Friday, October 11, 2019

बिल्ली , चूहा और घंटी

सुना है शहर में एक बड़ा जादूगर आया है ,
बड़े - बड़े जादू दिखलाता  है। 
जब वह अपना हाथ हिलाता है
साँप  को रस्सी और रस्सी को साँप  बना देता है।
 उसका जादू देखने को भीड़ लगी रहती है ,
उसकी आवाज दूर - दूर तक सुनाई देती है।
एक दिन उसी भीड़ में एक चूहा भी खड़ा था ,
उसके  एक हाथ में एक घंटी पड़ा था।
चूहा दरअसल बिल्ली के गले में
घंटी बांधने जा रहा था ,
पर भीड़ देख कर  वह भी
जादूगर का जादू देखने रुक गया था ।
जादूगर ने कहा -
अपने हाथ की सफाई दिखाता हूँ ,
तुम सब देखो
कैसे शेर को बिल्ली बनाता हूँ।
इतना कह जादूगर शेर की तरह गुर्राया ,
चूहे की समझ में कुछ भी ना आया ,
पर अगले ही पल उसने शेर को
बिल्ली बना पिंजरे में बंद पाया।
जो पहले शेर था  ,
अब बिल्ली बना पिंजरे में बंद है ,
लोग कहते हैं
जादूगर बहुत अक्लमंद है।
चूहे ने मन में सोचा - जादू तो जादू है ,
कब किसका जादू चल जाए ,
आज जो शेर पिंजरे में बंद है ,
कल्ह बाहर आ जाए ,और
आज जो जादूगर, बाहर है ,
कल्ह पिंजरे के अन्दर हो जाए।
इतना सोचते ही उसे
बिल्ली का ध्यान आया ,
घंटी वहीँ भूल  सिर पर पैर रख कर
रफूचक्कर हो गया।
बिल्ली , चूहे और घंटी की कहानी
तब से वहीँ  खड़ी है ,
 जादूगर अब भी है , पर
जादू उसके जेब में पड़ी है।

Wednesday, September 18, 2019

तुम फिर आ गए बापू !

लो ,तुम फिर आ गए बापू !
अरे !  सुना है , 
तुम्हारी तो किसी ने ह्त्या कर दी थी ,
नहीं , नहीं , तुम मर भी कैसे सकते हो ,
हर वर्ष आते हो ,
आते हो क्या !
हमारे साथ ही रहते हो ,
इसी देश में ,
कभी रुपयों वाली नोट में  दीखते हो ,
कभी सिक्कों में ,
कभी लोगों की चर्चाओं में  ;
हाँ , तुम्हारे मारने की हर दिन
कोशिश होती है ,
पर तुम नहीं मरते ,
पता नहीं क्यों ,
लोग अन्दर ही अन्दर कुढ़ते हैं ,
पर तुम्हे मारें
इस बात से उन्हें भी डर लगता है ,
और तुम ,
अपने  उसी पुराने चिर मुद्रा में ,
हाथ में सोटा , कमर में लकोटि ,
आँख पर वही मोटा चश्मा पहने ,
इधर से उधर फिरते रहते हो।

अच्छा हुआ तुम आ गए ,
लो खुद ही देख लो अपना देश ,
लोग बड़े खुश हैं , अमन - चैन से हैं ,
लोगों के अच्छे दिन आ गए हैं ,
कहाँ , लकड़ी और उपले
जला-जला कर खाना बनाते थे ,
उससे उठते धुएँ से
अपना आँख फोड़ लेते थे   ,
 अब गैस सिलिन्डर आ गया है ,
न लकड़ी गीली होने का डर ,
न उपले  के भींगने का डर ,
माचिस से भी छुटकारा ,
झट  लाइटर दबाओ ,
चट  गैस जलाओ ,
फटा - फट खाना  बनाओ।
अलबत्ता , गैस सिलिन्डर
इतना मँहगा होता जा रहा है , कि
लोगों के पाकिट को फाड़ कर
बाहर आ रहा है।

