Tuesday, August 4, 2020

रेशम का दुपट्टा

बारिस का है मौसम,
यूँ निकला ना करो ,
ज़माना है खराब ,
जमाने से डरो।
मौसम का क्या भरोसा ,
कभी ये भी मचल जायेगा ,
झूम कर नाचेगा ,
बहक जायेगा।
भींगा ना करो तुम कभी बूंदों में ,
 रेशम का दुपट्टा है लिपट जायेगा।
जुल्फों से टपकता हुआ ,
बरसात का पानी ,
चूमेगा तन - वदन ,
वो बन के शराबी।
नाजुक तेरा बदन है ,
लग जायेगी नजर ,
निकली हो तुम बरसात में ,
सब को है ये खबर।
रहना ना इत्मीनान ,
अपनों से भी कभी ,
देते हैं बड़ा ज़ख्म ,
अपने भी हैं कभी।

Wednesday, July 15, 2020

ओ मनुज तू धीर धर

ओ मनुज तू धीर धर ,
ना हो विकल , न हो विकल।
आँधियों का जोर है ,
तूफ़ान का ये शोर है ,
पल में गुजर यह जायेगा ,
कहर भी थम जायेगा ,
कुछ भी नहीं तो नित्य है ,
सब कुछ यहाँ अनित्य है ,
जो आज है , ना होगा कल ,
पल ,पल बदलता है ये पल ,
ओ मनुज तू धीर धर ,
ना हो विकल ,ना हो विकल।

स्याह जितनी रात हो ,
आघात पर आघात हो ,
मिट जाता होते प्रात ही ,
आघात भी होगा विफल ,
ओ  मनुज तू धीर धर ,
ना हो विकल , ना हो विकल।

Sunday, June 14, 2020

कोरोना

हर तरफ भय का माहौल है ,
हर आदमी अपने आप में सहमा है ,
पसरा है हर तरफ ख़ौफ़ का मंजर ,
कोरोना लेकर आया है एक नया मंजर ,
इसने लोगों को घरों में दुबकाया है ,
सबके नाक-मुँह पर पट्टी बंधवाया है ,
हमें एक दूजे से दूर कराया है ,
तिरोहित हो गई अधरों की मुस्कान ,
अब अधरों पर सन्नाटा छाया है।
एक नए युग की शुरुआत हो गई है ,
ऐसा लगता है , हम सब अब ,
तीसरे लोक   के प्राणी हो गए हैं ,
लेकिन , सच तो यह है , कि
हम सब आदिकाल के
पूर्वजों के रूप में आ गए हैं।

Sunday, June 7, 2020

आरज़ू

सोचता हूँ ,
जब भी तेरा दम निकले , मेरी बाहों में निकले ,
मेरे अरमान , मेरा प्यार , तेरे संग ही हो ले ,
ऐ ख़ुदा ! मेरी ये आरज़ू पूरी कर दे ,
मेरे प्यार को फिर से दुल्हन तो  बना दे।
मेरी हसरत है ,
मैं एक बार फिर तेरे माँग में सिन्दूर सजाऊँ ,
तेरे हाथों की हथेली में , मेंहदी तो रचाऊँ ,
तेरे पैरों को महावर के रंगों से सजा कर ,
तुझे रुख़सत करूँ पीहर , डोली में बिठा कर कर।

एक दीया जला रहा हूँ

एक पागल एक क़ब्र  पर लिख आया-
एक तुम ही तो थी , जो
मुझे तंग करती थी ,
अब , जब तुम नहीं हो , तो
मैं कुछ भी नहीं हूँ।

तुम्हे रोशनी पसंद नहीं थी ,
मुझे अँधेरा पसंद नहीं था ,
इसलिये तुम्हारी क़ब्र  पर ,
एक दीया जला रहा हूँ ,
ताकि , तुम्हें अहसास हो , कि
मैं अब भी तुम्हारे पास हूँ।

Thursday, May 28, 2020

झूठ और सच

' झूठ  ', ' सच ' से बड़ा होता है ,
लम्बे -लम्बे डग मार लेता है ,
' झूठ '  में तीन मात्रा ,
जब कि ,
' सच '  में दो ही मात्रा होता है ,
जरा सा फूँक दो , तो ,             
' सच ' हवा में उड़ जाता है ,
' झूठ ' पैर टिकाये ,
खड़ा रहता है।

