Saturday, July 16, 2016

तिरंगा न झुकने देंगे

एक पत्थर तो हवा में उछाल कर देखो ,
कहर बन कर दुश्मन पर बरस कर देखो ,
हो नाम शहीदों में तुम्हारा भी कहीं ,
अपने सिर पर कफ़न बाँध कर देखो।

वतन के वास्ते जीने का फन सीख लो ,
कुर्बानी का जज्वये हुनर तो सीख लो ,
दे देंगे जां , तिरंगा न झुकने देंगे ,
कलम को तलवार बनाना तो सीख लो।

आज़ादी के शोलों को जला कर रखो ,
दुश्मन से गुलिश्तां को बचा कर रखो ,
कोई नापाक निगाहें न वतन पर उठे ,
आँखों में चिंगारी सजा कर रखो। 




Saturday, July 2, 2016

किसान

आँधी हो , तूफान हो ,
बारिस हो या झंझावात ,
किसान नहीं रुकता ,
वह नंगे बदन
घुटने तक की धोती पहिरे ,
कादो - कीचड में धँसे
पूरे मनोवेग से
खेतों में काम करता रहता है।
जब हम सब
बारिस में भींजने के डर से ,
सर्दी और बुखार के डर से
घरों में दुबके रहते हैं
वह खेतों में
वैसे ही मुस्तैद रहता है
जैसे सरहद पर जवान ,
जीवट प्राणी है किसान  !

वह  हम सब का अन्नदाता
अभाव में जीता है ,
खुद भूखा रहता है ,
बच्चों को भूखा रखता है
पर ,औरों की भूख मिटाने
हाड़ तोड़ श्रम करता है ,
खुद कच्चे खपरैले मकान में रहता है
हम सब के लिए
अन्न का भण्डार लगा देता है ,
है न जीवट प्राणी ?
जीवट लोग जीते हैं , मरते नहीं ,
उसे मारती हैं हमारी उपेक्षाएं।

अपने लहलहाते ,
लहराते खेत को देख कर
खुश होता है किसान
ठीक वैसे ही
जैसे, कोई खुश होता है
अपने बढ़ते बच्चों को देख कर  ,
बच्चों से भी ज्यादा प्यार करता है
वह अपने उगे फसलों को ,
 पूरा जीवन खपा देता है
फसलों की परवरिस में ,
किसान कभी मरता नहीं ,
उसे मारती हैं
हमारी असंवेदनायें।

नहीं रोता वह
घड़ियाली आँसू  ,
जैसे रोते हैं
कुछ विशिष्ट जन ,
उसे आस्था है ईश में ,
उसे भरोसा है
अपने श्रम पर ,
वह कोरे वादे नहीं करता ,
श्रम करता ,
श्रम के वादे करता।
श्रम की मिठास
किसान को जीवित रखता है ,
किसान स्वयं नहीं मरता ,
उसे मारते हैं झूठे वादे ,
उसे मारती है तंत्र व्यवस्था ,
उसे मारती है झूठी संवेदनायें।

              ------- ( प्रकाशित )

Friday, June 10, 2016

आर्तनाद

पहाड़ का दर्द
पहाड़ सा दर्द ,
 रात सोता है
सुबह रोता है
यह पहाड़ ,
अपने छाती पर होते
अतिक्रमण को देख कर ,
अपने विद्रूप होते
स्वरूप को देख कर ।

दरकता है चट्टान
दरकता है पहाड़ का सीना ,
दम घुटता है
फैलाये गये
प्रदूषण से
जो छोड़ गये हैं
पहाड़ की छाती पर ,
ढ़ेर सारा  कचरा ,
जूठन ,अपशिष्ट ,
मल और  मूत्र ।

वो गाते  हैं गीत
लहराते हैं पताका
" विजय " का
सुनते नहीं
मेरा आर्तनाद।
जिस  दिन
मिट जाएगा
मेरा अस्तित्व
मिट जाएगा
जंगल और कानन
सूख जायेंगी नदियां
मिट जायेगी
यह धरा।

         -------   (  पहाड़ का दर्द  शीर्षक से प्रकाशित )

Saturday, June 4, 2016

पाई यह कैसी आजादी ?