बैलगाड़ी और तांगे का तो जैसे
नामोनिशान ही मिट गया लगता है ,
घोड़ा तो अब पुलिस वालों के
घुड़साल में ही दीखते है ,
अब लोग , कार और स्कूटर पर
शान से चलते हैं ,
हाँ , पेट्रोल की कीमतों में
लगी आग से
उनके पैंट की जेब जरूर झुलस जाती है ,
पर सुख - सुविधा के लिए
यह सब तो सहना ही पड़ता  है।
सड़कें बहुत खूबसूरत हैं ,
दमदार , गढ्ढ़ेदार , हिचकोलेदार ,
कुछ लोग ठीक ही कहते हैं
सड़कों में जगह - जगह
गढ्ढे तो होने ही चाहिए ,
लोग देख-भाल कर
संभल - संभल कर सड़क पर चलेंगे ,
ना हों गढ्ढे तो सरपट भागेंगे ,
फिर फिसलेंगे , चोट खायेंगे ,
या फिर ,कौन जाने आगे क्या हो !
कार और स्कूटर भगाने वालों के लिये
सरकार ने  सशर्त नियमों सहित
कुछ कागजात साथमें रखना
अनिवार्य कर दिया है  ,
बिना उन कागजों  और शर्तों के
कार और स्कूटर
सरपट भागने वालों के लिये ,
सरकार ने अच्छा इंतजाम कर रक्खा है ,
कदम - कदम पर सरकारी अमला
इनका जम कर स्वागत कर रही है ,
लोग ख़ुशी - ख़ुशी ,
अपने स्वागत के लिये
हजार , दो हजार की कौन कहे
लाखों न्योछावर कर रहे हैं ,
भले , घर में उनके फाँका पड़  जाये ,
सरकार भी खुश , जनता भी खुश।
इस ख़ुशी की बात पर एक बात याद आई ,
तुम तो जीवन भर लड़ते ही रहे ,
कभी देश के लिये अंग्रेजों से लड़े ,
कभी गरीबों और किसानों के
हक़ के लिये लड़े  ,
किसानों की बात पर भी
एक बात याद आई -
सुना है कि विगत कुछ सालों में ,अभाव में
बहुत से किसानों ने आत्म -ह्त्या कर ली ,
कहीं ,कहीं तो किसान कई - कई
दिनों तक पानी में खड़े रहे ,
अरे भाई , पानी में खड़े रहो  , या
आत्म - ह्त्या ही करो ,
किसी का क्या बिगड़ता है ,
किसान कोई नेता थोड़े ही है , कि
हाय - हल्ला मचे ,
तुम होते तो शायद
अब भी किसानों के लिये लड़ते,
पर आज देखो ,
सब अपने -अपने लिये लड़ रहे हैं ,
देश जाए  ....................
पहले पेट पूजा ,
फिर काम दूजा।

धर्म -कर्म भी बहुत बढ़ गया है ,
तुम तो राम - राम रटते ही रह गये ,
आज देखो हर ओर
राम की जय -जयकार हो रही है ,
हर गली - मुहल्लों में
राम के नाम का पताका
लहराते लोग मिल जाते हैं ,
ये दीगर बात है  , कि
कभी - कभी  राह में
दुष्ट लोग  टकरा  जाते हैं , फिर क्या ,
हाथ के हाथ दण्ड का प्राबधान है ,
पीटते - पीटते  सीधा
स्वर्ग - लोक पहुँचा देते हैं ,
कोर्ट -कचहरी की
जरूरत ही नहीं पड़ती ,
वो कहते हैं ना , कि ,
क़ानून तो हम ही बनाते हैं ,
देश हमारा है , क़ानून हमारा है ,
न्यायपालिका हमारी है ,
मज़ाल है , लोग चूँ  तक करें !
उफ़ तक नहीं करते ,
झट उन्हें देश से
बाहर का रास्ता दिखाने
कई हमदर्द खड़े रहते हैं।
वैसे आज के सभी जन , देश -भक्त हैं ,
कोई किसी से कम नहीं ,
अगर कोई नहीं है , तो
वह है  ' जनता ' ,
क्योकि , वह सच बोलने के लिये
जरा -जरा मुँह खोलती है ,
उसका जरा सा मुँह खोलना ही
साबित करता है , कि ,
वह देश - भक्त नहीं  है।
आपका पुराना ज़माना थोड़े ही है ,
अंग्रेजी सत्ता भी
आपके  ' सच ' से काँप जाती थी !
चलो , आप आ ही गए हो , तो ,
खुद ही देख लो
20  वीं  सदी का अपना देश ,
किसी के बताने  या कहने की
जरूरत तो नहीं है।
सो हे बापू !
तुम्हारे आज के आगमन पर
हम सब छोटे - बड़े , लम्बे -ठिगने ,
गरीब - अमीर , ऊँच -नीच ,
लँगड़े -लूले , काने - कुतरे ,
गूँगे -बहरे , दोस्त - दुश्मन ,
मजदूर - अफसर ,सरकार -पत्रकार ,
स्वस्थ्य -बीमार , साहूकार -चाटूकार ,
 हम सभी आपको नमन करते हैं ...........
 