Tuesday, May 19, 2020

त्रासदी

किसी मजदूर ने ही बनाये होंगे
रेल के डिब्बे ,
रेल के इंजन ,                                               
रेल की पटरियां ,
लेकिन कितनी त्रासदी है  ( कि  )
यह उन्हें नसीब  नहीं ,
( उल्टे ,रौंदती चली जाती है  )
कर देती है क्षत -विक्षत उनके शरीर ,
शरीर के साथ मन ,
छीन लेती है
उनकी पोटली में बंधी रोटियां
और                                                        
छितरा देती है पटरियों पर ।
नहीं , वह भूख से नहीं मरा ,
ना ही वह पैदल चलने से मरा ,
वह तो अपनी मौत मर गया है ,
आँसू न बहायें ,
कीमती है ,
मजदूरों का क्या !
ये तो यूँ ही मर - खप जाते हैं ,
मजदूर ही तो हैं ,
कोई  ......... ,
( लाट साहब तो नहीं )
वैसे , आँसुओं का क्या है ,
सुना है ,
घड़ियाल भी बहाते हैं
आठ - आठ आँसू    .... .....
रचना तिथि : -  09 -05 -2020

Friday, May 15, 2020

मैं ' सच ' बेच रहा हूँ

      ( 1  )
मैं  ' सच ' बेच रहा हूँ ,
बोलो , खरीदोगे ?
मँहगा नहीं है ,
बहुत सस्ता है ,
क्योकि ,  ' झूठ '
' सच 'से ज्यादा टिकाऊ है।
              ( 2 )
खुद के तलवे लगे जो जलने ,
मुझमें भाव दया का आया ,
नाव डूबने लगा जो अपना ,
मल्लाहों का याद हो आया ,
वरना ये तो सब अछूत हैं ,
कह कर इनको दूर भगाया।

Monday, May 11, 2020

श्रद्धांजलि - 1

समेट लेना वे सारी रोटियां ,
जो बिखरी पड़ी हैं
हमारी लाशों के बीच ,              
रेलवे लाइन किनारे ,
और ,
बाँट देना ,
उन गरीब ,बेबस मजदूरों,
उन भूखे , बदनसीब बच्चों
और
औरतों के बीच ,
जो न जाने कब  से
रोटी और घर की तलाश में
भागे जा रहे हैं
पाँव -पैदल ,
न सूरज उन्हें डराता ,
न बारिस उन्हें भिगोता ,
न ठंढ उन्हें सताता।
उनके साहस ,
उनके अडिग विश्वास ,
जिनके रीढ़ की हड्डी पर
यह भुवन टिका है ,
जो विश्व के विकास की
एक धुरी है ,
क्या नाम दें !
रचना तिथि :- 09 -05 -2020

Tuesday, May 5, 2020

बच्चों की कविता

भौं -भौं करता डॉगी आया  ,
खें -खें  करता बन्दर ,
हाथी दादा डर के मारे ,
बैठे घर के अन्दर।   

छोड़ चूहे बिल्ली खाती अब,
गाजर और टमाटर ,
खरहा देखो बड़े चाव से ,
खाये लाल चुकन्दर।

बादल देख के मेढक बोला ,
टर -टर -टर -टर -टर ,
डर कर मछली रानी भागी ,
पानी के अन्दर।

काँव -काँव  कौवा करता है ,
मैना पटर -पटर ,
सोन चिड़ैया का है देखो,
कितना मीठा स्वर।

Thursday, April 30, 2020

दुनिया तो एक रंगमंच है

छूट गए सब एक  - एक कर ,
अपने और पराये ,
खाली हाथ ही  जाना होगा ,
क्या लेकर थे आये।
बचपन बीता माँ की गोद में ,
पत्नि संग जवानी ,
स्वर्ण काल जीवन के हमने ,
सो कर के ही गंवाए।
जीवन के संघर्षों की भी ,
अपनी  एक कहानी ,
कभी रुलाया जी भर मुझको ,
कभी खूब मुस्काये।
काया जर्जर हुआ तो जाना ,
आया पास बुढ़ापा ,
अब तो है चलने की बारी ,
मनुआ तू क्यों रोये।
दुनिया तो एक रंगमंच है ,
सबका आना -जाना ,
जीवन के कर्तव्य निभा कर ,
तुमने रीत निभाये।