जहाँ बोली पर पहरा रहता ,
अभिव्यक्ति पर हो पाबंदी ,
कदम- कदम पर झूठ का फंडा  ,
सच कहने पर काराबन्दी ,
पाई यह कैसी आजादी  ?

कहते हमने की है तरक्की ,
टुकड़े में परिवार बँटा है ,
चचा , बुआ ,ताया - ताई ,
वृद्धाश्रम में दादा -दादी ,
पाई यह कैसी आजादी  ?

आरक्षण की भीत डाल कर ,
नफ़रत दिल में जगा रहे हैं ,
सत्ता की खातिर करते हैं ,
जनता के धन की बर्बादी ,
पाई यह कैसी आजादी  ?

किस माँ के हैं बेटे ऐसे ,
इतिहास के आखर मेटे ,
महापुरूषों के मुख्य पर कालिख ,
पोत रहे ये अवसरवादी ,
पाई यह कैसी आजादी  ?

Sunday, May 22, 2016

खोया हुआ शहर - देहरादून

देहरादून की सुन्दरता को
लग गई है

' विकास ' की नजर,
सड़कें चौड़ी हो गईं हैं ,
सहस्रों पेड़ों , दरख़्तों ने
दिया है अपना बलिदान।
अब ,
देहरादून हरा - भरा  शहर नहीं ,
पत्थरों और कंक्रीट का
शहर हो गया है ,
ठंढी , मुलायम बहती
हवा का स्थान
तपती - झुलसती
हवाओं ने ले लिया है।
नहीं हैं ,
लीची व आम के वो बाग
जो कभी , देहरादून की
पहचान और शान
मानी जाती थीं।
कभी यहाँ तांगा चलता था
शहर में ,
तांगे की जगह
ऑटो और कारें चलने लगी हैं ,
कभी वह भी वक़्त था
जब गर्मी के दिनों में भी
घरों में सुराही या घड़ा
नहीं रखा जाता था ,
पानी, नलों में
वैसे ही ठंढा - ठंढा
अनवरत आता रहता था ,
अब , ए. सी और कूलर का
समय आ गया है
आज के विकासमय शहर के लिए ,
विकासमंद लोगों के लिए।
यह सब ऐशो - आराम के साथ - साथ
आज की जरूरत भी बन गई है।
उफ़ ! इतनी गर्मी !
इतनी तपिश !
इतनी उमस !
इतनी धूल !
सभी बेहाल हैं ,
पेड़ जो बचे हैं
उनके हलक सूख रहे हैं ,
पक्षी और मानव , सभी ,
इस विकास के मापदंड में
विवस हैं
ढोने को परेशानियाँ ,
खाने को धूल
और ,
गर्म - गर्म हवा। 

       ( 2  )
आज, आप जो देख रहे हैं
राजपुर रोड की चौड़ी सड़कें ,
सड़क के किनारे
सजी बड़ी - बड़ी बिल्डिंगे
मॉल और मकान
दिलाराम चौक से लेकर
जाखन - राजपुर तक ,
नहीं थे तब।
तब केवल
सड़क के दोनों ओर
सघन , लंबे - लंबे ,
बड़े - बड़े , ऊँचे - ऊँचे
चीड़ और साख के पेड़ और दरख़्त थे ,
घना जंगल था ,
शाम घिरते ही
स्याह अँधेरा ,
घोर सन्नाटा
घोर नीरवता ,
बीच - बीच में
यदि कुछ था , तो
एस.पी साहब की कोठी ,
नेवल ह्यड्रोग्राफिक ऑफिस ,
राष्ट्रपति के अंगरक्षकों की
कोठी की दूर तक लंबी दीवार ,
राष्ट्रीय दृष्टि बाधित संस्थान ,
फिर , आगे वही वीरानगी ,
वही पेड़ , वही दरख़्त ,
वही जंगल।