( प्रकाशित -  2019 )






Monday, August 5, 2019

नए दरख़्त उग आये हैं

बूढ़े  दरख़्तों  से कहो ,
वे  ख़ुद छोड़ दें वह जगह ,
नए दरख़्त उग आये हैं
नए अंदाज़ में ,
अब उनकी ज़रुरत  नहीं है  ......

बरगद से कहो ,
वे इतराना छोड़ दें ,
पंछियों  को देते हैं बसेरा
और ,
करते हैं छाया ,
थके मुसाफिरों पर  .....

पीपल से कहो,
मुस्कुराना छोड़ दें  ,
हम ही हैं 
देते हैं शुद्ध हवा
ऑक्सीजन ,  जीने के लिए ,
अब नया ज़माना आया है ,
नयी तकनीक आ गई है ,
सब कुछ हम स्वयं कर लेंगे ,
अब उनकी  कोई ज़रूरत  नहीं है। ......

Saturday, July 27, 2019

मुक्तक

मछली ने केंचुए से कहा -
तू क्यों मुझे ललचाती है ,
खुद तो मरती ही  है ,
मुझे भी मरवाती है।

कभी पानी का थाह
बाँस लेता है ,
कभी पानी   बाँस को
बहा ले जाता है।

बरसाती नाला , बहुतों को
बहा ले जाती है ,
कुछ उसके साथ बह जाते हैं ,
कुछ अपने को बचा लेते हैं।

मनुष्य को देख परिंदे ने कहा ,
कितना स्वार्थी हैं ये ,
अपना घर बनाने के लिये ,
परिंदों का घर उजाड़ देते हैं।
--- मंजु  सिन्हा

Wednesday, July 24, 2019

निठुर भोर !

जाने कितनी रात कटी मेरी आँखों में ,
कुछ  आश लिये ,
अरे ! निठुर " ओ  भोर  " ,
तुझको इसकी खबर नहीं है  .......

जाने कितनी बात रही अनकही ,
तैरती स्वासों पर ,
अरे ! निठुर मन पवन ,
तुझको इसकी खबर नहीं  ..... ...

जाने कितनी प्यास रही अव्यक्त सदा ,
इन अधरों पर ,
ओ !  तुहिन बिन्दु  ,
तुझको इसकी खबर नहीं  ....... ...

Thursday, July 11, 2019

तुम यूँ ही सदा मुस्कुराती रहो ,
जीत के गीत हरदम ही गाती रहो।
आशीष , शुभकामना।

मौन

मौन ही तो साधना है ,
मौन ही आराधना है ,
मौन में ही प्रश्न है ,
मौन में उत्तर समाहित ,
समझ सके गर जो भी कोई,
भाषा अबोले मौन की ,
तो , वह , इतना जान ले ,
मौन ही सबसे मुखर है ,
शेष सब ही गौण है ,
शेष सब ही गौण है  ........... 

( प्रकाशित  )

Tuesday, July 9, 2019

बाल गीत

दादी मेरी आओ जी ,
भूख लगी है मुझको जी ,
खाना कुछ ले आओ जी ,
कुछ मीठे कुछ खट्टे लाना ,
कुछ लाना नमकीन ,
दादी मैं तो चला घूमने ,
व्ह्वेन्सांग का चीन।

Monday, June 24, 2019

बच्चा प्यारा - प्यारा हूँ

बाबा मुझको प्यारे हैं ,
मैं बाबा का प्यारा हूँ ,
उनका राजदुलारा हूँ ,
मैं बच्चा प्यारा - प्यारा हूँ।

दादी मुझको प्यारी है ,
मैं दादी का प्यारा हूँ ,
उनका बड़ा सहारा हूँ ,
मैं बच्चा प्यारा - प्यारा हूँ।

