Monday, June 24, 2019

बच्चा प्यारा - प्यारा हूँ

बाबा मुझको प्यारे हैं ,
मैं बाबा का प्यारा हूँ ,
उनका राजदुलारा हूँ ,
मैं बच्चा प्यारा - प्यारा हूँ।

दादी मुझको प्यारी है ,
मैं दादी का प्यारा हूँ ,
उनका बड़ा सहारा हूँ ,
मैं बच्चा प्यारा - प्यारा हूँ।

मम्मी मुझको प्यारी है ,
मैं मम्मी का प्यारा  हूँ ,
उनके दिल का टुकड़ा हूँ ,
मैं बच्चा प्यारा - प्यारा हूँ।

पापा मुझको प्यारे हैं ,
मैं पापा का प्यारा हूँ ,
उनकी आँख का तारा हूँ ,
मैं बच्चा प्यारा - प्यारा हूँ।

Monday, May 20, 2019

एक लड़की नटखट सी

एक लड़की नटखट सी , नन्ही सी पर चँचल सी ,
दूर देश से आई है , याद पुरानी लाई है ,
बात बहुत कम करती है , खुद में खोई रहती है ,
अब शब्दों को चुगती है , मन ही मन कुछ बुनती है।

Thursday, April 11, 2019

चन्द शेऱ

                   ( 1  )
लोग तो , ना जाने ,
क्या -क्या ख़याल रखते हैं ,
खुद पर यकीं नहीं   ,
औरों की नक़ल करते  हैं।                                                 
                ( 2  )
तुम बेसुरे ही सही,
गाओ तो कोई गीत ,
अपना ही ,
बकरियां भी करती  हैं  में - में ,
अपनी ही आवाज में ,
भेड़ियों की नक़ल नहीं करतीं।
                  ( 3  )
बरसात के मौसम की महक मिलते ही ,
मेढक टर - टराने लगते हैं ,
फूल में खुशबू आने से पहले ही ,
लोभी भँवरे गुन - गुनाने लगते हैं।
                ( 4  )
राजा कहै फ़कीर हूँ ,
झोला मेरे साथ ,
सुनत कबीरा हँसि पड़ै ,
कर धर अपने माथ।
कर धर अपने माथ ,
सोच में पड़ै कबीरा ,
हैं फ़कीर जो सॉंच में ,
होगा उनका क्या नाथ   ?



Monday, March 25, 2019

बाल गीत

मैं नन्ही सी चिड़िया हूँ ,
रोज सवेरे जगती हूँ ,
चूँ -चूँ कर के गाती हूँ ,
मीठे गीत सुनाती हूँ ,
सूरज को जगाती  हूँ।  

तुम भी आओ बाग़ में ,
घूमो मेरे साथ  में  ,
संग तुम्हारे घूमूँगी,
संग तुम्हारे नाचूँगी ,
छम - छमा , छम ,छम ।

Wednesday, February 20, 2019

प्रेम पुजारी

ना जानूँ , जप -तप ना जानूँ  ,
पूजा - पाठ ना जानूँ  ,
मैं तो प्रेम पुजारी हूँ प्रभु ,
प्रेम ही करना  जानूँ ।

क्या होती स्तुति है तेरी ,
अक्षर ज्ञान ना जानूँ  ,
हाथ जोड़ कर नमन करूँ मैं ,
बस इतना ही जानूँ ।

चर औ अचर सब ही हैं तेरे ,
किस में भेद  करूँ ,
कण -कण में तू ही तो समाया ,
मैं तुझको ही मानूँ।

सुख - दुःख की क्या परिभाषा है ,
सुख - दुःख तुम्हरी माया ,
सुख में भी  दुःख , दुःख में भी सुख,
महिमा तेरी बखानूँ।

प्रेम ही करना जानूँ ,
प्रभु जी , प्रेम ही करना जानूँ।

( यह रचना दिनांक 03 -02 -2015 की है )