      ( 3 )
शहर के बीचो - बीच
स्थित घंटा  घर ,
देहरादून की शान ,
इसके अहाते में खड़ा
विशाल पीपल का पेड़ ,
( जो आज भी है )
 इसके ठीक सामने
पलटन बाज़ार ,
मुख्य आकर्षण ,
( आज भी है ),
घंटा घर के पास ही
' दिग्विजय ' सिनेमा हॉल
जिसका दायीं ओर का कुछ हिस्सा
विकास की भेंट चढ़ गया है
( अपनी कहानी खुद बयां कर रहा है ),
इसके दाहिनी ओर
चकराता रोड ,
कभी बॉटल नेक के नाम से प्रसिद्ध ,
इन सब के अलावा
यहाँ की साफ - सफाई ,
साज - सज्जा ,
अमन - चैन , भाईचारा ,
सौहाद्रता ,
तहज़ीब , सब थे।
न बदन जलाने वाली गर्मी थी ,
न थी तपिश ,
बारिस तो ऐसी, कि
भींगना न चाहते हुए भी
भींग जाते आप ,
ठंढ , कड़ाके की ,
ठीक दशहरे के बाद
स्वेटर और शॉल
निकल आते थे।
दिसंबर के अंतिम सप्ताह
और ,
जनवरी के प्रथम सप्ताह
बारिस न हो , और मसूरी में
स्नो फॉल न हो ,
पहाड़ हिमाच्छादित न हो
ऐसा संभव न था।
कितना सुंदर नज़ारा
तब जो था ,
वह अब नहीं है ,
अब है , तो
बस भीड़ है ,
भागम - भाग है ,
रेलम - पेल है ,
सड़कें सभी क्षत - विक्षत ,
जगह - जगह खुदी हुईं ,
धूल और कीचड़ से भरी हुईं ,
हर ओर ,
हर सूँ , ऑटो - बाईक - कारों से
उत्सर्जित धुएँ , और
कान फाड़ू आवाजें,
मिल कर ही देहरादून है ,
अपने आप में
खोया हुआ शहर।


           ---------     ( प्रकाशित )

Saturday, May 21, 2016

रात और मैं

रात भी रोती है ,
रात भी हँसती है ,
रात भी जागती है ,
रात भी सोती है ,
मैं हँसा ,
रात हँसी ,
मैं रोया ,
रात रोई ,
मैं जागता रहा ,
रात भी जागती रही ,
मैं सोया ,
रात भी सो गई ,
रात और मैं ,
दोनों एक दूसरे के पर्यायवाची।

समय की रेत पर

समय की रेत पर ,
लिखता हूँ
जीवन की कविता ,
लिखता हूँ गीत ,
गुनगुनाता हूँ ,
बुनता हूँ सपने
हवा के परों पर ,
तेज झकोरों के साथ
ले जाता है उड़ा कर ,
कविता गीत और सपने ,
विचारों की आँधी ।
फिर से वही शून्य ,
निहारता हूँ आकाश ,
फिर से दुहराता हूँ
वही सब ,
खोजता हुआ जीवन ,
जो खो गया है
कविता , गीत और सपनों में  .....

Monday, May 2, 2016

सुन लो शहीदों की

सुनो ऐ हिन्द के लोगों कहानी हम  सुनाते हैं ,
शहीदों की व्यथाओं की कथा तुमको सुनाते  हैं।
दिए सर्वस्व थे जिसने , बढ़ाया मान हमसब का ,
उसी की आत्मा की ये व्यथा तुमको सुनाते हैं।

हमारी भूमि  पर आकर , सिर को काट ले जाते ,
मगर हम हैं सियासत में अमन की संधि कर आते ,
न कुछ भी दर्द ही होता , न कुछ भी क्षोभ ही होते ,
अमन के शत्रु के घर बैठ दावत खूब कर आते ,
किये बलिदान जीवन के , थे हमने देश की खातिर ,
कभी पैंसठ - इकहत्तर और करगिल याद हैं आते।
मगर ये जो सियासत है...

कटा कर शीष को हमने , किया  माँ - कोख  को सूना ,
निछावर भी किया था माँग के सिन्दूर पत्नी का  ,
बहन मेरी बहुत रोई , मेरा बेटा बहुत रोया ,
पिता को बेसहारा करके मैं धरती में जा सोया ,
मगर जब देखता हूँ मैं अपने देश की हालत ,
हमारा दिल बहुत रोता है , आँसू आँख में आते।
 मगर ये जो सियासत है   .....