मम्मी मुझको प्यारी है ,
मैं मम्मी का प्यारा  हूँ ,
उनके दिल का टुकड़ा हूँ ,
मैं बच्चा प्यारा - प्यारा हूँ।

पापा मुझको प्यारे हैं ,
मैं पापा का प्यारा हूँ ,
उनकी आँख का तारा हूँ ,
मैं बच्चा प्यारा - प्यारा हूँ।

Monday, May 20, 2019

एक लड़की नटखट सी

एक लड़की नटखट सी , नन्ही सी पर चँचल सी ,
दूर देश से आई है , याद पुरानी लाई है ,
बात बहुत कम करती है , खुद में खोई रहती है ,
अब शब्दों को चुगती है , मन ही मन कुछ बुनती है।

Thursday, April 11, 2019

चन्द शेऱ

                   ( 1  )
लोग तो , ना जाने ,
क्या -क्या ख़याल रखते हैं ,
खुद पर यकीं नहीं   ,
औरों की नक़ल करते  हैं।                                                 
                ( 2  )
तुम बेसुरे ही सही,
गाओ तो कोई गीत ,
अपना ही ,
बकरियां भी करती  हैं  में - में ,
अपनी ही आवाज में ,
भेड़ियों की नक़ल नहीं करतीं।
                  ( 3  )
बरसात के मौसम की महक मिलते ही ,
मेढक टर - टराने लगते हैं ,
फूल में खुशबू आने से पहले ही ,
लोभी भँवरे गुन - गुनाने लगते हैं।
                ( 4  )
राजा कहै फ़कीर हूँ ,
झोला मेरे साथ ,
सुनत कबीरा हँसि पड़ै ,
कर धर अपने माथ।
कर धर अपने माथ ,
सोच में पड़ै कबीरा ,
हैं फ़कीर जो सॉंच में ,
होगा उनका क्या नाथ   ?



Monday, March 25, 2019

बाल गीत

मैं नन्ही सी चिड़िया हूँ ,
रोज सवेरे जगती हूँ ,
चूँ -चूँ कर के गाती हूँ ,
मीठे गीत सुनाती हूँ ,
सूरज को जगाती  हूँ।  

तुम भी आओ बाग़ में ,
घूमो मेरे साथ  में  ,
संग तुम्हारे घूमूँगी,
संग तुम्हारे नाचूँगी ,
छम - छमा , छम ,छम ।

Wednesday, February 20, 2019

प्रेम पुजारी

ना जानूँ , जप -तप ना जानूँ  ,
पूजा - पाठ ना जानूँ  ,
मैं तो प्रेम पुजारी हूँ प्रभु ,
प्रेम ही करना  जानूँ ।

क्या होती स्तुति है तेरी ,
अक्षर ज्ञान ना जानूँ  ,
हाथ जोड़ कर नमन करूँ मैं ,
बस इतना ही जानूँ ।

चर औ अचर सब ही हैं तेरे ,
किस में भेद  करूँ ,
कण -कण में तू ही तो समाया ,
मैं तुझको ही मानूँ।

सुख - दुःख की क्या परिभाषा है ,
सुख - दुःख तुम्हरी माया ,
सुख में भी  दुःख , दुःख में भी सुख,
महिमा तेरी बखानूँ।

प्रेम ही करना जानूँ ,
प्रभु जी , प्रेम ही करना जानूँ।

( यह रचना दिनांक 03 -02 -2015 की है )

मन की पीड़ा

मैं भी मन की पीड़ा को बतला सकता हूँ ,
भारत की छलनी छाती की कथा सुना सकता हूँ।
रोज -रोज ही भारत के सैनिक शहीद होते हैं ,
रोज -रोज ही हम झूठी कसमें खाते रहते हैं। 
 जाने कितनी बेर हमने दुहराईं कसमें ,
" बेकार नहीं जाएगा वीर जवानों का बलिदान"
पर, रोज -रोज ही शत्रु हम पर हमला करते हैं ,
रोज -रोज भारत के सैनिक हो जाते बलिदान।

हुए शहीद जब पूत देश के , नेताओं ने कहा -
दूँगा चालीस लाख शहीद के हर परिवारों को ,
तब शहीद की माँओं ने भर कर आक्रोश कहा -
करो नहीं अपमान हमारे वीर सपूतों का ,
नहीं दाम के लिये दिया है  बेटों ने बलिदान ,
भारत की रक्षा में उनहोंने त्याग दिये  हैं प्राण।
कर सकते गर एक काम तो , मेरा ये कर दो ,
एक पूत के बदले दुश्मन के , चालीस सिर ला दो।