मन की पीड़ा

मैं भी मन की पीड़ा को बतला सकता हूँ ,
भारत की छलनी छाती की कथा सुना सकता हूँ।
रोज -रोज ही भारत के सैनिक शहीद होते हैं ,
रोज -रोज ही हम झूठी कसमें खाते रहते हैं। 
 जाने कितनी बेर हमने दुहराईं कसमें ,
" बेकार नहीं जाएगा वीर जवानों का बलिदान"
पर, रोज -रोज ही शत्रु हम पर हमला करते हैं ,
रोज -रोज भारत के सैनिक हो जाते बलिदान।

हुए शहीद जब पूत देश के , नेताओं ने कहा -
दूँगा चालीस लाख शहीद के हर परिवारों को ,
तब शहीद की माँओं ने भर कर आक्रोश कहा -
करो नहीं अपमान हमारे वीर सपूतों का ,
नहीं दाम के लिये दिया है  बेटों ने बलिदान ,
भारत की रक्षा में उनहोंने त्याग दिये  हैं प्राण।
कर सकते गर एक काम तो , मेरा ये कर दो ,
एक पूत के बदले दुश्मन के , चालीस सिर ला दो।

मंदिर , मस्जिद ,कुर्सी की चर्चा को तज कर ,
झूठे वादे  , झूठी कसमें खाना छोड़ कर ,
किसी एक भी दिन ,  सच में  ही , सच्चे मन से ,
सब मिल कर , कर लेते तुम , वीर सपूतों का सम्मान।
कुछ तो शरम करो , देशभक्ति का स्वाँग रचाने वालों ,
वक्त करेगा नहीं क्षमा , तुम जितना नाटक कर लो ,
है सीने में  ' आग " अगर , तो , सिर पर क़फ़न सजाओ ,
करने दो - दो हाथ शत्रु से सीमा पर आ जाओ।

तब कहना तुम वन्देमातरम , जय -जय हिन्दुस्तान ,
जय बोलो , जय बोलो , बोलो , जय - जय हिन्दुस्तान।

(  मासिक हिन्दी पत्रिका हलन्त  - मार्च 2019  में प्रकाशित )

Friday, December 21, 2018

नया वर्ष आने वाला है

नया वर्ष  आने वाला है ,
धूम - धड़ाका होने वाला है ,
वर्ष 2019  आने वाला है ,
फिर से चुनाव आने वाला है।
फिर धर्म - जाति के बीज ,
जनता की छाती पर बोयेंगे ,
हमको तुमसे , तुमको हमसे ,
अलग - अलग बाँटे जायेंगे ,
वो नेता फिर से आएंगे ,
वो वोट माँगने आएंगे।
पहाड़ का  हाल खस्ता है  ,
नदी पार करने का पूल टूटा है
स्कूल का बच्चा रोज ही ,
रस्सी पर चल कर ,
स्कूल जाता है ,
सब को यह पता है ,
पर किस किस को दर्द होता है  ?
हर बार की तरह सिर झुकाये  ,
वो आएंगे फिर से ,
वो वोट माँगने आएंगे ,
अबकी पक्का  वादा है ,
फिर से कसमें खाएंगे ,
वादा कर के जाएंगे ,
उनमें कुछ पुराने वादे होंगे ,
कुछ नए वादे कर जाएंगे ,
वादों की झड़ी लगा देंगे ,
हम वादों में खो जाएंगे ,
वादों की  लॉलीपॉप ,
हमारी कानों को दे जाएंगे ,
आपका और मेरा वोट ,
लेकर ही वो  जाएंगे ,
फिर से हम सब  कोस - कोस कर
आँसू पी कर  ,
अगले चुनाव का इन्तजार,
बस करते ही रह जाएंगे।
वह जेई तरह से आएंगे ,
और इसी तरह से जाएंगे।



