Sunday, March 4, 2012

भोर का सूरज


भोर का  सूरज  उग  आया है
दालान की  खिड़की  पर.......
जाड़े की कुन-कुनी धूप में                                                                  
देखता  हूँ
गोरैये  का जोड़ा
अपने नन्हें नन्हें
शावकों  के लिए
लाते हैं चुग-चुग कर
चुग्गे  बारी - बारी  से .......
धीरे -धीरे
इसी क्रम में
बीत  जाता है
यह पहाड़ सा दिन,
नीले नभ  का राही भी
थक कर
विश्राम को  चला जाता है
दूर क्षितिज    के
सिंदूरी सागर  तट .................
 नीला आकाश
स्याह पड़   जाता  है ,
टिम - टिमाते  हैं
छोटे -छोटे  तारे
जुगनुओं  से  चमकते  हैं  .........
सब कुछ  देखता  हूँ
ख़ुली  खिड़की की  सलाखों  से ,
धीरे - धीरे 
अँधेरा अपनी  बाहें  पसारता है 
फिर छा  जाती  है  निस्तब्धता ........
मन कहीं  दूर
बहुत  दूर चला जाता  है ,
तभी , कहीं 
पास  की  अमराई   से
कोयल  की  कूक
मेरे  सूने  उर  को
बींध  जाती है..................
मेरा  ध्यान
गोरैये  के  जोड़े  पर  जाता  है ,
निश्चय  ही
अपने नीड़ में
सुबह  होने  के  इन्तजार  में
जाग  रहा होगा
फिर  से,
अपने  नन्हों  के  लिए
चुग्गा चुग कर लाने को ............

Thursday, February 16, 2012

चलो उठो नई राह बनाओ


चलो उठो नई  राह बनाओ
,बैठ के यूँ  न समय गंवाओं ,
जो बीता
उसे याद न लाओ ,
राम रहीम की
बात न सोचो ,
काम ही काम की
बात को सोचो ,
नए नए
आयाम  बनाओ ,
चलो उठो
नई राह बनाओ  ।

बाधाओं से
मत घबराओ ,
संम्बल को
पतवार बनाओ ,
बीच भंवर
कश्ती फँस जाती ,
लहरें  मौत का
भय दिखलातीं ,
नहीं मांझी
हिम्मत को हारे ,
ले आये
कश्ती को किनारे  ।

 नहीं कभी ,
जो हार मानता ,
झंझाओं  से
हाथ मिलाता ,
साहस के बल
भाग्य बदलता ,
जग उसकी
जय गीत  है गाता।
दिल में
इक तूफान जगाओ,
मन में
इक संकल्प बिठाओ ,
चलो उठो ,
नई राह बनाओ  ।


Wednesday, February 8, 2012

सुबह के ओस कण

हरी घास पर  , किसी  आस पर 
पड़ा मौन था  कोमल   पानी   ,
मोती  के  दानों  के  जैसा 
श्वेत  बूंद  था , गौर  ललाट
हवा  के झोंके  से रह रह कर 
था काँप   रहा जलकण विराट .......

प्रात  का आभाष    पाकर  
मौन मलिन मुस्कान लाकर 
गा उठा  वह   क्षीण  राग से ......
विस्तृत रवि की किरणें 
प्रणय भाव से , ले  चला 
स्वर्ग  द्वार  की  ओर...........

विजय कुमार सिन्हा "तरुण"

Friday, February 3, 2012

आया वसंत का मधु मौसम

                                                                                                    














कलियाँ  चटकीं कचनार खिले ,
गुलमोहर के मुख लाल हुए ,
चहकीं चिड़ियाँ बहका ये पवन ,
मदमस्त हुआ तन-मन योवन ।                   

फूलीं सरसों महका बयार ,
हो रहा धरा का नव श्रृंगार  ,
उन्मद समीर गाता मल्हार ,
चल नाविक तू चल मझधार ।

नदियों की चंचल लहर -लोल , 
प्रमुदित हो करती हैं   किलोल ,
कुंजों में कोकिल का सरगम , 
है पात -पात बिखरा शबनम ,

सुन कर भौरों का गुन-गुन -गुन , 
फूलों पर छाया है   फागुन  , 
इतरा -इतरा कर शाखों   पर ,
कर रहे भ्रमर का  आलिंगन  । 

सूरज की रक्तिम किरणों से , 
सरसिज सरवर का महक उठा ,
गिरी भी बुरांस के   फूलों  से ,
दावानल जैसा  दहक   उठा । 

अनुपम है यह रूप धरा   का , 
अंग -अंग है   निखर    रहा , 
कामदेव के  पुष्पवान    से , 
संयम मन का बिखर  रहा

मधु -ऋतु के अंगड़ाई    से ,
भींग रहा  है  अंतरतम  , 
आया वसंत का मधु -मौसम ,
आया वसंत का मधु -मौसम । 

Sunday, January 22, 2012

चलो गाँव की ओर

चलो गाँव की ओर जहां पुरबैया बहती है ,
चलो गाँव की ओर जहां पुरबैया बहती है।

खेतों में जहां धान की फसलें मन हर्षाती है ,
झूम-झूम गेहूं की बाली गीत सुनाती है।
चलो गाँव की ओर --------

जहां वसंत की आह्ट सुन सरसों मुस्काती है,
तीसी के नीले फूलों की चादर बिछती है ,
चलो गाँव की ओर --------

जहां सूरज की किरणों के संग भोर उतरती है ,
अमराई में कोयल मीठे गीत सुनाती है ,
चलो गाँव  की ओर --------

जहाँ पनघट पर गाँव की गोरी गागर भरती है ,
ओढ़ चुनरिया धानी रंग ,धरती इठलाती है,
चलो गाँव की ओर -------------

सन -सन जहां उमग पुरबैया चलती है,
जहां अभी भी संबंधो में उष्मा मिलती है,
चलो गाँव की ओर ----------

Tuesday, January 17, 2012

प्रीत के सागर में प्रिय तुम


प्रीत के सागर में प्रिय  तुम,
भावना  का रंग दो,
इस सिंदूरी शाम का ,
यौवन महक तो जाएगा |

हरसिंगारी  गंध को ,
उन्मुक्त बहने दो ज़रा ,
एक अल्हढ़ सा पवन का
मन मचल तो जाएगा |

थप -थापाती है उषा के
द्वार जब अरुणिम किरण ,
तब किसी नव कोकिला को
स्वर नया मिल जाएगा |

रूपसी के चितवनों के
वाण चलने दो ज़रा ,
इस धरा पर स्वर्ग का
सौन्दर्य तो बिछ जाएगा |