मंदिर , मस्जिद ,कुर्सी की चर्चा को तज कर ,
झूठे वादे  , झूठी कसमें खाना छोड़ कर ,
किसी एक भी दिन ,  सच में  ही , सच्चे मन से ,
सब मिल कर , कर लेते तुम , वीर सपूतों का सम्मान।
कुछ तो शरम करो , देशभक्ति का स्वाँग रचाने वालों ,
वक्त करेगा नहीं क्षमा , तुम जितना नाटक कर लो ,
है सीने में  ' आग " अगर , तो , सिर पर क़फ़न सजाओ ,
करने दो - दो हाथ शत्रु से सीमा पर आ जाओ।

तब कहना तुम वन्देमातरम , जय -जय हिन्दुस्तान ,
जय बोलो , जय बोलो , बोलो , जय - जय हिन्दुस्तान।

(  मासिक हिन्दी पत्रिका हलन्त  - मार्च 2019  में प्रकाशित )

Friday, December 21, 2018

नया वर्ष आने वाला है

नया वर्ष  आने वाला है ,
धूम - धड़ाका होने वाला है ,
वर्ष 2019  आने वाला है ,
फिर से चुनाव आने वाला है।
फिर धर्म - जाति के बीज ,
जनता की छाती पर बोयेंगे ,
हमको तुमसे , तुमको हमसे ,
अलग - अलग बाँटे जायेंगे ,
वो नेता फिर से आएंगे ,
वो वोट माँगने आएंगे।
पहाड़ का  हाल खस्ता है  ,
नदी पार करने का पूल टूटा है
स्कूल का बच्चा रोज ही ,
रस्सी पर चल कर ,
स्कूल जाता है ,
सब को यह पता है ,
पर किस किस को दर्द होता है  ?
हर बार की तरह सिर झुकाये  ,
वो आएंगे फिर से ,
वो वोट माँगने आएंगे ,
अबकी पक्का  वादा है ,
फिर से कसमें खाएंगे ,
वादा कर के जाएंगे ,
उनमें कुछ पुराने वादे होंगे ,
कुछ नए वादे कर जाएंगे ,
वादों की झड़ी लगा देंगे ,
हम वादों में खो जाएंगे ,
वादों की  लॉलीपॉप ,
हमारी कानों को दे जाएंगे ,
आपका और मेरा वोट ,
लेकर ही वो  जाएंगे ,
फिर से हम सब  कोस - कोस कर
आँसू पी कर  ,
अगले चुनाव का इन्तजार,
बस करते ही रह जाएंगे।
वह जेई तरह से आएंगे ,
और इसी तरह से जाएंगे।



Monday, November 19, 2018

नदी और नारी

नदी और नारी दोनों की गति है एक समान ,
अनुशासित जब तक रहे ,तब तक है सम्मान।
जब भी नदियाँ हो जाती हैं चंचल औ उच्छृंखल ,
पावन बनी नहीं रह जाती और न जल ही निर्मल।
दिशाहीन हो कर बह जाती , इधर-उधर राहों पर ,
नहीं स्वच्छ वह रह पाती है , तृषित कामना लेकर।
जब तक है सम्मान ,पूजते नदी और नारी को ,
पंडित,ज्ञानी  अर्पित करते धूप,पुष्प औ चन्दन।
टूट जभी जाता है यह लघु अनुशासन का  बंधन ,
सुखमय जीवन में रह जाता ,बस क्रंदन ही क्रंदन।
है स्वतंत्र नारी का जीवन , जैसे कटा  पतंग ,
सुचिता सदा छोड़ देती ,आजाद नदी का संग।
अनुशासन में बद्ध प्रकृति भी ,शांत,सौम्य ,शीतल है ,
गर टूटा अनुशासन तो ,फिर , चहुँ ओर जल-थल है।
अनुशासन से च्युत  नारी का धर्म चला जाता है ,
धर्मविहीन हो कर्म नारी का पशुवत हो जाता है।
अनुशासन  विहीन यह जीवन ,सुघर नहीं हो सकता ,
काँटो के पहरे में देखा , है गुलाब मुस्काता।
प्रेम और सहयोग बिना , आकाश न छूती आशा ,
होती कभी न पूर्ण  'कल्पना 'की उड़ान-अभिलाषा।

Tuesday, October 30, 2018

आईना कब झूठ बोलता है ?