Monday, November 19, 2018

नदी और नारी

नदी और नारी दोनों की गति है एक समान ,
अनुशासित जब तक रहे ,तब तक है सम्मान।
जब भी नदियाँ हो जाती हैं चंचल औ उच्छृंखल ,
पावन बनी नहीं रह जाती और न जल ही निर्मल।
दिशाहीन हो कर बह जाती , इधर-उधर राहों पर ,
नहीं स्वच्छ वह रह पाती है , तृषित कामना लेकर।
जब तक है सम्मान ,पूजते नदी और नारी को ,
पंडित,ज्ञानी  अर्पित करते धूप,पुष्प औ चन्दन।
टूट जभी जाता है यह लघु अनुशासन का  बंधन ,
सुखमय जीवन में रह जाता ,बस क्रंदन ही क्रंदन।
है स्वतंत्र नारी का जीवन , जैसे कटा  पतंग ,
सुचिता सदा छोड़ देती ,आजाद नदी का संग।
अनुशासन में बद्ध प्रकृति भी ,शांत,सौम्य ,शीतल है ,
गर टूटा अनुशासन तो ,फिर , चहुँ ओर जल-थल है।
अनुशासन से च्युत  नारी का धर्म चला जाता है ,
धर्मविहीन हो कर्म नारी का पशुवत हो जाता है।
अनुशासन  विहीन यह जीवन ,सुघर नहीं हो सकता ,
काँटो के पहरे में देखा , है गुलाब मुस्काता।
प्रेम और सहयोग बिना , आकाश न छूती आशा ,
होती कभी न पूर्ण  'कल्पना 'की उड़ान-अभिलाषा।

Tuesday, October 30, 2018

आईना कब झूठ बोलता है ?

आईने से उनको डर लगता है  ,
इसलिए , जब कभी कोई ,
उनको दिखाता है आईना ,
वो डर जाते हैं देख कर आईना ,
और , डर कर तोड़ देते हैं पसलियां ,
आईना दिखाने वालों की  ,
साथ ही तोड़ देते हैं आईना ।
पर आईना तो आईना ही ठहरा ,
शीशे का बना आईना  ,
टूट कर , बिखर कर भी  ,
दिखाता रहा उनको ,
उनका ही चेहरा ,
उनका मुँह चिढ़ाता रहा  आईना ,
आईना तो असली चेहरा ही दिखाता है ,
भला , आईना कब झूठ बोलता है  ?

आओ मिल कर दीप जलायें

देश की आजादी की खातिर ,
झूल गए जो फाँसी पर  ,
आओ कुछ आँसू छलकायें  ,
उन वीरों  के  नाम ।

जिनके त्याग से लहराता है ,
आज तिरंगा प्यारा ,
आओ कुछ हम गीत लिखें ,
उन वीरों के नाम ।

जिनके बलिदानों से मिली है  ,
हमें देश की आज़ादी  ,
आओ मिल कर दीप जलायें  ,
उन वीरों के नाम ।


कभी - कभी तुम अपने मन से

कभी - कभी तुम अपने मन से ,
मन की बातें कर के देखो ।
कभी -  कभी मन के भावों को ,
मन ही मन में पढ़ कर देखो ।
कभी - कभी तुम चुपके - चुपके ,
चुपके - चुपके रो कर देखो ।
कभी - कभी दिल के जख्मों को ,
थोड़ी और हवा कर देखो ।
आँसू गर जो चाहे छलकना ,
आँसू को समझा कर देखो ।
होंगे मीत तुम्हारे शत - शत ,
उनके मन को पढ़ कर देखो ।
सुख - दुःख हैं जीवन के संगी ,
उनको मीत बना कर देखो ।
सुख में तो सब ही हँसते हैं ,
दुःख में भी मुस्का कर देखो ।
कभी - कभी तुम अपने मन से ,
मन की बातें कर के देख ।

