आया है रस -रंग ले , होली का त्यौहार ,
विविध रंगों का मेल है ,फागुन का उपहार ,
प्रीत और अनुराग का , बरसै आज फुहार ,
रंग प्यार का घोल कर , करें आज बौछार ,
ऐसो रंग को डारियो , खुशियां मिले हजार।
विजय कुमार सिन्हा " तरुण "
आया है रस -रंग ले , होली का त्यौहार ,
विविध रंगों का मेल है ,फागुन का उपहार ,
प्रीत और अनुराग का , बरसै आज फुहार ,
रंग प्यार का घोल कर , करें आज बौछार ,
ऐसो रंग को डारियो , खुशियां मिले हजार।
विजय कुमार सिन्हा " तरुण "
लो वसंत आ गया पथिक रे !
फूलों पर आई मादकता ,
पर्ण छाँव में बैठ पपीहा ,
पिहूपिहू की टेर लगाता।
सरसों फूले ,तीसी फूले ,
बाँज-बुरांस जंगल दहकाता ,
लहर-लहर नदियाँ जब बहती ,
कूल -कूल यौवन लहराता।
शुक ,पिक ,खग , खंजन औ बुलबुल,
मिल कर सारे शोर मचाते ,
फूल - फूल भौंरा मंडराये ,
जब -जब, यह वसंत है आता।
लो वसंत आ गया पथिक रे ,
मधुकर यह देता संदेशा।
धन्यवाद रोचक अच्छी रचना बधाई आपका आशीर्वाद हमारे साथ
कमेंट्स अच्छी कहानी बहुत सुन्दर , बहुत खूब
बूढी हो गई आँखें , अतीत के पन्नों में खोई ,
कहाँ छूटा , कहाँ खोया ,इसी यादों में है खोई। आहा ! क्या बात है
शादी की सालगिरह की बहुत - बहुत शुभकामनायें। सदैव स्वस्थ और सुखी रहें
जन्म दिन की बहुत -बहुत बधाई एवं शुभकामनायें
अजब हैं लोग ,
पेड़ों को काट कर " हवा " ढूंढ़ते हैं , विजय कुमार सिन्हा " तरुण "
मिटा कर सूरज ,
" सवेरा " ढूंढ़ते है।
हम तो चले परदेश
भले ही हम आप से दूर बहुत रहते हैं ,
भूले नहीं हैं , हम , रोज याद करते हैं।
आपकी नज़्मों को हम रोज पढ़ा करते हैं ,
इनमें सेझाँकती छवि आपकी देख लेते हैं।
आँखों में ये कतरा है ,
या कोई यह दरिया है ,
या सागर ही उमड़ा है ,
ओह !सात समन्दर पार ,
बेटा मेरा रहता है।
दिनांक - 10 -10 - 2020
जब भी वह मुझ से मिलती है ,
वह बड़े प्यार से मिलती है ,
उसकी वाणी तो सच मुझको ,
मीठी मिश्री सी लगती है।
वह वृद्धा मुझको तो , मेरी ,
हाँ ,माँ जैसी ही लगती है।
आँखों में प्यार का भाव भरा ,
चेहरे पर झुर्री सजी हुई ,
रख दे गर सिर पर हाथ जो वो ,
आशीष की बारिस करती है।
वह वृद्धा मुझको तो मेरी ,
हाँ , माँ जैसी ही लगती है।
मैं जब भी नत हो जाता हूँ ,
पावन चरणों को छूने को ,
वो , बाँहें पकड़ उठाती है ,
वह अपने गले लगाती है।
वह वृद्ध मुझको तो , सच ही ,
हाँ , माँ जैसी ही लगती है।
मैं धन्य - धन्य हो जाता हूँ ,
उस क्षण सुख स्वर्ग का पाता हूँ ,
आँखों से झड़ते हैंआँसू ,
बेटा कह मुझे बुलाती है।
वह वृद्धा मुझ को तो सच ही ,
हाँ , माँ जैसी ही लगती है।
हो सिर पर जिसके हाथ सदा ,
माँ के स्नेहिल करकमलों का ,
दुःख - दर्दों की ही कौन कहे ,
मौत लौट कर जाती है।
वह वृद्धा मुझको तो , सच ही ,
हाँ , माँ जैसी ही लगती है।
रचना तिथि -- 13 09 -2020
बहुत गुजर गया है ,
चन्द रोज और गुजर जायेंगे ,
हम तो वो दरख़्त हैं , जो
कुछ न कुछ देकर ही जायेंगे।
ज़माने ने दिया है ,
मुझको बहुत कुछ ,
प्यार , मोहब्बत ,इश्क और अखलाक़ ,
सब कुछ तुमको ही नज़र कर जायेँगे।
किसी से क्या शिक़वा , क्या गिला ,
सब यहीं छोड़ जायेंगे ,
तुम्हारी यादों के सिवा ,
कुछ और ना ले जायेंगे।
ये मकां , ये असबाब , ये साजो - सामां ,
सब यहीं रह जायेँगे ,
बस एक तेरा नूर , तेरी मुस्कुराहट ,
जनम - जनम याद आयेंगे।
( रचना तिथि : - 03 - 09 - 2020 )