आईने से उनको डर लगता है  ,
इसलिए , जब कभी कोई ,
उनको दिखाता है आईना ,
वो डर जाते हैं देख कर आईना ,
और , डर कर तोड़ देते हैं पसलियां ,
आईना दिखाने वालों की  ,
साथ ही तोड़ देते हैं आईना ।
पर आईना तो आईना ही ठहरा ,
शीशे का बना आईना  ,
टूट कर , बिखर कर भी  ,
दिखाता रहा उनको ,
उनका ही चेहरा ,
उनका मुँह चिढ़ाता रहा  आईना ,
आईना तो असली चेहरा ही दिखाता है ,
भला , आईना कब झूठ बोलता है  ?

आओ मिल कर दीप जलायें

देश की आजादी की खातिर ,
झूल गए जो फाँसी पर  ,
आओ कुछ आँसू छलकायें  ,
उन वीरों  के  नाम ।

जिनके त्याग से लहराता है ,
आज तिरंगा प्यारा ,
आओ कुछ हम गीत लिखें ,
उन वीरों के नाम ।

जिनके बलिदानों से मिली है  ,
हमें देश की आज़ादी  ,
आओ मिल कर दीप जलायें  ,
उन वीरों के नाम ।


कभी - कभी तुम अपने मन से

कभी - कभी तुम अपने मन से ,
मन की बातें कर के देखो ।
कभी -  कभी मन के भावों को ,
मन ही मन में पढ़ कर देखो ।
कभी - कभी तुम चुपके - चुपके ,
चुपके - चुपके रो कर देखो ।
कभी - कभी दिल के जख्मों को ,
थोड़ी और हवा कर देखो ।
आँसू गर जो चाहे छलकना ,
आँसू को समझा कर देखो ।
होंगे मीत तुम्हारे शत - शत ,
उनके मन को पढ़ कर देखो ।
सुख - दुःख हैं जीवन के संगी ,
उनको मीत बना कर देखो ।
सुख में तो सब ही हँसते हैं ,
दुःख में भी मुस्का कर देखो ।
कभी - कभी तुम अपने मन से ,
मन की बातें कर के देख ।

Saturday, September 29, 2018

सिर पर धूप बहुत है

सिर पर धूप बहुत है
सँभल कर चलना  ,
हाक़िम को अच्छा नहीं लगता
रात को रात , और
दिन को दिन बताना ,
हाक़िम कोई भी हो
दिन में तारे दिखा सकता है ,
इसलिए ,
दिन को रात और रात को दिन बताना।
हाकिम की मर्जी हो , तो
बकरी भी गाय ,
और ,
गाय भी बकरी बन जाती है ,
सोच - समझ कर
मुँह खोलना ,
सोच - समझ कर
कदम बढ़ाना ,
कदम - कदम पर ज़ाल बिछे हैं ,
ज़ाल में झूठ के तम्बू हैं ,
जहाँ , सच नहीं , झूठ चलता है
झूठ के साये में सच चलता है ,
सच पर झूठ का पहरा रहता है।
ईमान को काँख में
दबा कर चलना ,
झूठ को आँखों में
बसा कर चलना ,
सिर पर धूप बहुत है ,
संभल कर चलना  ,
सिर अपना बचा कर चलना।

सड़क पर निकलो तो ,
निग़ाह रख कर चलना ,
कहाँ - कहाँ नहीं हैं भेड़िये
तुम्हारा शिकार करने ,
हवा ज़हरीली है
हर जगह , हर दिशा ,
रात तो काली होती ही है ,
यहाँ सफ़ेद  झक्क लिबास में भी
दिल काला मिलता है ,
अपना सत बचा कर चलना ,
आँचल सँभाल कर चलना ,
सूरज भी मूँद लेता है आँखें ,
अब सच कौन बोलता है
और ,
अगर , कोई बोले भी तो
उसे कौन सच मानता है ?
सच की लकीरों पर
झूठ का मुलम्मा है ,
झूठ के साये में सच चलता है ,
सच पर झूठ का पहरा रहता है ,
सर पर  धूप बहुत है ,
सँभल कर चलना ,
सिर अपना बचा कर चलना