Saturday, April 4, 2020

सूरज जरूर आयेगा

गम न कर , आँसू न बहा ,
ये वक़्त है , गुजर जायेगा ,
दिल के जख्में न  गिन ,
ये भी भर जायेगा ,
बस इन्तजार कर ,
तू प्रात का ,
तम  भी ये कट जायेगा ,
सूरज जरूर आयेगा।

काल है , कराल है ,
संक्रमण का काल है ,
मुँह बन्द रख , मुँह बन्द रख ,
यह  भी चला  जायेग।
है हवाओं में जहर ,
दूरियाँ  बना ले तू ,
पास वह न आयेगा ,
खुद ही चला जायेगा।
रावणी दर्प है ,
है  अट्टहास कंस का ,
कर आह्वान कृष्ण का ,
सब फ़ना हो जायेगा।

Friday, March 13, 2020

मुझको तलाश है

मुझको तलाश है , नये  आसमान की ,
इस जहां से भी अलग , इक नये जहान की ,
प्यार का ही राज हो , खुशियां हजार हों ,
है तलाश मुझ को तो , ऐसे विहान की।

Tuesday, October 22, 2019

एक तू ही है अनश्वर

मन समर्पित , तन समर्पित ,
प्राण भी तुझ को समर्पित ,
जीव क्या , निर्जीव क्या ,
हैं सभी तुझ में समर्पित ,
जान कर भी भूले हम सब ,
चल - अचल सब ही हैं  नश्वर ,
एक तू ही  है  अनश्वर ,
एक तू ही  है अनश्वर।

Saturday, October 19, 2019

पेड़ और पत्ते

एक दिन
पेड़ और पेड़ के पत्तों में बहस छिड़ गई ,
पेड़ ने कहा
मुझ से तू है ,
तुझसे  मैं नहीं ,
मैं तुम्हें सींचता हूँ ,
तुम्हें जिलाता हूँ।
पत्तों ने कहा
यह सच है
पर यह भी सच है
पत्तों के बिना
पेड़ की क्या विसात है।
हम पत्ते हैं ,तो  ,
तुम्हारी पहचान है ,
हम नहीं रहेंगे  , तो ,
तुम्हारी  क्या पहचान है ?
पेड़ को बड़ा गुस्सा आया ,
बोला कुछ नहीं , पर
पत्तों को सबक सिखाने की
जुगत में लगा रहा।
फिर क्या था ,
पेड़ को एक दिन मौक़ा मिल गया ,
उसने अपने साथी
बादल  और हवा को बुला लिया ,
वह जोर , जोर से झूमने लगा ,
तेज आँधियां चलने लगी ,
तेज बारिस हुई ,खूब ओले पड़े ,
इतने तेज कि पेड़ के
सारे पत्ते  झड़ गये ,
यहाँ तक कि  पेड़ की जड़ से
मिट्टी भी काट - काट कर
बहा ले गई।
पेड़ से गिरे पत्ते
चुप - चाप आँसू बहाते रहे।
पेड़ ने अट्टहास किया -
अब सड़ो जमीन  पर पड़े - पड़े ,
पत्तों ने कुछ नहीं कहा।
दूसरे दिन धूप  निकल आई ,
पत्तों ने सूरज से विनती किया -
प्रभु , तुम में जो शक्ति है
मुझ में भी भर दो ,
मैं भी लोगों के ताप हर सकूँ।
सूरज कुछ नहीं बोला ,
बस दिन भर पत्तों संग खेलता रहा।
दूसरे दिन सूरज फिर निकला ,
सूरज की किरणों के साथ -साथ
कुछ गरीब  लोग
पत्तों के पास आ गये ,                              
कल्ह जो पत्ते भींगे थे , गीले थे
आज सूख गए थे ,
उन गरीब लोगों ने उन पत्तों को
एक जगह इकट्ठा कर
बोरियों में भर लिया ,
फिर अपने कन्धों पर लाद
अपने घर ले गये।
बिना पत्तों के वह ठूंठनसा पेड़
अकेला खड़ा रह गया।  
फिर आ गया ढंढ का मौसम ,
उन गरीब लोगों ने
जो पत्तों को बटोर कर ले गए थे
बोरियों से पत्ते निकाल कर
जलाने लगे ,
पत्ते ख़ुशी - ख़ुशी जलने लगे ,
उसको चारों ओर से
लोग घेर कर खड़े थे ,और
ठंढ से अपना बचाव कर रहे थे।
पत्तों ने सूरज को याद किया  -
तुमने मुझमें अपनी शक्ति दी ,
मैं भी इन भोले
गरीबों के काम आ सका ,
यही मेरा बड़ा सौभाग्य है।
इधर ,
एक दिन फिर तेज हवा चली ,
तेज हवाओं के झकोरे
पेड़ सह नहीं सका ,
उसकी जड़ें तो पहले ही
खोखली हो गईं थीं ,
वह पेड़ धराशयी हो गया।
दूसरे दिन लोगों ने देखा ,
कोई कुल्हाड़ी ले कर आया ,
कोई  आरी लेकर आया ,
फिर क्या था -
देखते - देखते
किसी ने  आरी से उसके पेट चीर दिये ,
किसी ने कुल्हाड़ी से उसके सिर ,
किसी ने उसके हाथ ,
किसी ने उसके पैर  काटे ,
जानो , उसके शरीर के
टुकड़े - टुकड़े कर दिये ,
फिर , ट्रकों में भर कर ,
अपने गोदाम ले गए ,
वहाँ उन्हें जमीन पर
बेरहमी से पटक दिया।
पेड़ के टुकड़े वहीँ जमीन पर
पड़े - पड़े , कुछ सड़ गए ,
कुछ में कीड़े लग गए
कुछ को बार - बार
आरी से  चीरा गया ,
कुल्हाड़ी से काटा गया ,
अब पेड़ के कटे टुकड़ों को
पत्तों की याद आने लगी ,
पर अब न तो वह पेड़ था
ना पत्ते थे ,
सब कुछ ख़त्म हो गया  था ,
पर कटते - कटते
पेड़ के  टुकड़ों ने सोचा -
काश हम दर्प ना करते ,
अपने अहंकार  में
पत्तों के महत्व को नहीं समझ सके ,
ना उन्हें गिराते ,
ना खुद  मिटते  , ना पत्ते ,
हम सब हरे - भरे ही रहते ,
सदियों -सदियों तक ,
सदियों -सदियों तक   ........