Saturday, September 29, 2018

सिर पर धूप बहुत है

सिर पर धूप बहुत है
सँभल कर चलना  ,
हाक़िम को अच्छा नहीं लगता
रात को रात , और
दिन को दिन बताना ,
हाक़िम कोई भी हो
दिन में तारे दिखा सकता है ,
इसलिए ,
दिन को रात और रात को दिन बताना।
हाकिम की मर्जी हो , तो
बकरी भी गाय ,
और ,
गाय भी बकरी बन जाती है ,
सोच - समझ कर
मुँह खोलना ,
सोच - समझ कर
कदम बढ़ाना ,
कदम - कदम पर ज़ाल बिछे हैं ,
ज़ाल में झूठ के तम्बू हैं ,
जहाँ , सच नहीं , झूठ चलता है
झूठ के साये में सच चलता है ,
सच पर झूठ का पहरा रहता है।
ईमान को काँख में
दबा कर चलना ,
झूठ को आँखों में
बसा कर चलना ,
सिर पर धूप बहुत है ,
संभल कर चलना  ,
सिर अपना बचा कर चलना।

सड़क पर निकलो तो ,
निग़ाह रख कर चलना ,
कहाँ - कहाँ नहीं हैं भेड़िये
तुम्हारा शिकार करने ,
हवा ज़हरीली है
हर जगह , हर दिशा ,
रात तो काली होती ही है ,
यहाँ सफ़ेद  झक्क लिबास में भी
दिल काला मिलता है ,
अपना सत बचा कर चलना ,
आँचल सँभाल कर चलना ,
सूरज भी मूँद लेता है आँखें ,
अब सच कौन बोलता है
और ,
अगर , कोई बोले भी तो
उसे कौन सच मानता है ?
सच की लकीरों पर
झूठ का मुलम्मा है ,
झूठ के साये में सच चलता है ,
सच पर झूठ का पहरा रहता है ,
सर पर  धूप बहुत है ,
सँभल कर चलना ,
सिर अपना बचा कर चलना


Saturday, September 1, 2018

दो प्रतिशत

अरे ओ साँबा  !
सरकार ने
हमारी कितनी तनख्वाह बढ़ाई है रे  ?
हुज़ूर ,
दो प्रतिशत।
सिर्फ दो प्रतिशत  ?
ये सरकार  की नाइंसाफी है ,
अपनी तनख्वाह बढ़ानी हो तो
चार सौ प्रतिशत
और , हमारी सिर्फ दो प्रतिशत  !
हुज़ूर ,
सत्य कह रहे हैं ,
पर , हुज़ूर
यह नाइंसाफ़ी  कहाँ है  ?
ये तो कुदरत का न्याय है ,
हर बड़ा छोटे को निगलता है ,
बड़ा सांप छोटे को खा जाता है ,
बड़ी  मछलियाँ छोटी  मछलियों को
निगल जाती हैं ,
और हुज़ूर  , एक बात और   ...
वह क्या है रे  !
हुज़ूर  , सत्ता के लिए
जनता को कुचलना ही पड़ता है ,
इतिहास गवाह है ,
इतिहास तो उसी का बनता है
जो लाशों पर चलता है ,
आपने भी तो
सम्राट अशोक का नाम  सुना  ही होगा  ,
और ,
कलिंगा युद्ध को भी जानते ही होंगे ,
लाखों लोग मारे गये थे।
महान कहलाने वाले
सिकंदर का नाम भी
आपने सुना होगा ,
मुग़ल बादशाह औरंगजेब को
कौन नहीं जानता
जिसने सत्ता के लिए
अपने सगे भाइयों का भी
क़त्ल करवा दिया था ,
सो हे हुज़ूर ,
जो त्राहि - त्राहि का शोर न हो , तो
ऊपर वाले को कौन पूछेगा  ,
कौन  पुकारेगा  ,
और
कौन याद करेगा   ?
और हुज़ूर ,
जनता तो भेड़ - बकड़ियाँ  है ,
इन्हें तो कटना ही पड़ता  है।
का फर्क पड़ता है
दो प्रतिशत मिले , या फिर
चार प्रतिशत  ,
चार सौ तो मिलने से रहा।
जब पेट खाली रहेगा , तभी तो
ऊपर वाले के आगे
हाथ  फैलायेगा , और
जब हाथ फैलायेगा  , तो
बदले में ऊपर वाले की
दुआ - ख़ैर भी मांगेगा ,
देखिये ,हम जब भी
ऊपर वाले को याद करते हैं ,
दुःख में या सुख में
(  नेपथ्य में - यहाँ तो दुःख ही दुःख है )
जय हो - उनकी ही बोलते हैं ,
तुम ठीक कह रहे हो सांबा ,
चलो , छोड़ो इस टॉपिक को ,
खैनी -वैनी खिलाओ,
हम भी अपने घर जायें ,
तुम भी अपने घर जाओ। 

