचंड     हुँकार     था    ,
एकता       के     एक     ही    झटके      में     टूटी     बेड़ियाँ  
त्याग     के     ही     ताप     में     जल     गई        परतंत्रता    ।
रात    वह    थी    क्या    ख़ुशी      की   ,     सन    सैंतालिस
माह      था      अगस्त    ,  पंद्रह     की     वह   तारीख    थी    ,
हर     ओर     ही   आजादी   का   ,   तिरंगा      लहरा      उठा
हर    देशवासी     का   भी     सिर  ,   गर्व    से    ऊँचा    उठा     ।
हर   ओर   छाई   थी   ख़ुशी   ,   हर   ओर    ही   उल्लास    था 
सम्पूर्ण    भारत     देश     का  ,   नायक     जवाहरलाल    था    ,
क्रूर     सन     चौंसठ      मई     सत्ताईस      बुध्द्वार       को
सो   गया    चिर    नींद    में     नर   केसरी    नाहर     जवाहर      ।
अंक    सूना     हो   गया     है    आज     भारत      देश     का   ,
आदर्श       उसका     ,     त्याग      उसका      सामने        है    ,
हमको        नहीं         है       भूलना       उसकी        कहानी 
तुम    कभी     ना     छोड़ना    आलोक     पथ    हिन्दुस्तानी        ।

(    रचना    -     1965   ,     सहयोगी     प्रकाशन     ,     जबलपुर      से     "  जवाहर    ज्योति   "
      पुस्तक       में       प्रकाशित         )
    



Friday, April 12, 2013

इक साँवली सी लड़की ( गीत )




इक       साँवली    सी    लड़की     
इक      सुंदर       सी    लड़की
कहीं      मेरे     दिल    के     कोने    में     बैठी  ,

कभी    मुस्कुराती    कभी    खिलखिलाती
कहीं     मेरे    दिल    के  .................. 


कभी    मन    के    झूले    पर    पेंगे    लगाती
कभी   आँखों    से    ही    इशारा    वह   करती 
नहीं     कुछ     भी     कह    कर
बहुत     कुछ      है     कहती   ,
कहीं     मेरे    दिल   के ..................

है    निश्छल    सा   मन   ,  उसका     भोला    वदन    है
उसकी     हँसी     से     ये     सारा      चमन      है
कभी      तो      मचलती     कभी    रूठ        जाती
नहीं    कोई     शिकवा    कभी    वह     है    करती
कहीं      मेरे      दिल     के  .................

कभी    दूर   जब    वह     चली     जाती      मुझसे
मेरा   दिल   अलग   कर   के   ले   जाती     मुझसे
बड़े     प्यार     से     मैंने     उसको      सँभाला
कर    के    यतन     गोद     में     मैंने     पाला
बहुत    लाडली    है   ,  यह     मेरी    है    बेटी
कही     मेरे    दिल      के  .................... 



तुम कभी रोना नहीं




















जिन्दगी      के      दौर      में                                     
बाधाएं       आयेंगी        बहुत   ,
लेकिन   कभी   भी   हार   कर
तुम    हौसला    खोना     नहीं   ,
तुम     कभी      रोना      नहीं   ।  

Sunday, April 7, 2013

चाँद बांध कर ले आऊँगी




आओगे       प्रिय      अन्धकार         में    ,
दीपक       ले    कर      आ      जाऊँगी     ,
चन्द्रहीन       आकाश       अगर      हो     ,
चाँद       बांध     कर      ले      आऊँगी     ।
यदि       चले        मरुत       उन्न्चास      ,
फिर     हास   करे     ,    कर   अट्टहास      ,
राह        पवन           का         रोकूंगी      ,
आँचल           दीवार            बनाऊंगी     ।
तेरे      पथ     के     काँटों     को     मैं      ,
अपने       आँचल      भर       लाऊँगी      ,
मैं      जीवन      के     उद्गार     सभी     ,
तुझ     पर     अर्पित    कर     जाऊँगी     ।

(   29  -  2  -1968   को    रचित    )

Friday, April 5, 2013

राष्ट्रध्वजा फहरायें

                                      
                          
                    " राष्ट्रध्वजा फहरायें "
 
 आज     दिवाकर     के   रथ    पर    चढ़      किरणें     दमक     रही     हैं    ,
रक्तिम      आभा    भारत     के    कण  -  कण    में    घोल      रही     हैं    ।
चटख       पड़ी     हैं     कलियाँ       अपना      सौरभ    लुटा      रही     हैं    ,
आज़ादी     का    नया     तराना        कोकिल         सुना           रही     है    ।