कभी कश्मीर है जलता , कभी बंगलोर जलता है ,
कभी दिल्ली सुलगती है , कभी आंध्रा सिसकता है ,
महज कुर्सी की ही खातिर , ये जनता को लड़ाते हैं ,
हमें तुमसे लड़ाते हैं , तुम्हें हमसे लड़ाते हैं ,
कभी मंदिर जलाते हैं , कभी मस्जिद जलाते हैं ,
कभी बस्ती जलाते हैं , कभी दंगा कराते हैं
मगर ये जो सियासत हो   ........

तिरंगा तीन रंगों का , शहीदों की निशानी है ,
नहीं दुनियाँ में दूजा कोई इसका और सानी है ,
तिरंगे के लिए जीना , तिरंगे के लिए मरना ,
तिरंगे के लिए हमको जनम सौ बेर है लेना ,
तिरंगा है वसन मेरा , तिरंगा हो कफ़न मेरा ,
तिरंगे के लिए हम तो ये जां कुर्बान कर जाते।
मगर ये जो सियासत है  .......
  

Friday, April 15, 2016

श्रद्धांजलि

शब्दों का जादूगर सोया ,
कौन रचे शब्दों से गीत ,
दूर देश को चला गया वह ,
बन बैठा तारों का मीत।

हँसते- हँसते अभी मिला था ,
करता था वह सबसे प्रीत ,
क्या बच्चे ,क्या बूढ़े ,युवा ,
सब के दिल को लिया था जीत।

आज विदा हो गया जगत से ,
छोड़ गया जग के सब रीत ,
होंठ तुम्हारे बंद  गये ,
पर मुखरित हैं तेरे गीत।

यही हमारी श्रद्धांजलि है , तुमको मेरे मीत ,
सदा गूँजता रहे विश्व में ,तेरा सुन्दर गीत।

(  स्वo  श्री चिन्मय ' सायर ' को श्रद्धांजलि  )
        -----   ( प्रकाशित )

Tuesday, March 8, 2016

गरमी आई , गरमी आई

सूरज लाल हुआ है भाई ,
गरमी  आई , गरमी  आई।
जाड़ा भाग गया है डर से ,
गई रजाई ,गई रजाई।
मुझको प्यारी लगती गरमी ,
आइसक्रीम व कुल्फी लाई।
गरमी ने उपहार हैं लाये ,
खरबूजे ,तरबूजे लाई।
मधुर, रसीले आम भी लाया ,
शर्बत खूब पियो तुम भाई।
ठंढे - ठंढे जल से नित दिन ,
मल - मल बदन नहाओ भाई।

Tuesday, February 23, 2016

जंगल ही अच्छा है

जंगल में बहुत अमन चैन था ,
सभी जानवर मिल - जुल कर रहते थे ,
कोई किसी को बेवज़ह नहीं सताता था ,
बहुत शान्ति थी ,
अब कुशाशन फैल गया ,
जंगल कटने लगे , कट गए ,
जंगल का अमन - चैन खो गया ,
मानो , वहाँ का लोकतंत्र खो गया।
सभी   ' जंगली जानवर ' शांति की खोज में
शहर की ओर भागे ,
स्कूलों में आने लगे ,
ताकि , कुछ नैतिक शिक्षा प्राप्त कर सकें ,
मनुष्यों से मानवता सीखें ,
सभ्य बन सकें ,
पर , वह बहुत निराश हुआ ,
देखा ,यहाँ तो आदमी
आदमी को काट रहा है ,
बात - बात पर
बन्दूकें निकाल रहा है ,
शहर - शहर
बलात्कार हो रहा है ,
वृद्धाओं और बच्चियों से
दुर्व्यवहार हो रहा है ,
कोई तेंदुआ या भालू दिख गया , तो
उसे घेर कर मार रहा है ,
कहीं -कहीं तो
उसे पेड़ से उलटा लटकाया जा रहा है ,
सच मानो
यहाँ आदमी जंगली हो गया है ,
बात - बात पर हिंसक हो गया है ,
इतने स्कूल - कॉलेज हैं ,
पर नैतिकता नहीं है ,
उसने मन में सोचा ,
अपना जंगल ही अच्छा है।