Friday, August 31, 2018

सब कुछ सत्य तो नहीं

कितना अच्छा लगता है
अपने नाम के आगे
एक  '  विशेषण  ' का लग जाना ,
एक विशेष  ' वर्ग '  से
पुरस्कृत हो जाना ,
कितना सुन्दर  और स्वर्णिम है
वह शब्द और संबोधन  !
जब इतने बड़े सम्मान से
हमें नवाज़ा जाता है ,
' ख़ैरात 'में जब
इतना सब कुछ मिल जाता है ,
' श्रम 'का झमेला क्यों पालें  ?
क्यों पसीना  बहायें  ?
कादो  - कीचड़ में क्यों सनें  ?
जब हमें
एक मेहमान की तरह
मिल जाता है
सारा आदर -  सत्कार ,
मुफ़्त का दाना - खाना ,
और , ' वज़ीफा '
फिर क्यों ढोयें हम
व्यर्थ का पुस्तक का भार  ?
" समान अधिकार "  का नारा
संविधान की किताबों में है ,
धरातल पर नहीं ,
किताबों में तो बहुत कुछ लिखा है ,
पर सब कुछ सत्य तो नहीं   ,
यही सत्य है ।

Monday, August 20, 2018

टिहरी झील

शहरों में तो बहुत  धूल है ,
शोर - शराबा भी बहुत है।
आह ! उमस भी इतनी  , कि ,
बुद्धि काम नहीं करती है ,
तन शिथिल हो जाता है ,
मन हार जाता है ,
चलो , कहीं और चलो ,
काम बहुत करना है ,
प्रदेश को संभालना है ,
नीतियां बनानी है ,
बिना  नीति विकास बेमानी है।
नहीं - नहीं ,
शहरों में मुश्किल है ,
दूर पहाड़ों पर
मिल सकता कोई हल है ,
विकास का रास्ता ,शायद ,
टिहरी झील की ओर से जाता है।
चलो , वहीँ चला जाए ,
प्रकृति की गोद का
आनन्द लिया जाए ,
सुरम्य पहाड़ियों के बीच
झील के पानी की सतह पर ,
बहती ठंढ़ी - ठंढ़ी नरम हवा ,
भर देगी , मस्तिष्क में ताजगी ,
निश्चय , विकास की योजना ,
जायगी निखर - संवर  -
ऐसे ही वातावरण में
देवत्व प्राप्त होता है ,
सच कहते हो  -
विकास का रास्ता  , शायद,
टिहरी झील से हो कर जाता है।