पंखुड़ियों      में     लाली      भर      कर       है       गुलाब        मुस्काया     ,
सदियों      के     ही     संघर्षों      पर    यह       मीठा     सपना      पाया      ।
आज     हरष    से     हरित     हो    उठी    इस    धरती      की      काया      ,
नील       गगन        में      आज़ादी        का      झंडा       है      लहराया       ।

आओ      हम     सब     भी      मुस्कायें       इस       झंडे      के     नीचे      ,
सत्य    ,   अहिंसा     और       प्रेम     से      इस      झंडे      को     सींचें      ।
प्रण    कर     इसकी     रक्षा     का    व्रत    हमसब     को      है     लेना      ,
सदा    देश    की    रक्षा    हित  ,  है   तन  -  मन   -  धन    सब    देना      ।

लाल      रंग      पूरब       की      लाली      जागो       देश     के      वीरों     ,
लाल    देश      की      मिट्टी    है    और     लाल       खून     की    लाली     ।
श्वेत     ,    शांत   ,   सौजन्य      प्रतीक     है    हम    सब     वीरों    का     ,
हरा      रंग      है     शस्य   -   श्यामला     धरती       की       हरियाली      ।
   
गोल    चक्र     है     पहिया      रथ    का      भारत     की    धरती    का      ,
सत्य     ,    अहिंसा     और      शान्ति       का        फैलाता       संदेशा       ।
गाता    है   यह   गीत     प्रगति    का   ,   गा  -  गा    कर    कहता    है      ,
आयें     लाखों     विघ्न   ,   रुकेंगे   ,     नहीं     एक    भी   क्षण     हम      ।

आओ  ,   आया    आज    समय    ,    हम     संकल्पों     को     दुहरायें      ,
छोड़ो       बीती      बात   ,     नया      हम       हिन्दुस्तान        बनायें      ।
देश     की    सेवा     में    ही    जीवन      हम    अर्पित      कर     जायें     ,
आओ       मिलकर      आज     ,    तिरंगा       राष्ट्रध्वजा       फहरायें     ।

(  अगस्त     1 9 67    में    रचित      )



Wednesday, April 3, 2013

देश यह महान है

 आज      देश      का      नया   ,    हो      रहा     श्रृंगार      है     ,
आज     पवन      मस्त    हो   ,    गा      रहा    मल्हार     है     ,
नई       किरण    फूट     रही   ,    यह     नया    विहान     है     ,
हिमालय   का   ताज    लिये   ,    यह     हिन्दुस्तान        है     ।

गली - गली  ,  सड़क - सड़क  ,    गांव   से   शहर      तलक     ,
पहाड़       से      सिंधु     तक  ,   धरा    से   आसमान   तक     ,
भारतीय      जवान          के   ,   आन -  बान   -  मान      से     ,
तिरंगा     निज     देश     का  ,    फहर     रहा      शान     से     ।

हर     तरफ     से    आ    रही   ,   एक      ही     आवाज    है      ,
महान      है    ,   महान     है    ,    देश     यह    महान     है      । 

(    अगस्त    1967   में    रचित     ) 

हर कली अंगार हो

मचल      रही      जवानियां   ,    गा       रही       रवानियां      ,
आज     इस    भूगोल    को    ,   फेंक    दो   ,  उछाल    दो       ,
मित्र    हो    तो    प्यार   दो    ,   शत्रु     का     संहार      हो       ,
है     जमीं    का      हौसला     ,   हर    कली    अंगार     हो       ।
 
(    अगस्त     1967    में    रचित    )        

Tuesday, April 2, 2013

कैदी पंछी



ओ      पिंजरे        के       कैदी    पंछी   ,
विपद     घोर    तुम   पर    छाया    है   ,
असह्य     बंधन    असह्य      वेदना    ,
दुबली  -  पतली     क्षीण    काया   है    । 

उर     में      तेरे     अरमान         भरे      ,
पलती     उर     में    कैदी        होकर      ,
है      पाँखो       में      तूफान      भरे      ,
पिंजरे     में     है      कैदी      बनकर      ।

नील      गगन       में     उड़ते     पंछी     ,
मुक्त  ,  अबाध    कलरव     करते   हैं      ,