Thursday, October 17, 2019

ग़म  तो है दुनियाँ में बहुत , लेकिन
कभी मुस्कुरा कर भी देखिये ,
काँटों  की हथेली पर खिलता है  गुलाब ,
उससे मुस्कुराना सीखिए।

Friday, October 11, 2019

बिल्ली , चूहा और घंटी

सुना है शहर में एक बड़ा जादूगर आया है ,
बड़े - बड़े जादू दिखलाता  है। 
जब वह अपना हाथ हिलाता है
साँप  को रस्सी और रस्सी को साँप  बना देता है।
 उसका जादू देखने को भीड़ लगी रहती है ,
उसकी आवाज दूर - दूर तक सुनाई देती है।
एक दिन उसी भीड़ में एक चूहा भी खड़ा था ,
उसके  एक हाथ में एक घंटी पड़ा था।
चूहा दरअसल बिल्ली के गले में
घंटी बांधने जा रहा था ,
पर भीड़ देख कर  वह भी
जादूगर का जादू देखने रुक गया था ।
जादूगर ने कहा -
अपने हाथ की सफाई दिखाता हूँ ,
तुम सब देखो
कैसे शेर को बिल्ली बनाता हूँ।
इतना कह जादूगर शेर की तरह गुर्राया ,
चूहे की समझ में कुछ भी ना आया ,
पर अगले ही पल उसने शेर को
बिल्ली बना पिंजरे में बंद पाया।
जो पहले शेर था  ,
अब बिल्ली बना पिंजरे में बंद है ,
लोग कहते हैं
जादूगर बहुत अक्लमंद है।
चूहे ने मन में सोचा - जादू तो जादू है ,
कब किसका जादू चल जाए ,
आज जो शेर पिंजरे में बंद है ,
कल्ह बाहर आ जाए ,और
आज जो जादूगर, बाहर है ,
कल्ह पिंजरे के अन्दर हो जाए।
इतना सोचते ही उसे
बिल्ली का ध्यान आया ,
घंटी वहीँ भूल  सिर पर पैर रख कर
रफूचक्कर हो गया।
बिल्ली , चूहे और घंटी की कहानी
तब से वहीँ  खड़ी है ,
 जादूगर अब भी है , पर
जादू उसके जेब में पड़ी है।

Wednesday, September 18, 2019

तुम फिर आ गए बापू !