नोट :-- रचना तिथि / माह - फरवरी  2016 
ब्लॉग्ड - 23 फेरवारी -2016  
 

जंगली आदमी

हमने , बचपन में सुना था ,
किताबों में पढ़ा था ,
बड़ों ने भी बताया था - ( कि )
शेर , बाघ , तेंदुआ
जंगली जानवर हैं ,
जंगलों में रहते हैं ,
अब , जंगल में आदमी रहते हैं
और ,
शेर , बाघ , तेंदुआ
शहर में रहने लगे हैं ,
आज का आदमी जंगली हो गया है। 
 
          ---- ( प्रकाशित )

Wednesday, February 17, 2016

माँ की पुकार

जिस
माँ ने सींच कर
हमारी धरती को ,
लगाया अन्न का अंबार ,
भर कर पेट
कोटि - कोटि संतानों का ,
किया रक्त संचार ,
अपने निर्मल ,स्वच्छ
जल पिला कर
उन्हें पाला - पोषा ,
बड़ा किया ,
वही माँ ,
आज ' कृशकाय ' हो गई ,
हो गई है बीमार।
क्या उसकी करोड़ों संतान
उसको देंगे नया जीवनदान  ?
ताकि ,
वह पुन: स्वस्थ्य हो कर
कर सके ,
आने वाली पीढ़ी का भरण - पोषण ,
दे सके उन्हें , अमृतदान  ?
            -----   मंजु सिन्हा

कागजी आदमी


खो गई है पहचान
आज के आदमी की ,
ढूढ़ रहा है
अपना आधार ,
बिना  ' आधार '
नहीं है उसका वज़ूद ,
गो कि ,
वह जिन्दा है ,
पर कागजों में नहीं है ,
नहीं है उसका अस्तित्व ,
आदमी  ' कागजी ' हो गया है।

           -------    ( प्रकाशित )

Saturday, February 13, 2016

कूड़ा बीनती लड़की

बिखरे - बिखरे से हैं बाल ,
उलझे - उलझे से हैं बाल ,
कोमल काया जीर्ण -शीर्ण है ,
वस्त्र भी तन का अति विदीर्ण है ,
यौवन झाँक रहा है जिससे ,
पर बेपरवा इन  बातों से ,
रोज सवेरे , बड़े अँधेरे ,
काँधो पर रख थैली - बोरे ,
कूड़ा बीनने घर से आती ,
नहीं कभी वह नागा करती ।
झटपट कुछ कूड़े में  चुनती ,
चुन- चुन कर थैले में रखती ,
पॉलिथीन -प्लास्टिक के साथ ,
लोहा , कागज़ , टूटे काँच ,
और न जाने क्या - क्या चुनती ,
इनमें ही वह सपने बुनती ,
सँभल - सँभल कर वह है चलती ,
आवारा कुत्तों से डरती ,
फिर भी कुछ पीछे लग जाते ,
सूँघ -सूँघ कर उसे डराते ,
सहमी - सिकुड़ी चलती रहती ,
मुँह से कभी न कुछ वह कहती ,
उसे पता है ,गर उलझेगी ,
दण्ड भी वह  उसका भोगेगी ,
यही सोच आगे बढ़ जाती ,
लोग करेंगे सौ - सौ बात ,
यहाँ भेड़िये घूमते रहते ,
लोलुप , लंपट करने घात।                                                                                                                 

रोज सवेरे वह तकती है                                                                                     
स्कूल को जाते बच्चे ,
सजे - सजीले , नीले - पीले ,
कितने प्यारे , कितने सच्चे ,
मन ही मन सोचा करती वह ,
काश  कि वह भी कुछ पढ़ जाती ,
इन बच्चों के संग - संग वह ,
पढ़ने को स्कूल को जाती ,
पढ़ कर खूब कमाती नाम ,
बड़े - बड़े करती वह काम ,
पर निर्धन घर की वह बेटी ,
कैसे दिखलाये यह हेठी ?
बूढ़े और अशक्त पिता की ,
कैसे वह सेवा कर पाती ,
साधनहीन नहीं होती गर ,
क्यों कर वह नित कूड़ा चुनती।
क्षुधामयी इस पापी पेट को ,
सबको ही पड़ता है भरना ,
भीख माँगने से तो अच्छा ,
लगता उसको कूड़ा चुनना।

प्रकाशित - हलन्त ( जुलाई 2023 )

Wednesday, February 10, 2016

बाट जोहती माँ

कभी बच्चे के स्कूल से
आने का बाट जोहती है माँ ,
उसके आने के समय से पहले ,
दरवाजे पर खड़ी दिखती है माँ ।