पर   ,   तुम     कैदी     के    पाँव    बंधे      ,
चोचों     पर    भी     हैं     शिला     धरे      ,
कि ,  गा   न   सको  तुम   कोई    गान      ,
कह  ना  पाओ  , तुम   दुःख - कल्याण     ।

रो  -  रो      मत     ओ     कैदी      पंछी     ,
इक     दिन     यह     बंधन       टूटेगा      ,
हो      आजाद      हवा      में      उड़ना      ,
मस्ती     में   ,   गा     कर      इठलाना     ।

लेते      आना       साथ     छिपा      कर    ,
पैरों          की          कड़ियाँ   -   जंजीरें    ,
ना       कोई       कैदी         हो        पाये   ,
ना       कोई     पिंजरे    में     बंध   पाये   ।

ना    बांधो        तुम     परवानों      को     ,
ना     रोको        तुम      मस्तानों    को     ,
जग     जले      भले   ही     देख  -  देख    ,
उन्हें       अंगारों      में      जलने      दो    ।

आजाद       परिंदों       को      मिलकर     ,
आजाद        तराने        गाने         दो       ।

(      1 9 6 6      में      रचित      )



Sunday, March 31, 2013

नेह निमंत्रण



मां    की     थाती   ,  और ,
धरोहर    पितृजनों     का  ,
शुभाकांक्षी     है   ,
हे   प्रियवर     !
तेरे ही   आशिर्वचनों   का   ।

तेरे  ही   पावन    चरणों   के
लेने   रज   स्पर्श   ,
स्वागतार्थ    हैं     खड़े
पुष्प    ले    कर    ,
कर   में    सहर्ष    ।

हे !
मानस    के   राजहंस    ,
भूल     न     जाना    आना     ,
मिलन   केन्द्र    है   जीवन    का   ,
मिलना    और    मिलाना    ।

जग    सागर     में    उतर    रहे   ,
नव    तरणी   ले    ,  दो   मांझी   ,
उद्द्वेलित    भावों    की    लहरें    ,
बंधे   ,
नव    परिणय    में   दो   साथी    ।

विहँस    रहे    संसार     तीर  पर   ,
दो    मझधार    खेवैया    ,
दें    आशीष   ,
पार    लगायें   ,
खे    कर    जीवन    नैया      

(    5 -2 -6 8   को    रचित     )


     

Friday, March 29, 2013

इन्तजार में



















नयन    का     घूँघट     हटा    कर    ,
ह्रदय    का     द्वार    खोल    कर    ,
बैठी    हूँ   ,    तेरे   इन्तजार    में     ,
बेताब      ज़िगर     लेकर      ।

सुबह    से     शाम    ढल   गई   ,   मधुमास   की   ,
ये    मेहँदी    सूख     गई     है  ,   गोरे   हाथ   की    ,
बयारों    में    महक     छाने      लगी     है  ,
आम्र      बौरों     की   ।

यह    महकती      रात     प्यासी      है    ,
ये    मेरे     नयन     प्यासे     हैं    ,
ये   प्यासें   तृप्त    तुम   कर    दो   ,
मेरी  ,  सूनी   बाहों   को   भर    कर    । 

बयार ये मधुमास की

मधुमाती   ,   मदमस्त    मधुमास    की    बयार
बहारों     में     थिरकती  ,
लेकर     गंध     बौरों     की     ।
शाम    की   वेला  ,  लिए    एक    रात     प्यासी   ,
मुग्ध   मुस्काती   ,  लिए   पुनों  की  चन्दा   को
क्षितिज    के    कोर     पर     ,
हरसिंगारी    गंध     अँकवार     में     छुपा                   ,
झूम    रही  ,   झूम    रही   ,   झूम    रही
बयार    ये     मधुमास    की     । 

Wednesday, March 20, 2013

किसने खेली होली ?

विहँस     रहा      आकाश   ,    धरा     की      देख      वसंती      चोली    ,
हरित    पीत    रंग    ओढ़    चुनरिया   ,   धरती     मन     में     फूली    ।
अति     हर्ष     से     हर्षित     हो   ,     धरती    का    मुख     है    लाल    ,
पूर्व     क्षितिज    से    रंजित    रवि    ने  ,   फेंका      रंग   -    गुलाल    ।
इधर     श्याम      के     अधरों     पर   ,   बज   उठी   हरित   बाँसुरिया     ,
उधर    गोपियाँ    लेकर    आ      गईं   ,   रंग        भरी        गागरिया    ।
भींगी     धरती    ,    भींगा     अम्बर   ,     भींगी    व्रज    की     टोली     ,
फोड़   गगरिया   ,    भिंगो   चुनरिया   ,     कान्ह    ने    खेली   होली      ।
उपवन   में   अलि    गुञ्जन    करता   ,    जैसे      बजी      शहनाई       ,
बेला     ,    चम्पा      और      चमेली    ,    हर     कलियाँ     इतराई       ।
रंग    दे    होंठ   ,  कपोल    ,     कैसी      आज    खुशी    है      छाई       ,
सब  के   तन  -  मन    रंग    देने     को    यह     होली     है     आई       ।