लो ,तुम फिर आ गए बापू !
अरे !  सुना है , 
तुम्हारी तो किसी ने ह्त्या कर दी थी ,
नहीं , नहीं , तुम मर भी कैसे सकते हो ,
हर वर्ष आते हो ,
आते हो क्या !
हमारे साथ ही रहते हो ,
इसी देश में ,
कभी रुपयों वाली नोट में  दीखते हो ,
कभी सिक्कों में ,
कभी लोगों की चर्चाओं में  ;
हाँ , तुम्हारे मारने की हर दिन
कोशिश होती है ,
पर तुम नहीं मरते ,
पता नहीं क्यों ,
लोग अन्दर ही अन्दर कुढ़ते हैं ,
पर तुम्हे मारें
इस बात से उन्हें भी डर लगता है ,
और तुम ,
अपने  उसी पुराने चिर मुद्रा में ,
हाथ में सोटा , कमर में लकोटि ,
आँख पर वही मोटा चश्मा पहने ,
इधर से उधर फिरते रहते हो।

अच्छा हुआ तुम आ गए ,
लो खुद ही देख लो अपना देश ,
लोग बड़े खुश हैं , अमन - चैन से हैं ,
लोगों के अच्छे दिन आ गए हैं ,
कहाँ , लकड़ी और उपले
जला-जला कर खाना बनाते थे ,
उससे उठते धुएँ से
अपना आँख फोड़ लेते थे   ,
 अब गैस सिलिन्डर आ गया है ,
न लकड़ी गीली होने का डर ,
न उपले  के भींगने का डर ,
माचिस से भी छुटकारा ,
झट  लाइटर दबाओ ,
चट  गैस जलाओ ,
फटा - फट खाना  बनाओ।
अलबत्ता , गैस सिलिन्डर
इतना मँहगा होता जा रहा है , कि
लोगों के पाकिट को फाड़ कर
बाहर आ रहा है।

बैलगाड़ी और तांगे का तो जैसे
नामोनिशान ही मिट गया लगता है ,
घोड़ा तो अब पुलिस वालों के
घुड़साल में ही दीखते है ,
अब लोग , कार और स्कूटर पर
शान से चलते हैं ,
हाँ , पेट्रोल की कीमतों में
लगी आग से
उनके पैंट की जेब जरूर झुलस जाती है ,
पर सुख - सुविधा के लिए
यह सब तो सहना ही पड़ता  है।
सड़कें बहुत खूबसूरत हैं ,
दमदार , गढ्ढ़ेदार , हिचकोलेदार ,
कुछ लोग ठीक ही कहते हैं
सड़कों में जगह - जगह
गढ्ढे तो होने ही चाहिए ,
लोग देख-भाल कर
संभल - संभल कर सड़क पर चलेंगे ,
ना हों गढ्ढे तो सरपट भागेंगे ,
फिर फिसलेंगे , चोट खायेंगे ,
या फिर ,कौन जाने आगे क्या हो !
कार और स्कूटर भगाने वालों के लिये
सरकार ने  सशर्त नियमों सहित
कुछ कागजात साथमें रखना
अनिवार्य कर दिया है  ,
बिना उन कागजों  और शर्तों के
कार और स्कूटर
सरपट भागने वालों के लिये ,
सरकार ने अच्छा इंतजाम कर रक्खा है ,
कदम - कदम पर सरकारी अमला
इनका जम कर स्वागत कर रही है ,
लोग ख़ुशी - ख़ुशी ,
अपने स्वागत के लिये
हजार , दो हजार की कौन कहे
लाखों न्योछावर कर रहे हैं ,
भले , घर में उनके फाँका पड़  जाये ,
सरकार भी खुश , जनता भी खुश।
इस ख़ुशी की बात पर एक बात याद आई ,
तुम तो जीवन भर लड़ते ही रहे ,
कभी देश के लिये अंग्रेजों से लड़े ,
कभी गरीबों और किसानों के
हक़ के लिये लड़े  ,
किसानों की बात पर भी
एक बात याद आई -
सुना है कि विगत कुछ सालों में ,अभाव में
बहुत से किसानों ने आत्म -ह्त्या कर ली ,
कहीं ,कहीं तो किसान कई - कई
दिनों तक पानी में खड़े रहे ,
अरे भाई , पानी में खड़े रहो  , या
आत्म - ह्त्या ही करो ,
किसी का क्या बिगड़ता है ,
किसान कोई नेता थोड़े ही है , कि
हाय - हल्ला मचे ,
तुम होते तो शायद
अब भी किसानों के लिये लड़ते,
पर आज देखो ,
सब अपने -अपने लिये लड़ रहे हैं ,
देश जाए  ....................
पहले पेट पूजा ,
फिर काम दूजा।