Sunday, August 19, 2018

श्रद्धांजलि

चमका नभमें एक सितारा ,
 वह था प्यारा  ' अटल ' हमारा।
फूलों ने उसको महकाया ,
धरती ने उसको था सँवारा।
पूरब - पश्चिम , उत्तर - दक्खिन ,
सब  का ही वह तो था दुलारा।
टूट गया नभ का वह तारा ,
शोक में डूबा जग यह सारा।
मौन हुई हैं सभी  दिशायें ,
खो गया  भारत का उजियारा।
है नमन तुम्हे हे महापुञ्ज ,
अमर नाम जग में है तुम्हारा।
दो फूल चरणों  में अर्पित है ,
स्वीकार करो श्रद्धांजलि हमारा।

Wednesday, August 8, 2018

काश ! कि ऐसा हो जाता

काश ! कि  ऐसा हो जाता ,
इन्सां  , इन्सां हो जाता ।
जाति , धर्म सब झूठे हैं ,
काश समझ में आ जाता ।
जनम सभी का एक सा ,
मरण एक सा  ही होता।
सूरज , चन्दा  , तारे भी
एक सा ही सब को दिखता ।
सागर , नदिया का पानी ,
एक सा ही सब को मिलता ।
फूल हों या फिर काँटे हों ,
पवन एक सा ही मिलता ।
मानव फिर मानव से ही  ,
नफरत दिल में क्यों रखता  ?


Monday, July 16, 2018

विवश पाँचाली

दिल के दर्द उकेरूँ कैसे 
इस कागज़ के टुकड़े पर ,
मन की व्यथा बताऊँ कैसे
काँप रहे सुकुमार अधर ।

जिधर - जिधर दृष्टि करता हूँ ,
विवश पाँचाली दिखती है  ,
बीच सड़क पर दुर्योधन की
फ़ौज खड़ी दिखती   है ।

विज्ञापन के नारों में बस
है सु:शाशन का नारा ,
राजनीति के चक्र्व्यूह में
अभिमन्यु सदा ही हारा।

हर दिन , हर शै  ,गली - गली में ,
है चीत्कार बेटी का ,
सुनकर भी है नहीं टूटता ,
तुला यहाँ पर न्याय का।

जाने कितनी निर्भया रोज
हा ! निरपराध मरती है ,
जाने कितनी बिटियों के तन ,
नित ही विदीर्ण होती है।

है बड़े सुनहरे पट्टी पर ,
बेटी बचाव का नारा ,
कैसे पढ़ पाएगी बेटी ,
शाशन - समाज नक्कारा।

Friday, July 13, 2018

पेड़ का बलिदान

एक शाम मेरे जेहन में
एक प्रश्न उभर आया ,
भेड़ और पेड़ में क्या अंतर है  ?
भेड़ों के भाग्य में लिखा है कटना ,
भेड़  कटते हैं , रोज कटते हैं ,
पेड़ों के भाग्य में लिखा है कटना ,
पेड़ कटते हैं , रोज  काटे जाते हैं। 
क्या फर्क पड़ता है -  भेड़ छोटा है या बड़ा ,
पेड़ सूखा है या हरा - भरा  ?

जिह्वा की संतुष्टि के लिए  ,
भेड़ बलिदान हो जाते हैं ,
शहर के विकास के लिए
पेड़ बलिदान हो जाते हैं।

किसी के विकास के लिए जरूरी है
किसी का बलिदान हो जाना  ,
पेड़ बलिदान हो जाते हैं ,
मानव के विकास के लिए ,
बन जाती हैं चौड़ी - चौड़ी सड़कें ,
आलीशान इमारतें ,
मजबूत दरवाजे , खिड़कियाँ ,
टेबल - कुर्सी  , फर्नीचर ,
और न जाने क्या - क्या।
पेड़ बलिदान देकर भी
अमर हो जाते हैं ,
कट कर भी
अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं पेड़ ,
एक हम हैं - मानव  ,
उसके बलिदान को ,
उसके त्याग को , उसके दर्द को
भुला देते हैं  ,
और ,
चलाते हैं  आरियां , पेड़ों पर ,
अनवरत - लगातार    .......
(  10 - 07  - 2018  )