फिर , उसकी नौकरी का
इंतजार करती है माँ ,
और ,
जब नौकरी मिल जाती है -
बच्चे चले जाते हैं
दूसरे शहर , देश ।
माँ फिर तकती है राह ,
जोहती है बाट ,
उसके आने की ।

इसी क्रम में ,
पथरा जाती हैं उसकी आँखें ।
और अब वह ,
' दिल ' से जोहती है बाट ।

      -------    मंजु  सिन्हा
             
 

Friday, January 22, 2016

रोटी का स्वाद

रोटी का स्वाद  अमीर से नहीं ,
मजदूरों से पूछो ,
जो हाड़ - तोड़ मेहनत  के बाद ,
' नंगे ' बदन 
टपकते  ' स्वेद ' कणों में भींगा,
रोटी का  टुकड़ा ,
आँखें बन्द कर
अपने मुँह में डाल रहा है   .......

      ------- ( प्रकाशित )

       

Tuesday, January 19, 2016

दो कवितायें

         ( एक )

    औद्दोगिक शहर

कारखानों की चिमनी से
निकलता है धुआँ ,
भर जाता है
फेफड़ों में ,
एक से निकलता है
दूसरे में समा जाता है ,
यह औद्दोगिक शहर
कहलाताहै ।
           (  दो   )
      विकसित शहर

जंगल काट दिए गए हैं ,
सड़क किनारे लगे
फलदार पेड़ों पर
चली हैं आरियाँ ,
सड़कें चौड़ी हो गई हैं ,
दौड़ती हैं ढेर सारी
मोटर गाड़ियाँ ,
छोड़ती हैं धुआँ ,
नथनों में समाते हैं ,
बचे पेड़ों पर
हवा गुमसुम है ,
खामोश है चिड़ियाँ ,
घोंसले बिखर गये  हैं ,
तपता है धूप ,
तपता है -
पत्थर का शहर ,
दोपहरी को
नदी प्यासी
खोज रही
अपना ही अस्तित्व ,
लोग कहते हैं -
यहाँ बहुत
विकास हुआ है ,
यह है विकसित शहर।
           



Saturday, January 16, 2016

रणभेरी बजा दो

सरहद के पार देश के दुश्मन को जाता दो ,
जो देश के दुश्मन हैं , उन्हें आज बता दो ,
क्या होता है अंजाम समर का ये दिखा दो ,
नामो-निशान  दुनिया से दुश्मन का मिटा दो।

इस देश के हर वासी को है नाज हिन्द पर ,
गद्दारे वतन जो भी हों सूली पर चढ़ा दो ,
हम एक हैं, हम एक हैं, हम एक-एक,एक रहेंगे ,
संदेश हमारा है ये , दुनियाँ को बता दो।

है नहीं पसंद गर , उनको अमन की बात ,
छोड़ो अमन की बात , अब रणभूमि सजा दो ,
चन्दन है माटी देश की , माथे पर लगा  लो ,
आया है यह समय कि अब रणभेरी बजा दो।

                    

Friday, January 15, 2016

मेरा गाँव

काश !
तुम आ जाते ,
देखते मेरा गाँव।
माना कि नहीं हैं सड़कें ,
है नहीं जल व्यवस्था ,
किन्तु ,
नहीं है प्यार का अभाव ,
हमारी आँखों में
बहुत पानी है।
गो कि ,
बिजली भी नहीं है ,
गाँव में होता है
स्याह अन्धेरा ,
पर , हमारे ह्रदय में है -
प्रकाश - पुंज
प्यार का।
ये टेढ़ी - मेढ़ी
पगडंडियाँ , हैं
सिरायें और धमनियाँ ,
खेतों में
उगती फसलें हैं
पूरे देश के दिल की धड़कन।
कैसे समझाऊँ मैं
तुम्हें ,
गाँव , नहीं होता है
केवल गाँव ,
वह है
हमारी जननी ,
तुम्हारी जननी ,
सब की जननी ,
करती है पोषण ,
सहती है
सब व्यथा ,
ताकि ,
तुम सजे रहो ,
सुन्दर रहो ,
भव्य रहो
और
सदैव खुश रहो   ..... ...