धर्म -कर्म भी बहुत बढ़ गया है ,
तुम तो राम - राम रटते ही रह गये ,
आज देखो हर ओर
राम की जय -जयकार हो रही है ,
हर गली - मुहल्लों में
राम के नाम का पताका
लहराते लोग मिल जाते हैं ,
ये दीगर बात है  , कि
कभी - कभी  राह में
दुष्ट लोग  टकरा  जाते हैं , फिर क्या ,
हाथ के हाथ दण्ड का प्राबधान है ,
पीटते - पीटते  सीधा
स्वर्ग - लोक पहुँचा देते हैं ,
कोर्ट -कचहरी की
जरूरत ही नहीं पड़ती ,
वो कहते हैं ना , कि ,
क़ानून तो हम ही बनाते हैं ,
देश हमारा है , क़ानून हमारा है ,
न्यायपालिका हमारी है ,
मज़ाल है , लोग चूँ  तक करें !
उफ़ तक नहीं करते ,
झट उन्हें देश से
बाहर का रास्ता दिखाने
कई हमदर्द खड़े रहते हैं।
वैसे आज के सभी जन , देश -भक्त हैं ,
कोई किसी से कम नहीं ,
अगर कोई नहीं है , तो
वह है  ' जनता ' ,
क्योकि , वह सच बोलने के लिये
जरा -जरा मुँह खोलती है ,
उसका जरा सा मुँह खोलना ही
साबित करता है , कि ,
वह देश - भक्त नहीं  है।
आपका पुराना ज़माना थोड़े ही है ,
अंग्रेजी सत्ता भी
आपके  ' सच ' से काँप जाती थी !
चलो , आप आ ही गए हो , तो ,
खुद ही देख लो
20  वीं  सदी का अपना देश ,
किसी के बताने  या कहने की
जरूरत तो नहीं है।
सो हे बापू !
तुम्हारे आज के आगमन पर
हम सब छोटे - बड़े , लम्बे -ठिगने ,
गरीब - अमीर , ऊँच -नीच ,
लँगड़े -लूले , काने - कुतरे ,
गूँगे -बहरे , दोस्त - दुश्मन ,
मजदूर - अफसर ,सरकार -पत्रकार ,
स्वस्थ्य -बीमार , साहूकार -चाटूकार ,
 हम सभी आपको नमन करते हैं ...........
 
( प्रकाशित -  2019 )






Monday, August 5, 2019

नए दरख़्त उग आये हैं

बूढ़े  दरख़्तों  से कहो ,
वे  ख़ुद छोड़ दें वह जगह ,
नए दरख़्त उग आये हैं
नए अंदाज़ में ,
अब उनकी ज़रुरत  नहीं है  ......

बरगद से कहो ,
वे इतराना छोड़ दें ,
पंछियों  को देते हैं बसेरा
और ,
करते हैं छाया ,
थके मुसाफिरों पर  .....

पीपल से कहो,
मुस्कुराना छोड़ दें  ,
हम ही हैं 
देते हैं शुद्ध हवा
ऑक्सीजन ,  जीने के लिए ,
अब नया ज़माना आया है ,
नयी तकनीक आ गई है ,
सब कुछ हम स्वयं कर लेंगे ,
अब उनकी  कोई ज़रूरत  नहीं है। ......

Saturday, July 27, 2019

मुक्तक

मछली ने केंचुए से कहा -
तू क्यों मुझे ललचाती है ,
खुद तो मरती ही  है ,
मुझे भी मरवाती है।

कभी पानी का थाह
बाँस लेता है ,
कभी पानी   बाँस को
बहा ले जाता है।

बरसाती नाला , बहुतों को
बहा ले जाती है ,
कुछ उसके साथ बह जाते हैं ,
कुछ अपने को बचा लेते हैं।

मनुष्य को देख परिंदे ने कहा ,
कितना स्वार्थी हैं ये ,
अपना घर बनाने के लिये ,
परिंदों का घर उजाड़ देते हैं।
--- मंजु  सिन्हा