कवियों     की     यह     होली    ,   यह    भावुक     मन    की   होली      ,
आओ   ,    देखें    ,     वीरों     ने     है   ,    खेली      कैसी        होली      ।  
जन्म  -  भूमि   पर   दुश्मन   ने   ,   जब  -  जब  भी   पांव   बढाया      ,
कर    में   धर    तलवार   ,   वीर   ,   शत्रु    के    सम्मुख       आया      ।
काँप    उठा    रण  -  क्षेत्र    ,   रक्त    से    धरती    हो   गई    लाल      ,
गौरव     से   है   खड़ा     हिमालय     ,     भारत    मां     का     भाल      ।
नगपति  का  कण  -  कण   सुना  रहा  ,  वीरों    की   ये   कहानियाँ     ,
वीरों     ने   जब     खेली     होली    ,    बही       रक्त   की    नदियाँ     ।
डोल    रहा     होता  था    अम्बर    ,   चलती   रहती   थीं   गोलियाँ     ,
रह - रह  कर  थीं  प्रलय  मचाती  ,  हर - हर   महादेव  की  बोलियाँ     ।
थीं    भेज   रही ,  रण    को ,   भाई    को  ,   बहन   लगाती    रोली     ,
ऐ    जमीं  !  बताओ   ,   सचमुच    में    है   किसने    खेली    होली    ?

(    यह     कविता    3 1   -   1 2   -   6 7    की    लिखी    हुई    है     )

Tuesday, March 19, 2013

सस्ती हुई शराब

नल    में    पानी     है     नहीं    ,
नहीं      चिंता      की      बात    ,
पानी       के     स्थान      पर     ,
सस्ती         हुई          शराब      ।

सस्ती         हुई          शराब       ,
पियो   जाम   भर - भर   कर      ,
छोड़ो     सब्जी     दाल   अब      ,
क्या   होगा   इसको   खाकर      ।

गैस      हुआ     है       मंहगा      ,
गृहणी       क्यों        परेशान      ,
उनसे      कहो     शराब     ही      ,
उन्नति        की       पहचान      ।

उन्नति        की       पहचान      ,
भरें    कलसी    और    गागर      ,
खुद  भी  पियें   और   पिलायें     ,
मेहमानों       को       बुलाकर     ।    

(   उतराखंड    सरकार   ने    शराब     सस्ती    कर    दिया    है   ।   इस   सन्दर्भ     को    लेकर      यह     एक    व्यंग्यात्मक     कटाक्ष    कविता     के   रूप    में    लिखा    गया    तथा  यह    कविता   दैनिक     समाचार  पत्र   हिन्दुस्तान    दिनांक    1 9  -  3   -   2 0 1 3     में     छपी      है    )            

Thursday, March 14, 2013

एक साल की उपलब्धि

एक   साल   की    उपलब्धि    का   कैसे    करूँ     बखान
अलग -  अलग   नेताओं   के  अलग -  अलग   हैं   बयान    ।
सचमुच    में    ही    हुई    तरक्की    हे     मेरे    सरकार
राजधानी    के   चौराहों     का    हुआ    बहुत     विस्तार    ।
हुआ     बहुत     विस्तार  ,   कई    सड़कों     को    तोड़ा
सिवर   लैन   के   नाम   पर  , सड़कों  पर  पत्थर   छोड़ा    ।
मोहनजोदरो      द्रृश्य     का     करें   यहीं      अवलोकन
बंद   और   हड़ताल   से  खुश  ,  जनता   और   प्रशाशन    ।
हुई   तरक्की   राज्य    की   ,मुँह   क्यों   रहे    विचकाय   
सस्ती     हुई     शराब    है  ,  पियो    मेरे    गुड   ब्वाय    ।
जीने    का    असली    मजा    है     शराब    में     भाई
पियो   और   पिलाओ   सबको  ,  भूल   जाओ   मंहगाई     ।

(    एक    व्यंग्य     )